वास्तु विज्ञान से अभिप्राय है कि सभी दिशाओं से मिलने वाली ऊर्जा तरंगों का संतुलन होना। यदि ये ऊर्जा संतुलित रूप से आपको प्राप्त हो रही हैं, तो घर में सुख-शांति बनी रहेगी। वास्तु में माना जाता है कि भवन निर्माण के समय दिशाओं और विदिशाओं का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। वास्तु शास्त्र में कुल नौ दिशाओं का उल्लेख किया गया है। इन सभी दिशाओं के स्वामी और तत्व अलग-अलग होते है। आप वास्तु के कुछ सरल नियमों के माध्यम से दिशाओं को संतुलित कर सकते हैं।
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जानिए वास्तु की नौ दिशाएं आपके सुख-समृद्धि को कैसे करती हैं प्रभावित?
Mon, 11 Jan 2021 12:20 PM IST
विनोद शुक्ला
अनीता जैन, वास्तुविद
अनीता जैन, वास्तुविद
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 11 Jan 2021 12:20 PM IST
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वास्तुशास्त्र में दिशाओं का महत्व
- फोटो : अमर उजाला
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वास्तुशास्त्र में दिशाओं का महत्व
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पश्चिम दिशा
यह दिशा वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करती है और इसके स्वामी वरुणदेव हैं। लाभ की इस दिशा को बंद या दूषित करने से जीवन में निराशा, तनाव, आय में रूकावट और अधिक खर्चे होने का डर बना रहता है। पश्चिम की तुलना में पूर्व दिशा में और दक्षिण की तुलना में उत्तर दिशा में ज्यादा खुली और हल्की जगह होनी चाहिए।
यह दिशा वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करती है और इसके स्वामी वरुणदेव हैं। लाभ की इस दिशा को बंद या दूषित करने से जीवन में निराशा, तनाव, आय में रूकावट और अधिक खर्चे होने का डर बना रहता है। पश्चिम की तुलना में पूर्व दिशा में और दक्षिण की तुलना में उत्तर दिशा में ज्यादा खुली और हल्की जगह होनी चाहिए।
vastu tips
उत्तर दिशा
जल तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाली उत्तर दिशा को मातृ भाव से जुड़ा हुआ माना गया है और इसके स्वामी कुबेर हैं। इस दिशा के दूषित या बंद होने से धन, शिक्षा और सुख की कमी एवं जीवन में तरक्की के नए अवसर की कमी बनी रहती है। इस दिशा का खुला, साफ और हल्का होना आवश्यक है।
जल तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाली उत्तर दिशा को मातृ भाव से जुड़ा हुआ माना गया है और इसके स्वामी कुबेर हैं। इस दिशा के दूषित या बंद होने से धन, शिक्षा और सुख की कमी एवं जीवन में तरक्की के नए अवसर की कमी बनी रहती है। इस दिशा का खुला, साफ और हल्का होना आवश्यक है।
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दक्षिण दिशा
दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं। इस दिशा का खुला और हल्का रखना दोषपूर्ण है। इस दिशा में दरवाजे और खिड़कियां होने से रोग, शत्रुभय, मानसिक अस्थिरता एवं निर्णय लेने में कमी जैसी परेशानियां होने लगती हैं। भवन में भारी-भरकम निर्माण दक्षिण दिशा की ओर करवाना शुभ माना गया है। इससे घर के सदस्यों का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है।
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दक्षिण-पूर्व दिशा
आग्नेय कोण के रूप में यह दिशा अग्नि तत्व को प्रभावित करती है। इस दिशा के स्वामी अग्नि देव हैं। इस दिशा के दूषित या बंद होने से स्वास्थ्य समस्या आती है तथा आग लगने से जान एवं माल को नुकसान पहुँचने का भी भय बना रहता है।इस दिशा में जल से जुड़ा कोई कार्य नहीं करना चाहिए वरना अशुभ परिणाम उठाने पड़ सकते है।
आग्नेय कोण के रूप में यह दिशा अग्नि तत्व को प्रभावित करती है। इस दिशा के स्वामी अग्नि देव हैं। इस दिशा के दूषित या बंद होने से स्वास्थ्य समस्या आती है तथा आग लगने से जान एवं माल को नुकसान पहुँचने का भी भय बना रहता है।इस दिशा में जल से जुड़ा कोई कार्य नहीं करना चाहिए वरना अशुभ परिणाम उठाने पड़ सकते है।