23 जून, 1757 को प्लासी की लड़ाई हारने के बाद सिराजुद्दौला एक ऊंट पर सवार हो कर भागे थे और सुबह होते-होते मुर्शिदाबाद पहुंच गए थे। अगले ही दिन रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को एक नोट भिजवाया जिसमें लिखा था, ''मैं इस जीत पर आपको बधाई देता हूं। ये जीत मेरी नहीं आपकी है। मुझे उम्मीद है कि मुझे आपको नवाब घोषित करवा पाने का सम्मान मिलेगा।''
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रातों-रात यूरोप के सबसे अमीर शख्स बने क्लाइव
क्लाइव को सिराजुद्दौला के खजाने में पांच करोड़ रुपए मिले जो उनकी उम्मीद से कम थे। मशहूर इतिहासकार विलियम डैलरिंपिल अपनी किताब 'द अनार्की' में लिखते हैं, 'क्लाइव को इस जीत के लिए निजी तौर पर दो लाख 34 हजार पाउंड के बराबर धन मिलने वाला था। इसके अलावा वो प्रति वर्ष 27 हजार पाउंड की आमदनी देने वाली जागीर के मालिक भी होने वाले थे। अगर उन्हें ये सारा धन मिल जाता तो सिर्फ 33 साल की उम्र में रॉबर्ट क्लाइव अचानक यूरोप के सबसे अमीर लोगों में से एक होने वाले थे। अगले कुछ दिन बहुत तनाव में बीते। क्लाइव को डर था कि कहीं मीर जाफर अपने वादे से फिर न जाएं। वो दोनों एक दूसरे को इस तरह ताड़ने की कोशिश कर रहे थे जैसे दो बड़े गुंडे बड़ी लूट के बाद उसका हिस्सा करने के लिए बैठते हैं।'
जहां क्लाइव लूट में अपना हिस्सा मिलने का इंतजार कर रहे थे, वहीं मीर जाफर के बेटे मीरान ने पूरे बंगाल में राजधानी से भाग चुके सिराजुद्दौला को ढूंढने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मशहूर इतिहासकार सैयद गुलाम हुसैन खां अपनी फारसी में लिखी किताब 'सियारुल मुताखिरीं' में लिखा है, 'सिराजुद्दौला आम आदमियों के कपड़े पहनकर भागे थे। उनके साथ उनके नजदीकी रिश्तेदार और कुछ जन्खे (किन्नर) भी थे। सुबह तीन बजे उन्होंने अपनी पत्नी लुत्फ उन निसा और कुछ नजदीकी लोगों को ढंकी हुई गाड़ियों में बैठाया, जितना सोना-जवाहरात वो अपने साथ ले जा सकते थे, अपने साथ लिया और राजमहल छोड़ कर भाग गए।'
वो पहले भगवानगोला गए और फिर दो दिन बाद कई नावें बदलते हुए राजमहल के किनारे पहुंचे। यहां पर वो कुछ खाने के लिए रुके। उन्होंने खिचड़ी बनवाई क्योंकि उन्होंने और उनके साथ चल रहे लोगों ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था।
फकीर की मुखबिरी की वजह से गिरफ्तार हुए
इसी इलाके में रह रहे एक फकीर शाह दाना ने मुखिबरी करते हुए सिराजुदौला के वहां पहुंचने की खबर उनके दुश्मनों तक पहुंचा दी जो उन्हें ढ़ूंढने के लिए दिन-रात एक कर रहे थे। मीर जाफर के दामाद मीर कासिम ने ये खबर मिलते ही नदी पार की और सिराजुद्दौला को अपने हथियारबंद लोगों से घेर लिया। सिराजुद्दौला को गिरफ्तार करके 2 जुलाई, 1757 को मुर्शिदाबाद लाया गया। उस समय रॉबर्ट क्लाइव मुर्शिदाबाद में ही मौजूद थे। उनके पहुंचने से पहले ही वो फोर्ट विलियम में अपने साथियों को पत्र लिख चुके थे। इस पत्र में उन्होंने लिखा था, 'मुझे उम्मीद है कि मीर जाफर गद्दी से हटाए गए नवाब के प्रति वो हर शिष्टाचार दिखाएंगे जो इन परिस्थितियों में संभव है।'
इसके दो दिनों बाद इन्होंने एक और पत्र लिखा जिसमें उन्होंने बताया, 'सिराजुद्दौला अब इस दुनिया में नहीं हैं। नवाब मीर जाफर शायद उनको बख्श देते लेकिन उनके बेटे मीरान ने सोचा कि देश में शांति के लिए सिराजुद्दौला का मरना जरूरी है। उनको कल सुबह खोशबाग में दफना दिया गया।'