लाल दुर्ग में 'भगवा' ने भरी बदलाव की हुंकार
लाल दुर्ग के नाम से मशहूर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने चुनावी घोषणा पत्र के जरिए कैंपस में लेफ्ट विचारधारा से जुड़े विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने का आरोप लगाया है। एबीवीपी ने कैंपस में साप्ताहिक मुद्दे में इस्राइल को विलेन के रूप में दर्शाती सोच को पढ़ाने पर विरोध की भी आवाज बुलंद की।
जेएनयू में वामपंथ का बोलबाला होने के चलते कैंपस को लाल दुर्ग कहा जाता है। 45 साल पहले विश्वविद्यालय स्थापित होने से अब तक लाल झंडे को सलाम करने वाली विचारधारा से जुड़े छात्र संगठनों के प्रत्याशी ही छात्रसंघ के सेंट्रल समेत स्कूल काउंसलर्स के पैनल में चुने जाते रहे हैं। यहां हॉस्टल और स्कॉलरशिप आदि मुद्दे पर चुनाव होते रहे हैं।
इस बार एबीवीपी ने कैंपस में लेफ्ट विचारधारा के पाठ्यक्रम को पढ़ाने का आरोप लगाते हुए बदलाव की घोषणा की है। संगठन ने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा के मौके पर पाठ्यक्रम के जरिए नए छात्रों को लेफ्ट विचारधारा से जोड़ने का आरोप लगाया। एबीवीपी के इस आरोप से लेफ्ट विचारधारा से जुड़े अन्य संगठनों ने विरोध जताना भी शुरू कर दिया है।
क्या वाकई ये बदलाव होने चाहिए?
एबीवीपी पदाधिकारियों के मुताबिक, स्कूल ऑफ लैंग्वेज के सेंटर फॉर रशियन स्टडीज ने सोवियत इतिहास को पढ़ाने की बात कही है। उनका कहना है कि सोवियत यूनियन को टूटे 24 साल हो गए, लेकिन अब भी उसी को पढ़ाया जा रहा है, जबकि आज तक आधुनिक रूस को शामिल नहीं किया गया।
इसी तरह उन्होंने इंटरनेशनल स्टडीज के सेंटर फॉर वेस्ट एशिया स्टडीज में फिलिस्तीन के इतिहास को पढ़ाने और इस्राइल के इतिहास को न जोड़ने का मामला उठाया। गाजा-इजराइल के बीच चल रही तनातनी के बीच इस्राइल को विलेन के रूप में दर्शाती विचारधारा के मुद्दे पढ़ाने का भी आरोप लगाया। इसके अलावा सेंटर फॉर पॉलिटिकल में एक मुद्दे के तहत विवेकानंद को न शामिल करने का भी आरोप है।
जेएनयू के कुलपति प्रो. एसके सोपोरी ने कहा कि यह सही है कि जेएनयू में मार्क्स विचारधारा पर आधारित पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं, लेकिन उन्हीं विषयों को पढ़ाया जाता है, जो बोर्ड ऑफ स्टडीज में पास होते हैं। इस मुद्दे पर किसी प्रोफेसर या छात्र ने लिखित में शिकायत नहीं दी है।
अगर किसी स्कूल या सेंटर में पाठ्यक्रम के माध्यम से साप्ताहिक मुद्दे में इस्राइल को विलेन बताकर पढ़ाई करवाई जा रही है तो जांच के आधार पर एग्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठक में मुद्दा उठाते हुए कार्रवाई होगी।
नाइट कल्चर में रिझाने की कोशिश
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के लाल दुर्ग में छात्रसंघ चुनावों की तैयारियां जोरों पर हैं। चालीस साल पुराने ढर्रे के आधार पर नाइट क्लचर में प्रत्याशी मतदाताओं को रिझाने में लगे हुए हैं।
वीकेंड पर ढाबा और हॉस्टल में बैठकों में वोट के जोड़-घटाव पर मंथन भी शुरू हो गया है। हाइटेक कैंपस के बावजूद जेएनयू के छात्र ढाबे, हॉस्टल व खुले मंच पर नाइट क्लचर परंपरा को बनाए हुए हैं।
अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनावों में जहां दिन को मतदाताओं को मुद्दों से रिझाया जाता है तो जेएनयू में नाइट क्लचर हावी है। दिन में क्लासरूम में मस्ती की पाठशाला के बीच मुद्दों पर चर्चा होती है लेकिन क्लासेस से बंक नहीं मारा जाता है।
दिन के टाइम फुल किताबी ज्ञान तो शाम होते ही ढपली व चाय की चुस्कियों के बीच चुनावी मुद्दे हावी हो जाते हैं। शनिवार को भी गंगा ढाबे में चुनावी बिसात पर चर्चा हुई, जिसमें सभी छात्र संगठनों से जुड़े छात्र मौजूद रहे। वहीं, हॉस्टल कैंपेनिंग भी जोरों पर हैं।
...तो यही है जेएनयू की पहचान!
डीएसएफ, एआईएसएफ व स्टूडेंट फॉर सोशल जस्टिस के गठजोड़ से तैयार लेफ्ट प्रोग्रेसिव एलाइंस की प्रेजीडेंट पद की उम्मीदवार रोहिला प्रवीण के मुताबिक दिन में क्लासरूम में छात्रों को वोट के चलते पढ़ाई में बाधा नहीं पहुंचायी जा रही है, बल्कि शाम को ढाबा व हॉस्टल में बैठकों का दौर जारी है।
छात्रों के बीच ओपन मंच पर मुद्दे गिनाए जा रहे हैं, ताकि वे सही प्रत्याशी को वोट दे सकें। वहीं, एबीवीपी के प्रवक्ता अभिषेक के मुताबिक, जेएनयू में नाइट कल्चर शुरू से ही हावी रहा है। यही जेएनयू की पहचान भी है।
जेएनयू के इसी नाइट क्लचर के बीच छात्र संघ चुनावों के मुद्दों को देखन व सुनने आउटसाइडर छात्रों के अलावा आम लोग भी आते हैं। क्योंकि नाइट क्लचर व ढाबा क्लचर में महज ढपली, चाय व हाथ से कागजों पर लिखे घोषणा मुद्दों के बीच चुनावी जंग जीतना बड़ी बात है।