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पत्नी की हत्या कर कम सजा पाने के लिए पति बना नाबालिग, फिर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे पकड़ी चालाकी

Sun, 03 Jun 2018 12:54 AM IST
क्राइम डेस्क, अमर उजाला
क्राइम डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 03 Jun 2018 12:54 AM IST
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after murdered his wife accused proved himself minor but supreme court caught his maneuvering

पश्चिम बंगाल में एक युवक ने अपनी पत्नी की बेरहमी से हत्या कर दी और हद तो तब हो गई जब उसने सजा से बचने के लिए खुद को नाबालिग साबित कर दिया। कम सजा पाने के लिए आरोपी ने ये बड़ी योजना बनाई थी। लेकिन उसके विवाह प्रमाण पत्र ने उसका राज खोल दिया जिसके बाद मामले की सुनवाई को आगे भेजा गया। 

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हाई कोर्ट ने मान लिया था नाबालिग

आरोपी युवक की शादी साल 2010 में हुई थी। उस वक्त वह 21 साल का था। शादी के 4 साल बाद उसने अपनी पत्नी की हत्या कर दी। युवक ने खुद को कम सजा दिलवाने के लिए ऐसी योजना बनाई कि विभिन्न सबूतों के आधार पर हाईकोर्ट ने उसे नाबालिग मान लिया और केस को आगे की सुनवाई के लिए बाल न्यायालय भेज दिया।
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विवाह प्रमाण पत्र से पकड़ी गई चालाकी

आरोपी को जब हाईकोर्ट ने नाबालिग साबित कर दिया तो उसकी सास ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने जांच में पाया कि जिस वक्त उसकी शादी हुई थी तब वह 21 साल का था। जिसके चार साल बाद उसने अपनी पत्नी को मौत के घाट उतार दिया। यानि तब उसकी उम्र 25 साल हुई। यानि आधिकारिक तौर पर उसे नाबालिग नहीं ठहराया जा सकता।

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विवाह प्रमाण पत्र में इतनी लिखवाई उम्र

after murdered his wife accused proved himself minor but supreme court caught his maneuvering

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अबसेर मलिक नामक युवक नाबालिग नहीं है और मामले को सुनाई के लिए सेशन जज के समक्ष भेजने का आदेश जारी कर दिया। जस्टिस रंजन ने फैसला सुनाते हुए कहा कि विवाह के प्रमाण पत्र पर मलिक की उम्र 21 वर्ष लिखवाई गई है। जो कि कोर्ट के लिए एक बेहद अहम सबूत है। 

उन्होंने कहा कि मामले में जरूर कोई ना कोई गड़बड़ी हुई है क्योंकि जो आदमी अपनी शादी के वक्त 21 साल का था, वह शादी के चार साल बाद नाबालिग कैसे हो सकता है। लिहाजा कोर्ट कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला रद्द करता है और मामले की सुनवाई बाल न्यायालय से सेशन कोर्ट में रेफर करता है।  

प्रमाणपत्र देखने से किया इंकार

सुप्रीम कोर्ट ने बचाव पक्ष द्वारा दिखाए गए आरोपी के स्कूल के प्रमाणपत्र को मानने से इंकार कर दिया, जो आरोपी को नाबालिग दिखा रहा था। कोर्ट ने कहा कि जब इसे ट्रायल कोर्ट के समक्ष सबूत के तौर पर नहीं रखा गया तो सुप्रीम कोर्ट इसे कैसे मान सकता है। नाबालिग उस व्यक्ति को माना जाता है जिसकी उम्र 18 साल से कम हो। सामान्य अपराधी को जघन्य अपराध करने में कड़ी से कड़ी सजा दी जाती है। साथ ही नाबालिग अपराधी को भी तीन साल तक कैद की सजा दी जा सकती है। शायद यही लाभ लेने के लिए आरोपी मलिक भी खुद को नाबालिग साबित करना चाहता था।

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