{"_id":"5b3a02814f1c1b2e168b562a","slug":"know-the-reason-behind-two-buttons-in-toilet-flush","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"टॉयलेट के फ्लश पर क्यों होते हैं दो बटन, सोचा भी नहीं होगा आपने बहुत रोचक है कहानी","category":{"title":"Weird Stories","title_hn":"अजब गजब","slug":"weird-stories"}}
टॉयलेट के फ्लश पर क्यों होते हैं दो बटन, सोचा भी नहीं होगा आपने बहुत रोचक है कहानी
फीचर डेस्क, अमर उजाला
Updated Mon, 02 Jul 2018 05:44 PM IST
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toilet
अगर आपने कभी टॉयलेट के फ्लश बटन पर गौर किया हो तो आपको वहां एक की बजाय 2 बटन नजर आए होंगे। क्या आपने कभी सोचा है कि जब दोनों बटन का एक ही काम है तो 2 बटन क्यों होते हैं? बता दें ड्यूल फ्लश का आइडिया अमेरिका के इंडस्ट्रियलिस्ट डिजाइनर विक्टर पापानेक का था। उन्होंने साल 1976 में अपनी किताब डिजाइन फॉर द रियल वर्ल्ड में इसका जिक्र किया था। वक्त के साथ तकनीक ने खूब तरक्की की है। विभिन्न चीजों के डिजाइन्स में भी तकनीक का यह बदलाव साफ दिखाई देता है।
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इसका जवाब हम आपको बताएंगे। दरअसल, 2 बटन वाले टॉयलेट फ्लश या कहें कि ड्यूल फ्लश टॉयलेट का कॉन्सेप्ट दो अलग-अलग बटनों से है, जिनमें से एक छोटा और एक बड़ा होता है। इन दोनों ही बटनों का अलग-अलग एक्जिट वॉल्व होता है और पानी का लेवल भी दोनों का अलग-अलग होता है।
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दरअसल, इन दोनों बटनों में से छोटे वाले बटन में साढ़े तीन या चार लीटर पानी रिलीज होता है और बड़े वाले बटन से करीब छह से नौ लीटर पानी रिलीज होता है। फ्लश में लगा छोटा वाला बटन लिक्विड वेस्ट को फ्लश करने में और बड़ा वाला सॉलिड वेस्ट को फ्लश करने में काम आता है।
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अब से अगर आप टॉयलेट में यूरिन पास करने जाएं तो ध्यान रहे केवल छोटा वाला बटन दबाना है। वहीं दूसरा बटन तब इस्तेमाल करें जब आप टॉयलेट में सॉलिड फ्लश करने जाएं। इससे पानी की काफी बचत होती है। एक अनुमान के मुताबिक इस तरह आप एक साल में करीब 20 हजार लीटर पानी की बचत कर सकते हैं। ऐसा करके साथ ही साथ आपका पानी का बिल भी कम किया जा सकता है।
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बता दें कि ड्यूअल फ्लश का आइडिया अमेरिका के इंडस्ट्रियलिस्ट डिजाइनर विक्टर पापानेक का था। 1976 में अपनी किताब डिजाइन फॉर द रियल वर्ल्ड में उन्होंने सबसे पहले इसका जिक्र किया था। इसके बाद साल 1980 में इसे लागू करने वाला ऑस्ट्रेलिया पहला देश बना था। यहां जब पानी की काफी बचत हुई तो उसके बाद से यही आइडिया पूरी दुनिया ने अपना लिया और इसे लगभग हर जगह लागू करने की कोशिश की जाने लगी।