जुलाई, 1518 फ्रांस के स्ट्रॉसबर्ग शहर में अचानक एक महिला ने नाचना शुरू कर दिया। कई दिनों बाद भी वो महिला ऐसे ही नाचती रही। एक सप्ताह के अंदर करीब 100 और लोगों को नाचने की तलब होने लगी। उस वक्त वहां के अधिकारियों को लगा कि इस बीमारी का इलाज भी दिन-रात नाचने से ही होगा। उन लोगों को एक अलग कर एक हॉल में ले जाया गया।
डांस जारी रखने में मदद करने के लिए वहां बांसुरी और ड्रम बजाने वालों की व्यवस्था की गई। पेशेवर नर्तकों को पैसे दिए गए ताकि लोगों को हौंसला बना रहे। लेकिन कुछ ही दिनों में कमजोर दिल वाले लोगों ने दम तोड़ना शुरू कर दिया। अगस्त 1518 के अंत तक करीब 400 लोग इस पागलपन का शिकार हो चुके थे। आखिरकार उन्हें ट्रकों में भरकर स्वास्थ्य केंद्र ले जाना पड़ा था।
सितंबर के शुरुआत में ये बीमारी खत्म होनी शुरू हुई। लेकिन ये पहली बार नहीं था कि यूरोप में एक ऐसी बीमारी फैली थी। साल 1518 से पहले 10 बार इसी तरह की महामारी फैल चुकी थी। साल 1674 में आज के बेल्जियम के कई शहर ऐसी बीमारी की चपेट में थे, लेकिन 1518 की घटना के बारे में ज्यादा दस्तावेज मौजूद हैं। लेकिन यूरोप में यकीनन ही ये अपने तरह की पहली और आखिरी घटना नहीं थी।
एक प्रचलित मान्यता के अनुसार ये नर्तक अर्गाट नाम का एक फंगस अपने शरीर में इंजेक्ट करते थे। लेकिन इसकी उम्मीद कम है क्योंकि अर्गाट खून का सप्लाई रोक देता है जिससे समन्वय बिठाकर नाचना मुश्किल हो जाता है। ये भी मान्यता है कि ये लोग एक विधर्मी पंथ का हिस्सा थे। लेकिन ये भी मुश्किल लगता है क्योंकि पीड़ित भी नृत्य नहीं करना चाहते थे।
नर्तकियों ने भी मदद की जरूरत जताई थी। इसके अलावा इन लोगों को कभी धर्म के खिलाफ नहीं माना जाता था। कुछ लोग इन्हें एक कलेक्टिव हिस्टीरिया भी मानते हैं, ये मुमकिन है क्योंकि 1518 में स्टार्सबर्ग के गरीब भूख, बीमारी और आध्यात्मिक निराशा से जूझ रहे थे। मेरा मानना है कि ये नर्तक अवचेतन की अवस्था में थे, क्योंकि अगर ये नहीं होता तो वो इतनी देर तक नाच नहीं पाते।