20वीं सदी के शुरुआत में बंगाल में चल रहा राष्ट्रवादी आंदोलन अपने चरम पर था, जो ब्रिटिश सरकार के लिए एक अच्छी खासी चुनौती बन चुका था। इस आंदोलन को को बंद करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने बंगाल का विभाजन करना सही समझा। साल 1905 में ब्रिटिश भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल लार्ज कर्जन ने बंगाल के विभाजन का ऐलान कर दिया। लेकिन अंग्रेजों के इस चाल का उस समय गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर समेत कई नेताओं ने विरोध किया।
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लॉर्ड कर्जन
- फोटो : सोशल मीडिया
ब्रिटिश गर्वनर लॉर्ड कर्जन के साथ हुई बातचीत में मुस्लिम नेता बंगाल विभाजन पर राजी हुए, जिसके तहत पूर्व में असम और सिलहट वाले इलाके मुस्लिम बहुल आबादी के लिए और पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा के हिस्से हिंदू बहुल आबादी के लिए तय किए गए। विभाजन से पहले बंगाल क्षेत्रफल में फ्रांस जितना बड़ा था और इसकी आबादी फ्रांस से कई गुना ज्यादा थी। इतने बड़े सूबे का प्रशासनिक बागडोर संभालने में ब्रिटिश सरकार को काफी मुश्किलें हो रही थी।
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बंगाल विभाजन
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ब्रिटिश हुकुमत के द्वारा किए गए बंगाल विभाजन का पूरे देश में विरोध होने लगा। कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के इस फैसले पर स्वदेशी अभियान की घोषणा की, जिसके तहत सारे विदेशी सामानों का बहिष्कार किया जाना था। ऐसे में पूरे देश में विदेशी कपड़ों को होलिका दहन की तरह जलाया जाना एक आम बात हो गई। लेकिन बंगाल ने अंग्रेजों के इस फैसले का विरोध करने के लिए एक अलग और अनोखा रास्ता अख्तियार किया, जिसके प्रणेता थे रवींद्रनाथ टैगोर।
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रवींद्रनाथ टैगोर
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रक्षाबंधन का त्योहार सावन महीने में आने वाला था। रबींद्रनाथ टैगोर ने भाईचारे और आपसी सद्भाव के लिए रक्षा के सूत्र के बंधन को प्रतीक रूप में लेकर ब्रिटिश नीति के खिलाफ दोनों समुदायों को एकजुट होने की अपील की। उनके इस अपील का व्यापक असर हुआ। कोलकाता, ढाका और सिलहट में सैकड़ों हिंदू और मुसलमान एकता को दर्शाने के लिए सड़कों पर आए और एक दूसरे को राखी बांधकर रक्षाबंधन के त्योहार को ऐतिहासिक रूप से सांप्रदायिक सद्भाव का त्योहार बना दिया।
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बंगाल विभाजन
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बंगाल की लोगों की एकता और ब्रिचिश सरकार के बंग विभाजन के कदम से देशभर के लोगों में गुस्सा फैल गया। अंग्रेजों के इस फैसले के विरोध में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन हुए। वहीं कांग्रेस ने कलकत्ता अधिवेशन में इस विभाजन के खिलाफ रिजॉल्यूशन पारित किया था। बंगाल में लोगों की एकता और देशभर में हो रहे विरोध-प्रदर्शन से ब्रिटिश हुकूमत पर दबाव बढ़ गया था।