Sea Anemones: इंसानों की सुनने की क्षमता को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़ा राज खोला है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि इंसानों को एक समुद्री जीव से सुनने की क्षमता मिली है। जिस जीन्स से इंसानों में सुनने की क्षमता विकसित होती है, वह समुद्री जीव से जुड़ा हुआ है। समुद्री एनिमोन्स (Sea Anemones) नाम के जीव से यह जीन्स विकसित हुआ है। अब आपके मन में यह सवाल खड़ा हो रहा है कि कोई समुद्री जीव इंसान के कानों से कैसे जुड़ सकता है? लेकिन वैज्ञानिकों ने बताया है कि यह बिल्कुल सच है। आइए जानते हैं कि इंसानों के सुनने की क्षमता और इस समुद्री जीव में क्या संबंध है?
इस समुद्री जीव का वैज्ञानिक का नाम नीमैटोस्टेला वेक्टेनसि है जिसमें एक जीन मिलता है। इस जीन को पो-फोर (Pou-iv) कहा जाता है और यह एनिमोन्स की सूंड में पाया जाता है। यह उसको छूकर महसूस करने की शक्ति देता है। निडारिया इस जीव का फाइलम है और बाइलेटेरिया का इससे नजदीकी संबंध है।
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समुद्री जीव से मिली है इंसानों को सुनने की क्षमता
- फोटो : iStock
इसानों की तरह ही इस जीव का शरीर बाइलेटरली संतुलित होता है। 74.8 से 60.4 करोड़ साल पहले इंसान और इस जीव के पूर्वज धरती पर रहते थे। समुद्री एनिमोन्स, बाइलेटेरिया और इंसान के पूर्वज का एक तरह से आपस में संबंध है। इनमें छूकर महसूस करने की क्षमता वाले अंगों को विकास हुआ है जिसे सेंसरी ऑर्गन कहते हैं। इसानों में इनका सुनने की क्षमता में बदलाव हो गया।
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यूनिवर्सिटी ऑफ अर्कंसास के बायोलॉजिस्ट नागायासू नाकानिशी ने इस स्टडी को रोचक बताया है। अब इससे यह जानकारी मिलेगी कि समुद्री एनिमोन्स में मेकैनोसेंसेशन का विकास कैसे हुआ? इससे यह भी खुलासा हुआ है कि प्री-कैंब्रियन काल के दौरान इंसानों की सुनने की क्षमता का विकास हुआ था।
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समुद्री जीव से मिली है इंसानों को सुनने की क्षमता
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नागायासू ने बताया कि स्तनधारियों में हेयर सेल्स पो-फोर के कारण विकसित होता है। उन्होंने बताया कि चूहों में इस जीन के निष्क्रिय होने के बाद वह बहरे हो जाते हैं। समुद्री एनिमोन्स के सूड में वैसे ही मेकैनोसेंसरी हेयर सेल्स पाए जाते हैं। हेयर सेल्स के उसे छूने से महसूर करने की क्षमता मिलती है।
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वैज्ञानिकों ने यह संभावना जताई है कि सेंसर हेयर सेल्स से उनको सुनने की क्षमता मिलती हो, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है। यह जीन कैसे काम करते हैं? बायोलॉजिस्ट इथन ओजमेंट और उनकी टीम जानने की कोशिश की। उन्होंने इसके लिए CRISPR-Cas9 जीन एडिटिंग टूल का इस्तेमाल किया।