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बड़ी है सरकारी व निजी स्कूलों के बीच की खाई

Tue, 02 Dec 2014 01:59 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Tue, 02 Dec 2014 01:59 PM IST
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education system in uttar pradesh.

शिक्षा के प्रसार के लिए सरकारी स्कूल तो खुले लेकिन शिक्षा का स्तर नहीं बढ़ा। बहुत मजबूरी में ही गरीब लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं।

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बड़े शहर हों या छोटे, उच्च और मध्यम वर्ग अपने बच्चों को निजी या प्राइवेट स्कूल में भेजता है। सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक रूप से कमजोर लोग ही सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजते हैं। इसके पीछे अवधारणा यह है कि प्राइवेट स्कूल बेहतर हैं।
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वैसे सर्वेक्षण में शामिल लोगों की यह राय आश्चर्य में डालने वाली है कि स्कूलों की गुणवत्ता और वहां मिलने वाली सुविधाओं में उतना फासला नहीं है, जितना प्राइवेट और सरकारी स्कूल में हम मानते हैं। जैसे शिक्षा की गुणवत्ता की बात की जाए तो निजी स्कूल वाले बच्चों के माता-पिता अगर 81 फीसदी तक संतुष्ट हैं तो सरकारी स्कूल से संतुष्टि का प्रतिशत भी 59 फीसदी तक पहुंचता है। यानी शिकायत बड़ी नहीं है।
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तो क्यों भेजते हैं लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में? सुविधाओं की वजह से? शायद नहीं क्योंकि स्कूल में पीने के पानी से लेकर खेल के मैदान और लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालयों से लेकर बिजली की व्यवस्था तक कई मुद्दों पर जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि सरकारी और निजी स्कूल के बीच फासला बहुत बड़ा नहीं है।


हालांकि बड़े शहरों की अपेक्षा छोटे शहरों में अभी भी सरकारी स्कूलों से लोगों का मोह भंग नहीं हुआ। वे अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजते है, लेकिन बड़े शहरों में तो यह चाह दिखती है कि उनका बच्चा अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढ़े।
हालांकि 11 शहरों में किए गए इस सर्वे के अनुसार करीब 10 फीसदी लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते। यह आंकड़ा सरकार के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
 education

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