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Astrology: शनि की राशि मकर में उच्च क्यों हो जाते हैं मंगल जबकि मंगल की राशि मेष में नीच क्यों हो जाते हैं शनि

Tue, 20 Jun 2023 12:45 PM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 20 Jun 2023 12:45 PM IST
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according to astrology why mangal give bad impact in mesh rashi and good impact in makar
astrology

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के नियम के अनुसार जो ग्रह हैं वह निरंतर गतिमान होते रहते हैं। हम सब इस बात को जानते हैं कि जो 9 ग्रह हैं वह 12 राशियों में गोचर करते हैं और अलग-अलग राशियों में अलग-अलग परिणाम देते हैं। कुछ राशियों में ग्रह बहुत अच्छे परिणाम देते हैं तो कुछ में बुरे परिणाम देते हैं और इसी आधार पर हमारे ऋषि-मुनियों ने ग्रहों की उच्च राशि, नीच राशि, मूल त्रिकोण राशि, स्वराशि ,शत्रु राशि, मित्र राशि आदि राशियों का वर्गीकरण किया। अगर हम शनि की बात करें तो शनि मेष राशि में नीच के हो जाते हैं यानी कि अच्छे परिणाम नहीं देते लेकिन मंगल शनिदेव की राशि मकर में आकर के उच्च के हो जाते हैं तो आखिरकार यह रहस्य क्या है? आज इस लेख में हम आपको इस रहस्य को समझाते हैं। 

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- फोटो : Pixabay

मंगल को वैदिक ज्योतिष में ग्रहों का सेनापति कहा गया है। सेनापति का कार्य क्या होता है? सेनापति का कार्य होता है अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार करना। अब सेनापति जब युद्ध पर लड़ाई लड़ने जाएगा तो उसकी सेना उसके पीछे-पीछे चलेगी और सेना को संभालने के लिए उसे सेवकों की आवश्यकता होगी। सेना का प्रतिनिधित्व करने के लिए मंगल स्वयं विराजमान हैं। काल पुरुष की कुंडली में जो दसवां घर है वह कर्म का भाव है और उस भाव के स्वामी हैं शनि इसीलिए जो मंगल महाराज हैं जो कि साहस और पराक्रम के प्रतीक हैं और देवताओं के सेनापति हैं वह दसवें भाव में जाकर के यानी कि शनि की राशि मकर में जाकर के उच्च के हो जाते हैं। 

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Mangal Gochar - फोटो : amar ujala
मंगल पराक्रम के प्रतीक हैं वही शनिदेव परिश्रम के प्रतीक हैं। अब कोई व्यक्ति जब मेहनत करेगा, परिश्रम करेगा तभी तो उसके पराक्रम में वृद्धि होगी। अगर सेना सेनापति का साथ देगी तभी तो सेनापति युद्ध को जीतेगा। इसीलिए वैदिक ज्योतिष में शनि देव की राशि मकर में मंगल उच्च के हो जाते हैं। 
 
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अब बात करते हैं शनिदेव की जैसा कि हम सब जानते हैं कि शनिदेव की राशि दसवें और ग्यारहवें भाव को नियंत्रित करती है। दशम भाव कर्म का भाव है और ग्यारहवां भाव उस कर्म के द्वारा मिलने वाले फल का भाव है। शनि देव तुला राशि में इसलिए उच्च के हो जाते हैं क्योंकि तुला राशि संतुलन को दर्शाती है। जब हम किसी की सेवा करते हैं तो जाहिर सी बात है कि हमें उस व्यक्ति को न्यायपरक सेवा देनी पड़ती है यानी कि संतुलित व्यवहार को अपनाना पड़ता है। 
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शनिदेव - फोटो : अमर उजाला

लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि शनिदेव मेष राशि में जा करके नीच क्यों हो जाते हैं? मेष राशि पराक्रम की राशि है। मेष राशि लग्न की राशि है। मेष राशि अग्नि तत्व राशि है यानी की मेष राशि और मेष राशि का स्वामी मंगल दोनों ग्रह उग्र है और शनिदेव सेवा के कारक हैं। अब जाहिर सी बात है कि अगर किसी का सेवक उग्र हो जाएगा, अगर किसी का सेवक ही पराक्रमी हो जाएगा और वह निर्णय लेने लगेगा तो फिर सेनापति का क्या काम है ? इसीलिए शनि देव मंगल के घर में यानी की मेष राशि में नीच के हो जाते हैं।

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