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भीड़ में भी उस काली रात की यादें सहमा देती हैं मुझे, रेप पीड़िता की दर्दनाक कहानी

Wed, 28 Feb 2018 11:43 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 28 Feb 2018 11:43 AM IST
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victim says she can not forget that horrifying moment when five raped her in chandigarh
प्रतीकात्मक तस्वीर

उस काली रात की झकझोर देने वाली यादें मुझे आज भी हिला देती हैं। मुझे पांच दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। वो मुझे एक सुनसान जगह पर ले गए, जहां बारी बारी से मेरा रेप किया। ये आपबीती एक रेप पीड़िता की है, जिसके दोषियों को सजा तो दे दी गई, लेकिन उसके दिलो दिमाग से आज भी वो खौफनाक मंजर जा नहीं रहा है।

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पीड़िता कहती है कि जब भी वो वहीं कपड़े डालती हैं तो उसे वो रात याद आ जाती है, जिसने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी। पीड़िता इस कदर डरी हुई है कि वो भीड़ में भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती है।
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घटना साल 2015 की है जब चंड़ीगढ़ की रहने वाली पीड़िता महज 17 साल की थी, उस वक्त सिरफिरों ने उसे कार से अगवा किया और जंगल में ले जाकर रेप किया। हालांकि, सभी पांचों आरोपियों को 25 साल की सजा सुना दी गई है।
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पीड़िता ने कहा कि ऐसा माना जाता है कि अगर आप सलवार सूट पहनती हैं, तो एक गरिमा बनी रहती हैं। मैंने भी उस दिन ऐसे ही कपड़े पहने थे, फिर मुझे निशाना क्यों बनाया गया? राधिका (बदला हुआ नाम) ने इसके खिलाफ कदम उठाया और सभी दोषियों को सजा दिलाने की ठान ली। हालांकि, उसे धमकी दी गई कि केस वापस नहीं लेगी, तो इसका अंजाम बहुत बुरा होगा।

इतना ही नहीं उसे हर दोषी ने पांच-पांच लाख रुपये भी ऑफर किए, लेकिन राधिका ने पैसे लेने से साफ इनकार कर दिया। राधिका कहती है कि उसके पिता ने समझाया था कि कभी खुद को बेचे नहीं और मैं उसी रास्ते पर चल रही हूं। रिश्तेदारों और जानकारों ने राधिका को पैसे लेने के लिए समझाया, लेकिन वह अपने फैसले पर अड़ी रही।

राधिका की मां को है कैंसर

victim says she can not forget that horrifying moment when five raped her in chandigarh

आर्श्चयजनक है कि राधिका के परिवार पर भी बुरे हालातों से गुजरा। एक और राधिका की मां कैंसर की बीमारी से जूझ रही थी दूसरी और उसके पिता की मौत काफी साल पहले हो गई। राधिका का घर उन 1000 रुपयों से चलता है, जो मां को सरकार की ओर से पेंशन के तौर पर मिलते हैं। 

साथ ही उन्हें पड़ोसियों और चैरिटी संस्थान की और से कभी-कभी मिलने वाले खाने पर भी निर्भर रहना पड़ा। मां ने बतौर घरेलू सहायिका बनकर भी घर चलाने की कोशिश की, लेकिन इससे बात नहीं बनी।

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