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देखिए, दुनिया की सबसे बड़ी टैक्स फ्री रसोई, जहां रोज एक लाख लोग फ्री खाते खाना

Sun, 17 Jun 2018 09:49 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 17 Jun 2018 09:49 AM IST
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chandigarh, biggest kitchen of the world, where millions of people eat langar everyday
Amritsar golden temple kitchen
दुनिया में एक इतनी बड़ी रसोई है, जहां एक घंटे में 25 हजार रोटियां बनती हैं और रोज लाखों लोग मुफ्त खाना खाते हैं। ये विशाल रसोई है, अमृतसर स्थित वर्ल्ड फेमस गुरुद्वारा गोल्डन टैंपल में। गुरुद्वारा के विशाल परिसर में मौजूद गुरु रामदास लंगर हाल में रोजाना 70 हजार से एक लाख तक लोग मुफ्त लंगर ग्रहण करते हैं। छुटिटयों में ये आंकड़ा बढ़ जाता है। खाने का स्वाद भी लजीज होता है।

 
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वहीं, अब इस रसोई को लेकर बहुत बड़ी खुशखबरी आई है। दरअसल, केंद्रीय सरकार ने इस रसोई को बिल्कुल टैक्स फ्री कर दिया है। अब इसमें बनने वाले लंगर पर जीएसटी नहीं लगाया जाएगा। केंद्रीय मंत्री हरसिमरत बादल ने ट्वीट करके यह जानकारी दी। बता दें कि लंगर पर जीएसटी लगाए जाने की खिलाफत करते हुए एसजीपीसी ने प्रधानमंत्री मोदी, वित्तमंत्री और पंजाब सीएम को पत्र लिखा था।
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गोल्डन टेंपल की रसोई
जान लें कि लंगर में ऑटोमेटिक रोटी मेकर मशीन से एक घंटे में 25 हजार रोटी बनती है। इसके अलावा रोजाना 70 क्विंटल आटा, 20 क्विंटल दाल, सब्जियां, 12 क्विंटल चावल लगता है। 500 किलो देसी घी इस्तेमाल होता है। सौ गैस सिलेंडर, 500 किलो लकड़ी की खपत होती है। गोल्डन टैंपल में 24 घंटे लंगर चलता है। शुद्ध शाकाहारी भोजन तैयार करने वाले यहां के कर्मचारी नहीं, ब्लकि सेवादार होते हैं, जोकि सेवाभाव से श्रद्धालुओं से लंगर तैयार करते हैं।
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गोल्डन टेंपल की रसोई
बाद में उन्हें पंक्तियों में बैठाकर ग्रहण करवाते हैं। सभी कुछ काफी प्रेमभाव से होता है। गुरु रामदास लंगर के मैनेजर का कहना है कि भोजन में क्या-क्या पकेगा, यह पहले से ही तय होता है। जैसे ही लोग पंक्तियों में बैठते हैं, तुरंत भोजन परोसना शुरू कर दिया जाता है। जैसे ही वे भोजन खाकर उठते हैं, बैटरी चालित मशीन से लंगर हाल की सफाई कर दी जाती है ताकि दूसरे लोग आकर बैठ सकें।
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अमृतसर के गोल्डन टेंपल में दुनिया की सबसे बड़ी रसोई - फोटो : अमर उजाला
मैनेजर कहते हैं कि इतनी बड़ी रसोई से रोजाना खाना बनाने के लिए पैसा दुनिया में बसे लाखों सिख परिवार भेजते हैं। वे अपनी कमाई का दसवां भाग गुरुद्वारों की सेवा में अर्पित करते हैं। इन्हीं पैसों से गुरुद्वारों की प्रबंध और लंगर का खर्च चलता है। शिरोमणि कमेटी के प्रधान कहते हैं कि चूंकि लंगर का सारा कामकाज सेवा भावना और मन से किया जाता है, इसलिए यहां सब-कुछ अच्छा होता है।
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