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Electric Vehicles: ईवी निर्माण में आत्मनिर्भर बनने की राह पर भारत, लेकिन क्या है एक बड़ी चुनौती जो अभी भी बाकी

Thu, 25 Jun 2026 06:30 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amar Sharma Updated Thu, 25 Jun 2026 06:30 PM IST
सार

भारत अगले पांच वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के कई महत्वपूर्ण पुर्जों के निर्माण में बड़ी छलांग लगा सकता है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, देश 2030 तक कई हाई-वैल्यू EV कंपोनेंट्स में 90 से 100 प्रतिशत तक लोकलाइजेशन हासिल कर सकता है। हालांकि, इस आत्मनिर्भरता की राह में एक बड़ी बाधा अभी भी बनी हुई है। जानें पूरी डिटेल्स।

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India Could Achieve 100% EV Component Localisation by 2030, But Semiconductor and Rare-Earth Dependence Remain
Electric Vehicles - फोटो : Amar Ujala

भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए एक बेहद उम्मीदों भरी, लेकिन साथ ही सचेत करने वाली रिपोर्ट सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 'इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस' (IEEFA) और 'JMK रिसर्च एंड एनालिटिक्स' की एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि, भारत साल 2030 तक कई हाई-वैल्यू इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) कंपोनेंट श्रेणी में 90 से 100 प्रतिशत तक स्थानीयकरण हासिल कर सकता है। यानी ईवी के ज्यादातर पार्ट्स भारत में ही बनने लगेंगे।

लेकिन, पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनने की इस रफ्तार के सामने एक बहुत बड़ा रोड़ा अभी भी अटका हुआ है। और वह है आयातित सेमीकंडक्टर (इम्पोर्टेड चिप्स), दुर्लभ पृथ्वी चुंबक (रेयर अर्थ मैग्नेट्स) और एडवांस मटेरियल्स पर भारत की भारी निर्भरता।

India Could Achieve 100% EV Component Localisation by 2030, But Semiconductor and Rare-Earth Dependence Remain
Electric Vehicles - फोटो : Adobe Stock

किन कंपोनेंट्स में भारत हासिल कर सकता है 100% तक आत्मनिर्भरता?

रिपोर्ट के अनुसार, अगर कंपनियों द्वारा एलान की गई मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं समय पर शुरू हो जाती हैं और सप्लायर इकोसिस्टम मजबूत होता है। तो अगले पांच वर्षों में भारत की घरेलू विनिर्माण क्षमताएं काफी बढ़ जाएंगी।

बैटरी को छोड़कर अन्य ईवी-विशिष्ट प्रणालियों में भारत के पास घरेलू स्तर पर पार्ट्स बनाने के सबसे बड़े मौके हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • इलेक्ट्रिक मोटर्स और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स

  • थर्मल सिस्टम्स और व्हीकल कंट्रोल यूनिट्स (VCUs)

  • चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और चार्जर्स

ईवी मार्केट की रफ्तार: वित्त वर्ष 2020 (FY2020) के बाद से भारत का ईवी बाजार लगभग 14 गुना बढ़ा है। वित्त वर्ष 2026 (FY2026) में कुल ईवी रजिस्ट्रेशन में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर, थ्री-व्हीलर, बस और पैसेंजर गाड़ियों की हिस्सेदारी 99% रही है, जो इस बाजार के तेजी से विस्तार को दर्शाती है।

India Could Achieve 100% EV Component Localisation by 2030, But Semiconductor and Rare-Earth Dependence Remain
Electric Vehicles - फोटो : Adobe Stock

स्थानीयकरण के मामले में अब तक क्या प्रगति हुई है?

भारत ने उन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा मजबूती दिखाई है जो उसके मौजूदा ऑटोमोटिव मैन्युफैक्चरिंग बेस से मेल खाते हैं:

  • घरेलू सोर्सिंग में आगे: स्ट्रक्चरल कंपोनेंट्स, वायरिंग हार्नेस, सस्पेंशन सिस्टम, ब्रेकिंग सिस्टम और थर्मल सिस्टम में पहले से ही ऊंचे स्तर का घरेलू उत्पादन हासिल किया जा चुका है।

  • ग्लोबल कंपनियों का निवेश: ट्रैक्शन मोटर्स, मोटर कंट्रोलर्स और चार्जिंग सिस्टम जैसे क्षेत्रों में निवेश तेजी से बढ़ रहा है। बॉश (Bosch), वैलियो (Valeo), निडेक (Nidec), ऊनो मिंडा (Uno Minda) और एक्जीकॉम (Exicom) जैसी कंपनियों ने भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं का विस्तार किया है।

  • PLI स्कीम का दम: हाल ही में ईवी कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को लेकर जितने भी एलान हुए हैं, उनमें से लगभग 60 प्रतिशत उन कंपनियों से आए हैं जिन्हें ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना के तहत मंजूरी मिली हुई है।

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India Could Achieve 100% EV Component Localisation by 2030, But Semiconductor and Rare-Earth Dependence Remain
Electric Vehicles - फोटो : Freepik

आत्मनिर्भरता की राह में कौन सी बड़ी बाधाएं (Hurdles) खड़ी हैं?

रिपोर्ट में एक गंभीर चेतावनी दी गई है कि केवल भारत में कंपोनेंट्स को असेंबल (इकट्ठा) कर लेने का मतलब यह नहीं है कि देश में वास्तविक वैल्यू क्रिएशन हो रहा है। इसके पीछे दो मुख्य विवशताएं हैं:

  • विदेशी चिप और चुंबक पर निर्भरता: अध्ययन किए गए 12 प्रमुख ईवी कंपोनेंट्स में से लगभग 8 में ऐसे महत्वपूर्ण सब-कंपोनेंट्स इस्तेमाल होते हैं जो वर्तमान में भारत में नहीं बनते। ईवी मोटर्स, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और चार्जिंग उपकरणों के लिए सेमीकंडक्टर और दुर्लभ पृथ्वी चुंबक सबसे बड़ी बाधा हैं।

  • भू-राजनीतिक जोखिम: दुनिया भर के लगभग 90 प्रतिशत दुर्लभ पृथ्वी चुंबक प्रोसेसिंग पर अकेले चीन का नियंत्रण है। वहीं, वैश्विक सेमीकंडक्टर निर्माण क्षमता का लगभग 74 प्रतिशत हिस्सा ताइवान और पूर्वी एशिया में केंद्रित है। ऐसे में वैश्विक सप्लाई चेन में रुकावट आने पर भारत के ईवी उद्योग पर सीधा असर पड़ सकता है।

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India Could Achieve 100% EV Component Localisation by 2030, But Semiconductor and Rare-Earth Dependence Remain
Electric Vehicles - फोटो : Adobe Stock

सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में क्या चुनौतियां आ रही हैं?

हालांकि सरकार ने FAME II, PLI ऑटो स्कीम और इलेक्ट्रॉनिक्स व सेमीकंडक्टर इंसेंटिव प्रोग्राम जैसी योजनाएं शुरू की हैं। लेकिन जमीन पर इनका क्रियान्वयन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है:

  • फंड वितरण में देरी: रिपोर्ट के अनुसार, साल 2026 की शुरुआत तक पीएलआई ऑटो योजना के तहत आवंटित 25,938 करोड़ रुपये में से 10 प्रतिशत से भी कम राशि का वितरण हो पाया था।

  • प्रमाणन में देरी: घरेलू मूल्य संवर्धन के सर्टिफिकेशन में होने वाली देरी और ARAI व ICAT जैसी एजेंसियों में टेस्टिंग की सीमाओं के कारण योजनाओं के लागू होने की रफ्तार धीमी रही है।

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