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सिराजुद्दौला: वो शख्स, जिसकी बर्बर हत्या के बाद भारत में हुआ अंग्रेजों का एकछत्र राज

Mon, 23 Nov 2020 09:16 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नवनीत राठौर Updated Mon, 23 Nov 2020 09:16 AM IST
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history of siraj ud-daulah brutal assassination took place british rule in india
नवाब सिराजुद्दौला - फोटो : सोशल मीडिया

23 जून, 1757 को प्लासी की लड़ाई हारने के बाद सिराजुद्दौला एक ऊंट पर सवार हो कर भागे थे और सुबह होते-होते मुर्शिदाबाद पहुंच गए थे। अगले ही दिन रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को एक नोट भिजवाया जिसमें लिखा था, ''मैं इस जीत पर आपको बधाई देता हूं। ये जीत मेरी नहीं आपकी है। मुझे उम्मीद है कि मुझे आपको नवाब घोषित करवा पाने का सम्मान मिलेगा।''



इससे पहले उसी सुबह जब नर्वस और थके दिख रहे मीर जाफर ने अंग्रेज कैंप में अपनी हाजिरी लगाई थी तो अंग्रेज सैनिक उन्हें कर्नल क्लाइव के तंबू में ले गए थे। क्लाइव ने मीर जाफर को सलाह दी कि वो फौरन राजधानी मुर्शिदाबाद की तरफ कूच करें और उसपर अपना नियंत्रण कर लें। उन्होंने कहा था कि मीर जाफर के साथ उनके कर्नल वॉट्स भी चलेंगे। क्लाइव मुख्य सेना के साथ उनके पीछे-पीछे आए और उन्हें मुर्शिदाबाद तक की 50 मील की दूरी तय करने में तीन दिन लग गए। रास्ते में सड़कों पर छोड़ी गई तोपें, टूटी हुई गाड़ियां और सिराजुद्दौला के सैनिकों और घोड़ों की लाशें पड़ी हुई थीं।

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नवाब सिराजुद्दौला - फोटो : Social media
सर पेंडेरल मून अपनी किताब 'द ब्रिटिश कॉक्वेस्ट एंड डॉमीनियन इन इंडिया' में लिखते हैं, ''वैसे तो क्लाइव को 27 जून को मुर्शिदाबाद पहुंच जाना था लेकिन जगत सेठ ने उन्हें आगाह किया कि उनकी हत्या करने की योजना बनाई जा रही है इसलिए 29 जून को क्लाइव शहर में दाखिल हुए। मीर जाफर ने शहर के मुख्य द्वार पर उनका स्वागत किया और उनके साथ साथ क्लाइव शहर में घुसे। रॉबर्ट क्लाइव ने ही मीर जाफर को सिंहासननुमा मसनद पर बैठाया और उन्हें सैल्यूट किया। फिर उन्होंने ऐलान किया कि कंपनी मीर जाफर के शासन में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी और सिर्फ तिजारती मामलों पर उसकी नजर रहेगी।'' इस लड़ाई के 180 साल बाद तक अंग्रेज भारत पर एकछत्र राज करते रहे।
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रॉबर्ट क्लाइव - फोटो : सोशल मीडिया

रातों-रात यूरोप के सबसे अमीर शख्स बने क्लाइव

क्लाइव को सिराजुद्दौला के खजाने में पांच करोड़ रुपए मिले जो उनकी उम्मीद से कम थे। मशहूर इतिहासकार विलियम डैलरिंपिल अपनी किताब 'द अनार्की' में लिखते हैं, 'क्लाइव को इस जीत के लिए निजी तौर पर दो लाख 34 हजार पाउंड के बराबर धन मिलने वाला था। इसके अलावा वो प्रति वर्ष 27 हजार पाउंड की आमदनी देने वाली जागीर के मालिक भी होने वाले थे। अगर उन्हें ये सारा धन मिल जाता तो सिर्फ 33 साल की उम्र में रॉबर्ट क्लाइव अचानक यूरोप के सबसे अमीर लोगों में से एक होने वाले थे। अगले कुछ दिन बहुत तनाव में बीते। क्लाइव को डर था कि कहीं मीर जाफर अपने वादे से फिर न जाएं। वो दोनों एक दूसरे को इस तरह ताड़ने की कोशिश कर रहे थे जैसे दो बड़े गुंडे बड़ी लूट के बाद उसका हिस्सा करने के लिए बैठते हैं।'

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नवाब सिराजुद्दौला - फोटो : Social media
सुबह तीन बजे छिपकर भागे थे सिराजुद्दौला


जहां क्लाइव लूट में अपना हिस्सा मिलने का इंतजार कर रहे थे, वहीं मीर जाफर के बेटे मीरान ने पूरे बंगाल में राजधानी से भाग चुके सिराजुद्दौला को ढूंढने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मशहूर इतिहासकार सैयद गुलाम हुसैन खां अपनी फारसी में लिखी किताब 'सियारुल मुताखिरीं' में लिखा है, 'सिराजुद्दौला आम आदमियों के कपड़े पहनकर भागे थे। उनके साथ उनके नजदीकी रिश्तेदार और कुछ जन्खे (किन्नर) भी थे। सुबह तीन बजे उन्होंने अपनी पत्नी लुत्फ उन निसा और कुछ नजदीकी लोगों को ढंकी हुई गाड़ियों में बैठाया, जितना सोना-जवाहरात वो अपने साथ ले जा सकते थे, अपने साथ लिया और राजमहल छोड़ कर भाग गए।'


वो पहले भगवानगोला गए और फिर दो दिन बाद कई नावें बदलते हुए राजमहल के किनारे पहुंचे। यहां पर वो कुछ खाने के लिए रुके। उन्होंने खिचड़ी बनवाई क्योंकि उन्होंने और उनके साथ चल रहे लोगों ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था।
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रॉबर्ट क्लाइव - फोटो : सोशल मीडिया

फकीर की मुखबिरी की वजह से गिरफ्तार हुए

इसी इलाके में रह रहे एक फकीर शाह दाना ने मुखिबरी करते हुए सिराजुदौला के वहां पहुंचने की खबर उनके दुश्मनों तक पहुंचा दी जो उन्हें ढ़ूंढने के लिए दिन-रात एक कर रहे थे। मीर जाफर के दामाद मीर कासिम ने ये खबर मिलते ही नदी पार की और सिराजुद्दौला को अपने हथियारबंद लोगों से घेर लिया। सिराजुद्दौला को गिरफ्तार करके 2 जुलाई, 1757 को मुर्शिदाबाद लाया गया। उस समय रॉबर्ट क्लाइव मुर्शिदाबाद में ही मौजूद थे। उनके पहुंचने से पहले ही वो फोर्ट विलियम में अपने साथियों को पत्र लिख चुके थे। इस पत्र में उन्होंने लिखा था, 'मुझे उम्मीद है कि मीर जाफर गद्दी से हटाए गए नवाब के प्रति वो हर शिष्टाचार दिखाएंगे जो इन परिस्थितियों में संभव है।'

इसके दो दिनों बाद इन्होंने एक और पत्र लिखा जिसमें उन्होंने बताया, 'सिराजुद्दौला अब इस दुनिया में नहीं हैं। नवाब मीर जाफर शायद उनको बख्श देते लेकिन उनके बेटे मीरान ने सोचा कि देश में शांति के लिए सिराजुद्दौला का मरना जरूरी है। उनको कल सुबह खोशबाग में दफना दिया गया।'

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