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अगर मौत का दिन हमें पहले से पता चल जाए तो क्या होगा? कभी सोचा है आपने...
बीबीसी हिंदी
Updated Fri, 29 Jun 2018 12:14 PM IST
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'जिंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपनी, साथ ले के जाएगी'। आप मुकद्दर के कितने ही बड़े सिकंदर क्यों न हों, आप और आप के जानने वाले सारे लोगों की एक न एक दिन मौत होगी ही।
Funeral
अगर मौत का दिन पता चल जाए?
क्या हो कि ये अनिश्चितता खत्म हो जाए? हमारी मौत का दिन, वक्त और तरीका हमें पता चल जाए, तो क्या होगा? हालांकि, ये नामुमकिन है। फिर भी, अगर हम तय मौत के तय दिन और वक्त को जान जाएं, तो शायद हम इंसान बेहतर काम करने या अपनी जिंदगी को नए मायने देने के लिए ज्यादा प्रेरित हों। पहले तो हमें मौत के मनोविज्ञान को समझना होगा। 1980 के दशक में दुनिया के कई देशों में इस बात की रिसर्च की गई कि मौत का एहसास किस तरह लोगों के बर्ताव पर असर डालता है। इसकी चिंता और परेशानी से हमारे व्यक्तित्व पर कैसा असर पड़ता है?
न्यूयॉर्क की स्किडमोर कॉलेज की मनोविज्ञान की प्रोफेसर शेल्डन सोलोमन कहती हैं, "हम बाकी जीवों की तरह ही सांस लेने वाले, खाने और मलत्याग करने वाले और खुद के बारे में महसूस करने वाले मांस के लोथड़े ही तो हैं, जो किसी भी वक्त खत्म हो सकते हैं।" शेल्डन सोलोमन कहती हैं कि इंसान टेरर मैनेजमेंट थ्योरी से चलता है। वो अपने आस-पास के माहौल, सोच, संस्कृति से प्रभावित होकर मौत के डर का सामना करता है। वो खुद के इस दुनिया के लिए अहम होने का एहसास कराता है। इंसान खुद को समझाता है कि उसकी जिंदगी के भी मायने हैं। वरना मौत का एहसास इंसान को जिंदा ही मार देगा।
करीब एक हजार तजुर्बे हुए हैं इस बात के कि हमारी सोच पर मौत की सच्चाई कैसा असर डालती है। इनके नतीजे कहते हैं कि जैसे ही हमें मौत की अटल सच्चाई का एहसास होता है। हम डरकर उन बुनियादी मूल्यों का सहारा लेते हैं, जिनके बीच हम पले-बढ़े हैं। लोग खुद को यकीन दिलाने लगते हैं कि वो दुनिया के लिए अहम हैं, जो हमारी सोच को चुनौती देता है, उसके प्रति आक्रामक हो जाते हैं।
क्या हो कि ये अनिश्चितता खत्म हो जाए? हमारी मौत का दिन, वक्त और तरीका हमें पता चल जाए, तो क्या होगा? हालांकि, ये नामुमकिन है। फिर भी, अगर हम तय मौत के तय दिन और वक्त को जान जाएं, तो शायद हम इंसान बेहतर काम करने या अपनी जिंदगी को नए मायने देने के लिए ज्यादा प्रेरित हों। पहले तो हमें मौत के मनोविज्ञान को समझना होगा। 1980 के दशक में दुनिया के कई देशों में इस बात की रिसर्च की गई कि मौत का एहसास किस तरह लोगों के बर्ताव पर असर डालता है। इसकी चिंता और परेशानी से हमारे व्यक्तित्व पर कैसा असर पड़ता है?
न्यूयॉर्क की स्किडमोर कॉलेज की मनोविज्ञान की प्रोफेसर शेल्डन सोलोमन कहती हैं, "हम बाकी जीवों की तरह ही सांस लेने वाले, खाने और मलत्याग करने वाले और खुद के बारे में महसूस करने वाले मांस के लोथड़े ही तो हैं, जो किसी भी वक्त खत्म हो सकते हैं।" शेल्डन सोलोमन कहती हैं कि इंसान टेरर मैनेजमेंट थ्योरी से चलता है। वो अपने आस-पास के माहौल, सोच, संस्कृति से प्रभावित होकर मौत के डर का सामना करता है। वो खुद के इस दुनिया के लिए अहम होने का एहसास कराता है। इंसान खुद को समझाता है कि उसकी जिंदगी के भी मायने हैं। वरना मौत का एहसास इंसान को जिंदा ही मार देगा।
करीब एक हजार तजुर्बे हुए हैं इस बात के कि हमारी सोच पर मौत की सच्चाई कैसा असर डालती है। इनके नतीजे कहते हैं कि जैसे ही हमें मौत की अटल सच्चाई का एहसास होता है। हम डरकर उन बुनियादी मूल्यों का सहारा लेते हैं, जिनके बीच हम पले-बढ़े हैं। लोग खुद को यकीन दिलाने लगते हैं कि वो दुनिया के लिए अहम हैं, जो हमारी सोच को चुनौती देता है, उसके प्रति आक्रामक हो जाते हैं।
worshiping
मौत शब्द अगर कंप्यूटर के स्क्रीन पर 42.8 मिलीसेकेंड के लिए भी दिख जाए, या अंतिम संस्कार के वक्त मौत पर लंबी चर्चा हो, दोनों ही सूरतों में लोगों का बर्ताव इस कड़वी सच्चाई का सामना करने से बदल जाता है। जब हमें मौत का एहसास कराया जाता है, तो हम उन लोगों के करीब होने की कोशिश करते हैं, जो दिखने में, खान-पान और रहन-सहन में हमारे जैसे हैं, जिनके धार्मिक और सियासी खयालात हम जैसे हैं, जो हमारे इलाके में ही रहते हैं। इसके बरक्स मौत की बात जहन में आते ही हम अपने से अलग दिखने वालों के प्रति आक्रामक और हिंसक हो जाते हैं।
हम अपने रोमांटिक साथी के प्रति ज्यादा वफादारी का वादा करने लगते हैं। मौत के डर से लोग कड़क और चमत्कारिक छवि वाले नेताओं को वोट देते हैं। मौत के एहसास से कई बार हम आत्मघाती भी हो जाते हैं। ज्यादा शराब पीने लगते हैं, धूम्रपान करने लगते हैं। खान-पान और खरीदारी में संयम बरतना छोड़ देते हैं। फिर हमें पर्यावरण की भी फिक्र नहीं होती। तो, इसका ये मतलब निकलता है क्या कि, मौत का वक्त पता चलने पर समाज ज्यादा नस्लवादी, डरावना, हिंसक, युद्ध की बातें करने वाला, खुद को नुकसान पहुंचाने वाला और पर्यावरण के लिए और भी बड़ा खतरा बन जाएगा?
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इतना भी डरने की बात नहीं। शेल्डन सोलोमन जैसे तमाम रिसर्चर मानते हैं कि मौत का एहसास होने के बाद इंसान और समझदार होगा। इसके डर से वो बेहतर करने की कोशिश करेगा। वैज्ञानिक इसके लिए दक्षिण कोरिया के बौद्ध भिक्षुओं की मिसाल देते हैं। मौत की याद दिलाने पर उनका बर्ताव और भी शांत हो जाता है। जब लोगों से ये पूछा जाता है कि उनकी मौत का परिवार पर कैसा असर होगा, तो भी उनकी सोच बदल जाती है। तब वो और भी परोपकारी सोच वाले हो जाते हैं। खून देने के लिए जल्दी तैयार हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि वो समाज के लिए कुछ बेहतर कर पाएं, तो जिंदगी को मकसद मिल जाएगा।
हम अपने रोमांटिक साथी के प्रति ज्यादा वफादारी का वादा करने लगते हैं। मौत के डर से लोग कड़क और चमत्कारिक छवि वाले नेताओं को वोट देते हैं। मौत के एहसास से कई बार हम आत्मघाती भी हो जाते हैं। ज्यादा शराब पीने लगते हैं, धूम्रपान करने लगते हैं। खान-पान और खरीदारी में संयम बरतना छोड़ देते हैं। फिर हमें पर्यावरण की भी फिक्र नहीं होती। तो, इसका ये मतलब निकलता है क्या कि, मौत का वक्त पता चलने पर समाज ज्यादा नस्लवादी, डरावना, हिंसक, युद्ध की बातें करने वाला, खुद को नुकसान पहुंचाने वाला और पर्यावरण के लिए और भी बड़ा खतरा बन जाएगा?
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इतना भी डरने की बात नहीं। शेल्डन सोलोमन जैसे तमाम रिसर्चर मानते हैं कि मौत का एहसास होने के बाद इंसान और समझदार होगा। इसके डर से वो बेहतर करने की कोशिश करेगा। वैज्ञानिक इसके लिए दक्षिण कोरिया के बौद्ध भिक्षुओं की मिसाल देते हैं। मौत की याद दिलाने पर उनका बर्ताव और भी शांत हो जाता है। जब लोगों से ये पूछा जाता है कि उनकी मौत का परिवार पर कैसा असर होगा, तो भी उनकी सोच बदल जाती है। तब वो और भी परोपकारी सोच वाले हो जाते हैं। खून देने के लिए जल्दी तैयार हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि वो समाज के लिए कुछ बेहतर कर पाएं, तो जिंदगी को मकसद मिल जाएगा।
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अब इन तजुर्बों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि मौत की तारीख पता होने की सूरत में शायद इंसान और समझदार हो जाए। ज्यादा जिम्मेदारी भरी जिंदगी जीने की तमन्ना करने लगे। ऑस्ट्रिया की साल्जबर्ग यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक इवा योनास कहती हैं कि, "अगर हम लोगों को ये सच्चाई स्वीकार करने के लिए प्रेरित करें कि मौत तो जिंदगी का ही हिस्सा है, तो हमारा रोजमर्रा का बर्ताव काफी बदल जाएगा। चीजों को देखने का नजरिया भी बदल जाएगा।" जब ये एहसास होगा कि हर इंसान एक ही नाव पर सवार है, तो मरने-मारने और नुकसान पहुंचाने को लेकर भी खयालात बदलेंगे।
मौत को धोखा देने का रास्ता
समाज के तौर पर हम मौत को किस तरह लेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि निजी तौर पर इंसान मौत को किस नजर से देखेगा और ये निजी सोच हर इंसान के व्यक्तित्व के हिसाब से बदल जाएगी। ब्रिटेन की नॉटिंघम यूनिवर्सिटी की लॉरा ब्लैकी कहती हैं कि, "लोग जितने ही फिक्रमंद मिजाज के होंगे, उतना ही उनकी सोच मौत की तरफ जाएगी। ऐसे लोग जिंदगी को नए मायने नहीं दे पाएंगे, लेकिन अगर किसी को ये बताया जाए कि वो 90 साल की उम्र में सोते हुए शांति से मरेगा तो, शायद वो ये कहेगा कि ये तो ठीक है और जिंदगी के सफर पर आगे बढ़ जाएगा।"
जिंदगी 13 बरस में खत्म होगी, या 113 में, इसे लेकर इंसान की सोच पर बीमार लोगों की मानसिकता से काफी रोशनी पड़ सकती है। बीमार लोग अक्सर दो तरह के विचार के शिकार होते हैं। पहले तो वो अपनी बीमारी की पड़ताल को लेकर ही शंका जाहिर करते हैं। सवाल उठाते हैं कि आखिर इसमें कितनी सच्चाई है। फिर वो सोचते हैं कि बची हुई जिंदगी का कैसे बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं, या तो वो अपनी सारी ऊर्जा बीमारी को हराने और कुछ नया करने में लगाते हैं, या फिर शांति से अब तक बिताई हुई जिंदगी के अच्छे-बुरे पहलुओं को याद करने, अपने करीबी लोगों के साथ खुशनुमा वक्त बिताने में बेहतरी समझते हैं।
मौत को धोखा देने का रास्ता
समाज के तौर पर हम मौत को किस तरह लेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि निजी तौर पर इंसान मौत को किस नजर से देखेगा और ये निजी सोच हर इंसान के व्यक्तित्व के हिसाब से बदल जाएगी। ब्रिटेन की नॉटिंघम यूनिवर्सिटी की लॉरा ब्लैकी कहती हैं कि, "लोग जितने ही फिक्रमंद मिजाज के होंगे, उतना ही उनकी सोच मौत की तरफ जाएगी। ऐसे लोग जिंदगी को नए मायने नहीं दे पाएंगे, लेकिन अगर किसी को ये बताया जाए कि वो 90 साल की उम्र में सोते हुए शांति से मरेगा तो, शायद वो ये कहेगा कि ये तो ठीक है और जिंदगी के सफर पर आगे बढ़ जाएगा।"
जिंदगी 13 बरस में खत्म होगी, या 113 में, इसे लेकर इंसान की सोच पर बीमार लोगों की मानसिकता से काफी रोशनी पड़ सकती है। बीमार लोग अक्सर दो तरह के विचार के शिकार होते हैं। पहले तो वो अपनी बीमारी की पड़ताल को लेकर ही शंका जाहिर करते हैं। सवाल उठाते हैं कि आखिर इसमें कितनी सच्चाई है। फिर वो सोचते हैं कि बची हुई जिंदगी का कैसे बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं, या तो वो अपनी सारी ऊर्जा बीमारी को हराने और कुछ नया करने में लगाते हैं, या फिर शांति से अब तक बिताई हुई जिंदगी के अच्छे-बुरे पहलुओं को याद करने, अपने करीबी लोगों के साथ खुशनुमा वक्त बिताने में बेहतरी समझते हैं।
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पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के क्रिस फ्यूडटनर कहते हैं कि जब लोग मौत की घड़ी करीब देखते हैं, तो, उनके दो अलग-अलग दिशाओं में चल पड़ने का अंदेशा रहता है, जो इसे हराने की दिशा में जाना चाहते हैं, वो पूरी ताकत से मौत को टालने की जुगत भिड़ाने लगते हैं। जैसे किसी को ये बता दिया जाए कि वो डूबने से मरेगा, तो वो शख्स तैराकी की जोरदार ट्रेनिंग में जुट जाता है। इसी तरह अगर किसी को कहा जाए कि वो सड़क हादसे में मरेगा, तो वो शायद घर से निकलने से ही कतराए।
क्रिस के मुताबिक, कुछ लोग मौत को धोखा देने के रास्ते पर भी चल पड़ते हैं। इससे उन्हें हालात पर खुद के काबू होने का एहसास होता है। मौत की सजा पाने वाले जो लोग नियति को स्वीकार कर लेते हैं, वो बचे हुए वक्त का बेहतर इस्तेमाल करने की सोचते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक तौर पर ज्यादा क्रिएटिव हो जाते हैं। क्रिस कहते हैं कि, "मौत का दिन पता होने पर इंसान का बेहतर किरदार सामने आएगा। तब हम अपने परिवार और समाज के लिए ज्यादा योगदान देने के लिए प्रेरित होंगे।"
लॉरा ब्लैकी कहती हैं कि भयानक तजुर्बों से गुजरने वालों में ये पॉजिटिव बदलाव देखे गए हैं। वो जिंदगी की अहमियत को ज्यादा शिद्दत से समझने लगते हैं।
वैसे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो मौत करीब देख कर हथियार डाल देते हैं। उन्हें लगता है कि जब मर ही जाना है, तो कुछ भी करने से क्या फायदा। उनका शराब पीना और धूम्रपान करना तेज हो जाता है। कई लोग ड्रग भी लेने लगते हैं। फिर वो सेहत का खयाल कम करने लगते हैं।
वैसे, शेल्डन सोलोमन कहती हैं कि ज्यादातर लोग मौत का दिन जानने के बाद बीच का रास्ता चुनेंगे। कभी वो बेतरतीब खान-पान करेंगे तो कभी उनका बर्ताव समाज और परिवार के प्रति ज्यादा जिम्मेदारी भरा भी होगा। क्रिस फ्यूडटनर कहते हैं कि इंसान आम तौर पर बदलाव से तनाव में आ जाता है। यहां तो जिंदगी के मायने ही बदल जाएंगे।
क्रिस के मुताबिक, कुछ लोग मौत को धोखा देने के रास्ते पर भी चल पड़ते हैं। इससे उन्हें हालात पर खुद के काबू होने का एहसास होता है। मौत की सजा पाने वाले जो लोग नियति को स्वीकार कर लेते हैं, वो बचे हुए वक्त का बेहतर इस्तेमाल करने की सोचते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक तौर पर ज्यादा क्रिएटिव हो जाते हैं। क्रिस कहते हैं कि, "मौत का दिन पता होने पर इंसान का बेहतर किरदार सामने आएगा। तब हम अपने परिवार और समाज के लिए ज्यादा योगदान देने के लिए प्रेरित होंगे।"
लॉरा ब्लैकी कहती हैं कि भयानक तजुर्बों से गुजरने वालों में ये पॉजिटिव बदलाव देखे गए हैं। वो जिंदगी की अहमियत को ज्यादा शिद्दत से समझने लगते हैं।
वैसे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो मौत करीब देख कर हथियार डाल देते हैं। उन्हें लगता है कि जब मर ही जाना है, तो कुछ भी करने से क्या फायदा। उनका शराब पीना और धूम्रपान करना तेज हो जाता है। कई लोग ड्रग भी लेने लगते हैं। फिर वो सेहत का खयाल कम करने लगते हैं।
वैसे, शेल्डन सोलोमन कहती हैं कि ज्यादातर लोग मौत का दिन जानने के बाद बीच का रास्ता चुनेंगे। कभी वो बेतरतीब खान-पान करेंगे तो कभी उनका बर्ताव समाज और परिवार के प्रति ज्यादा जिम्मेदारी भरा भी होगा। क्रिस फ्यूडटनर कहते हैं कि इंसान आम तौर पर बदलाव से तनाव में आ जाता है। यहां तो जिंदगी के मायने ही बदल जाएंगे।