{"_id":"bde938e91f4b4ce885007c609bfc4de8","slug":"maa-tujhe-pranam-mohan-singh","type":"story","status":"publish","title_hn":"पिता ने दुश्मनों को हराया, बेटी ने हालातों को"}
पिता ने दुश्मनों को हराया, बेटी ने हालातों को
ब्यूरो/अमर उजाला, आगरा
Updated Thu, 17 Jul 2014 04:04 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिता की शहादत के बाद घर की परिस्थितियां अचानक बदल गईं। गांव में जितने सगे-संबंधी थे, सभी ने मुंह मोड़ लिया। बड़ी बहन की शादी के बाद दो छोटे भाई और बहन की पढ़ाई की चिंता।
विज्ञापन
जितनी पेंशन मिलती थी, उसमें गुजारा चलना मुश्किल होने लगा। पिता की शहादत पर रोना चाहती थी लेकिन भाई-बहन कहीं कमजोर न पड़ जाएं, इसलिए आंसुओं के बाध को टूटने नहीं दिया।
विज्ञापन
24 जुलाई 1999 को बड़ा उखर्रा निवासी मोहन सिंह की शहादत की जब खबर आई तब पूनम 15 साल की थी। पांच भाई-बहनों में बड़ी बहन कमलेश की तब तक शादी हो चुकी थी। उससे छोटे दिनेश आठवीं और अंजना छठवीं कक्षा में थे। सबसे छोटा भाई रूपेश ने स्कूल जाना भी शुरू नहीं किया था।
विज्ञापन
इधर, पति की मौत के बाद ओमवती भी सुधबुध खो बैठी। परिवार पर जैसे बिजली गिर पड़ी थी। समय के साथ खानदान के लोगों ने दूरियां बना ली। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी उठाने का सवाल खड़ा होने लगा। संघर्ष की घड़ी देख पूनम ने हिम्मत दिखाई। सबसे पहली लड़ाई शहीदों के परिजनों को मिलने वाले घर को लेकर शुरू हुई।
मां ओवमती के साथ पूनम ने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे। पूनम के संघर्ष को पहली विजय वर्ष 2003 में मिली। ताजगंज फेस-2 में मकान मिल गया। मां के साथ चारों भाई-बहन यहीं आकर रहने लगे। घर और पढ़ाई का खर्च सबसे बड़ी चुनौती थी। पूनम ने हार नहीं मानी।
जैसे-तैसे भाई-बहनों की पढ़ाई को जारी रखा। साथ ही शुरू कर दी पेट्रोल पंप के लिए भाग-दौड़। लंबी जद्दोजहद के बाद पेट्रोल पंप मिला। इसी बीच पूनम की कानपुर शादी हो गई। तब तक परिजन पूरी तरह से व्यवस्थित हो चुके थे। भाई दिनेश पेट्रोल पंप संभालने लगा। छोटी बहन अंजना बीए कर रही है और छोटा भाई रूपेश बीटेक कर रहा है।
पूनम के अनुसार, पिता की शहादत ने उसे हिम्मत दी। उसने आंसुओं के समुद्र को तब तक थामे रखा, जब तक कि उसके परिवार की जिंदगी ढर्रे पर आ गई। दो साल पहले ओमवती भी गुजर गई। बकौल रूपेश, मुझे पिता के बारे में कुछ याद नहीं।
प्रेरणा देती है पिता की वर्दी
शहीद मोहन सिंह ने किस तरह से कारगिल युद्ध में दुश्मनों के पसीने छुड़ाए, इसकी कहानी जब उनके बच्चे पिता के दोस्तों से सुनते हैं तो उनके रोंगेट खड़े हो जाते हैं। छोटे बेटे रूपेश का कहना है कि मेरे पिता ही मेरे हीरो हैं।
वह इंजीनियर बनकर देश के लिए कुछ करना चाहता है। उसका कहना है कि उसके भाई-बहनों ने कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। शहीद मोहन सिंह के बच्चों ने पिता की वर्दी को सहेजकर रखा है। कहते हैं, उन्हें इससे प्रेरणा मिलती है।