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Indore News: भारत के 1.7 लाख करोड़ बचाने में मदद करेगा सोयाबीन, किसानों की आय बढ़ेगी, भारत आत्मनिर्भर बनेगा

Thu, 09 Oct 2025 08:07 AM IST
अर्जुन रिछारिया अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर Published by: अर्जुन रिछारिया Updated Thu, 09 Oct 2025 08:07 AM IST
सार

Indore News: सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) ने इंदौर से 'सोया बीज क्रांति' का आह्वान किया है, जिसका लक्ष्य भारत को खाद्य तेल और प्रोटीन में आत्मनिर्भर बनाना है। 

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Indore news SOPA calls for Soy Seed Revolution to make India self-reliant in edible oil and protein
पत्रकार वार्ता संबोधित करते सोपा के पदाधिकारी - फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर

विस्तार

भारत अपनी कुल खाद्य तेल आवश्यकता का 60% से अधिक आयात करता है। इस पर प्रतिवर्ष लगभग ₹1.7 लाख करोड़ विदेशी मुद्रा खर्च होती है। इस निर्भरता को कम करने का सबसे टिकाऊ उपाय है सोयाबीन का घरेलू उत्पादन बढ़ाना। यह बातें सोपा (सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया) के चेयरमैन डॉ. डेविश जैन ने अंतर्राष्ट्रीय सोया कॉन्क्लेव 2025 में मीडिया से चर्चा करते हुए कही। 
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उन्होंने कहा, सही मायने में आत्मनिर्भर भारत का यथार्थ  तभी संभव है, जब हम आयल सीड्स और प्रोटीन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनें। उच्च उत्पादकता और वैल्यू एडिशन के जरिए हम न केवल अरबों रुपये की बचत कर सकते हैं, बल्कि लाखों ग्रामीण युवाओं को रोज़गार भी दे सकते हैं।

बीज क्रांति: भारत के सोया पुनर्जागरण की नींव
डॉ. जैन ने बताया कि वर्तमान में भारत की सोया उत्पादकता 1.1 टन प्रति हेक्टेयर है, जो वैश्विक औसत 2.6 टन प्रति हेक्टेयर से काफी कम है। SOPA का लक्ष्य है कि अगले पांच वर्षों में उत्पादकता को 2 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाया जाए और कम से कम 70% किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराए जाएं। डॉ. जैन ने कहा, यदि हम प्रति हेक्टेयर सिर्फ 500 किलोग्राम की बढ़ोतरी भी कर लें, तो भारत अरबों रुपये के तेल आयात बचा सकता है और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। डॉ. जैन ने कहा सोया सीड रेवोल्यूशन सिर्फ एक कृषि कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह भारत की पोषण, कृषि और आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में निर्णायक कदम है। हमें अब बीज से लेकर थाली तक हर स्तर पर परिवर्तन लाना होगा।


सोया फूड्स हर भारतीय के लिए सस्ता, टिकाऊ और पौष्टिक प्रोटीन
सोयाबीन को शक्ति का अन्न बताते हुए डॉ. जैन ने सरकार और खाद्य उद्योग से अपील की कि सोया फोर्टिफाइड आटा, सोया दूध, टोफू, और सोया स्नैक्स को पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS), मिड-डे मील और पोषण अभियानों में शामिल किया जाए। उन्होंने कहा कि भारत में 60% से अधिक लोग अनुशंसित मात्रा से कम प्रोटीन का सेवन करते हैं, जबकि सोया प्रोटीन दालों से तीन गुना सस्ता और कहीं अधिक पौष्टिक विकल्प है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि हम अपने दैनिक भोजन में सोया को शामिल करें, तो कुपोषण और ‘हिडन हंगर’ से प्रभावी रूप से लड़ सकते हैं। इस दिशा में जागरूकता और नीति निर्माण के प्रतीक के रूप में, 2026 को ‘सोयाबीन वर्ष’ घोषित करने की उन्होंने अपील की।

पशु आहार उद्योग की रीढ़ सोयामील
डॉ. जैन ने कहा कि सोयामील भारत के ₹1.2 लाख करोड़ मूल्य के पोल्ट्री, मत्स्य और पशुपालन उद्योग की आधारशिला है। उन्होंने सस्ते विकल्पों जैसे DDGS के बढ़ते प्रयोग पर चिंता जताई, जो गुणवत्ता और पोषण को नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा, स्वस्थ, सुरक्षित और टिकाऊ पशु प्रोटीन उत्पादन के लिए सोयामील का कोई विकल्प नहीं है। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो इसके घरेलू उपयोग और निर्यात को प्रोत्साहित करें।

नॉन-जीएम सोया के निर्यात में भारत की बढ़ती पहचान
भारत नॉन-जीएम (Non-GMO) सोया उत्पादों के लिए विश्वभर में एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में पहचाना जाता है। डॉ. जैन ने कहा कि वैश्विक बाजार में नॉन-जीएम उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है और भारत को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने कहा, दुनिया भारतीय सोया पर भरोसा करती है। हमें इस भरोसे को पूंजी में बदलना है नॉन-जीएम सोयाबीन, सोयामील और सोया फूड्स के निर्यात को बढ़ाकर। SOPA ने सरकार से का पांच वर्षीय लक्ष्य तय करने का आवाहन करते हुए सोया उत्पादकता वर्तमान में 1.1 से बढ़ाकर 2 टन प्रति हेक्टेयर का आवाहन किया। तीन वर्षों में 70% किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराया जाए, उत्पादकता तथा प्रशंसकरण क्षमता बढ़ा कर खाद्य तेल आयात में 25% की कमी की जाए। 2030 तक देश में सोया फूड्स की खपत दोगुनी की जाए तथा नॉन-जीएम सोया और सोयामील के निर्यात में भारत की वैश्विक हिस्सेदारी बधाई जाए।
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