वैदिक ज्योतिष शास्त्र के नियम के अनुसार जो ग्रह हैं वह निरंतर गतिमान होते रहते हैं। हम सब इस बात को जानते हैं कि जो 9 ग्रह हैं वह 12 राशियों में गोचर करते हैं और अलग-अलग राशियों में अलग-अलग परिणाम देते हैं। कुछ राशियों में ग्रह बहुत अच्छे परिणाम देते हैं तो कुछ में बुरे परिणाम देते हैं और इसी आधार पर हमारे ऋषि-मुनियों ने ग्रहों की उच्च राशि, नीच राशि, मूल त्रिकोण राशि, स्वराशि ,शत्रु राशि, मित्र राशि आदि राशियों का वर्गीकरण किया। अगर हम शनि की बात करें तो शनि मेष राशि में नीच के हो जाते हैं यानी कि अच्छे परिणाम नहीं देते लेकिन मंगल शनिदेव की राशि मकर में आकर के उच्च के हो जाते हैं तो आखिरकार यह रहस्य क्या है? आज इस लेख में हम आपको इस रहस्य को समझाते हैं।
Astrology: शनि की राशि मकर में उच्च क्यों हो जाते हैं मंगल जबकि मंगल की राशि मेष में नीच क्यों हो जाते हैं शनि
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मंगल को वैदिक ज्योतिष में ग्रहों का सेनापति कहा गया है। सेनापति का कार्य क्या होता है? सेनापति का कार्य होता है अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार करना। अब सेनापति जब युद्ध पर लड़ाई लड़ने जाएगा तो उसकी सेना उसके पीछे-पीछे चलेगी और सेना को संभालने के लिए उसे सेवकों की आवश्यकता होगी। सेना का प्रतिनिधित्व करने के लिए मंगल स्वयं विराजमान हैं। काल पुरुष की कुंडली में जो दसवां घर है वह कर्म का भाव है और उस भाव के स्वामी हैं शनि इसीलिए जो मंगल महाराज हैं जो कि साहस और पराक्रम के प्रतीक हैं और देवताओं के सेनापति हैं वह दसवें भाव में जाकर के यानी कि शनि की राशि मकर में जाकर के उच्च के हो जाते हैं।
लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि शनिदेव मेष राशि में जा करके नीच क्यों हो जाते हैं? मेष राशि पराक्रम की राशि है। मेष राशि लग्न की राशि है। मेष राशि अग्नि तत्व राशि है यानी की मेष राशि और मेष राशि का स्वामी मंगल दोनों ग्रह उग्र है और शनिदेव सेवा के कारक हैं। अब जाहिर सी बात है कि अगर किसी का सेवक उग्र हो जाएगा, अगर किसी का सेवक ही पराक्रमी हो जाएगा और वह निर्णय लेने लगेगा तो फिर सेनापति का क्या काम है ? इसीलिए शनि देव मंगल के घर में यानी की मेष राशि में नीच के हो जाते हैं।