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गंगा का पानी, हर शहर में नई कहानी

Sun, 07 Dec 2014 08:02 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 07 Dec 2014 08:02 AM IST
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drinking water from the ganga.

ऐसे समय में, जब पूरे देश में गंगा की सफाई को लेकर चर्चा चल रही है, और सर्वोच्च न्यायालय तक की इस पर नजर है, इस सर्वे में भी यह देखने की कोशिश की गई कि गंगा किनारे के शहरों में पीने के पानी का हाल कैसा है।

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इलाहाबाद की कई खूबियां गिनाई जा सकती हैं। मसलन, कंपनी गार्डन और खुसरो बाग जैसे बगीचे, आनंद भवन जैसी राष्ट्रीय धरोहर, पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाने वाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय और भावी प्रशासनिक अधिकारियों की खदान आदि। हालांकि संगम को गिने बिना यह फेहरिस्त कभी पूरी नहीं होगी। संगम शहर की पहचान ही नहीं, रोजी-रोटी का जरिया भी है।
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शहर का बड़ा हिस्सा आज भी गंगा और यमुना के पानी का इस्तेमाल करता है। गंगा की गंदगी और क्षण-क्षण मर रही यमुना की चिंता इलाहाबाद को भी उतनी ही है, जितनी देश और दुनिया को। फिर भी इस शहर के 69 फीसदी लोग पीने के पानी की गुणवत्ता से संतुष्ट हैं।
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पीने के पानी की गुणवत्ता के मामले में सर्वे में शामिल उत्तर प्रदेश के शहरों में इलाहाबाद अव्वल है। सर्वे के नतीजों को देखें, तो इलाहाबाद के लोगों का मानना है कि गंगा मैली है फिर भी पानी पीने के लिए अच्छा है।

हालांकि कानपुर और वाराणसी में पानी के बारे में वैसी राय नहीं, जैसी इलाहाबाद की है। इन दोनों शहरों का पानी, गुणवत्ता के मामले में इलाहाबाद से कमतर है। ये दोनों शहर गंगा के किनारे बसे हैं, पर पानी को लेकर इनकी अपनी कहानी है। वाराणसी के 40 फीसदी लोग पानी की गुणवत्ता से संतुष्ट हैं, जबकि 45 फीसदी लोग पानी को न अच्छा मानते हैं और न बहुत खराब।

वहीं शहर के 15 फीसदी लोगों का मानना है कि पानी पीने लायक नहीं है। कानपुर में मात्र 37 फीसदी लोग ही पानी की गुणवत्ता से संतुष्ट हैं, जबकि उतने ही लोग पानी को न बहुत अच्छा मानते हैं और न बहुत खराब। 26 फीसदी लोग पानी से बिल्कुल संतुष्ट नहीं हैं। वे पानी की गुणवत्ता को बहुत ही खराब मानते हैं।

गंगा किनारे के तीन शहरों-इलाहाबाद, वाराणसी और कानपुर में से सबसे ज्यादा कानपुर के लोग (26 फीसदी) लोग पानी की गुणवत्ता से असंतुष्ट हैं। ऐसा मानने वालों में वाराणसी के 15 और इलाहाबाद के 18 फीसदी लोग हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी, भ्रष्टाचार हावी

पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए जेएनएनयूआरएम के अलावा कई बड़े प्रोजेक्ट अलग-अलग शहरों में शुरू किए गए। इनकी हालत देखने पर यह समझ में आ जाता है कि राजनेता और अधिकारी, दोनों ही समस्या का हल निकालना ही नहीं चाहते। योजनाएं चलाने के नाम पर ज्यादा से ज्यादा पैसा लेने की होड़ मची है।

आगरा का गंगाजल प्रोजेक्ट 354 करोड़ से 1,126 करोड़ रुपये की लागत पर पहुंच गया है। पीने के पानी की समस्या के लिए विभागों के पास वैज्ञानिक दृष्टिकोण तक नहीं है। कोई साइंटिफिक स्टडी आज तक नहीं हुई। कितनी आबादी है, उसको कितना पानी चाहिए?- इसकी सही डेमोग्राफी हमारे पास नहीं है।

लखनऊ, आगरा और कानपुर जैसे शहरों में पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर बर्बाद हो चुका है। इन शहरों की एनवॉयरमेंट असेसमेंट रिपोर्ट देखिए, तो हकीकत सामने आ जाती है।-डीके जोशी, अनुश्रवण समिति, सुप्रीम कोर्ट।

2016 तक मिलेगा पीने का साफ पानी

पीने के पानी की सबसे ज्यादा समस्या आगरा झेल रहा है। पिछले दिनों पानी के लिए हत्या तक का मामला सामने आया। मुख्य सचिव के दौरे समय वहां यमुना पार के इलाके में तुरंत 34 करोड़ रुपये की लागत से 16 नए ट्यूबवेल लगाने का प्रस्ताव बना है। अनुमति मिलते ही काम शुरू हो जाएगा।


गंगाजल प्रोजेक्ट में अंतिम स्तर पर पाइपलाइन डालने का काम शुरू कर दिया गया है। दिसंबर 2016 तक आगरा और मथुरा को इससे पानी मिलने लगेगा। राजधानी लखनऊ में गोमतीनगर वाटरवर्क्स की क्षमता को बढ़ाकर 30 से 100 क्यूसेक की जा रही है। कानपुर में जेएनएनयूआरएम में पाइपलाइन डालने का काम अभी अधूरा है। इसे तेज किया गया है। हर शहर के लिए हम अलग-अलग योजनाओं पर काम कर रहे हैं। 2016 तक इस परेशानी से छुटकारा पा लिया जाएगा। -प्रेम कुमार आसुदानी, प्रबंध निदेशक जल निगम।

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