Mahashivratri 2025: महाशिवरात्रि का महापर्व आज, जानें चार प्रहर की पूजा का मुहूर्त
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Wed, 26 Feb 2025 06:42 PM IST
श्वेता सिंह
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: श्वेता सिंह
Updated Wed, 26 Feb 2025 06:42 PM IST
खास बातें
Mahashivratri Wishes, Puja Shubh Muhurat in Hindi: आज फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। आज देश भर में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि के साथ ही आज महाकुंभ का समापन होगा। आइए जानते हैं महाशिवरात्रि पूजन, जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, आरती, चालीसा, मंत्र समेत सम्पूर्ण जानकारी।
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महाशिवरात्रि 2025
- फोटो : amar ujala
लाइव अपडेट
06:30 PM, 26-Feb-2025
महामृत्युंजय मंत्र
ऊँ हौं जूं स: ऊँ भुर्भव: स्व: ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
ऊर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ऊँ भुव: भू: स्व: ऊँ स: जूं हौं ऊँ।।
ऊँ हौं जूं स: ऊँ भुर्भव: स्व: ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
ऊर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ऊँ भुव: भू: स्व: ऊँ स: जूं हौं ऊँ।।
06:11 PM, 26-Feb-2025
महाशिवरात्रि पर ग्रहों का दुर्लभ संयोग
26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि के दिन काफी दुर्लभ योग बन रहा है। बता दें इस दिन शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में रहेंगे, जिससे मालव्य राजयोग बनेगा। वहीं मीन राशि में शुक्र की राहु के साथ भी युति हो रही है। इतना ही नहीं कुंभ राशि में सूर्य-शनि की भी युति होगी। ऐसा माना जा रहा है कि कुंभ राशि में बुध भी विराजमान है, जिससे तीनों ग्रहों की युति से त्रिग्रही योग के साथ-साथ सूर्य-बुध से बुधादित्य योग भी बनेगा।
26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि के दिन काफी दुर्लभ योग बन रहा है। बता दें इस दिन शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में रहेंगे, जिससे मालव्य राजयोग बनेगा। वहीं मीन राशि में शुक्र की राहु के साथ भी युति हो रही है। इतना ही नहीं कुंभ राशि में सूर्य-शनि की भी युति होगी। ऐसा माना जा रहा है कि कुंभ राशि में बुध भी विराजमान है, जिससे तीनों ग्रहों की युति से त्रिग्रही योग के साथ-साथ सूर्य-बुध से बुधादित्य योग भी बनेगा।
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05:56 PM, 26-Feb-2025
महाशिवरात्रि व्रत पारण समय
ज्योतिषियों की मानें तो महाशिवरात्रि पर व्रत पारण का समय 27 फरवरी को प्रातः 06 बजकर 48 मिनट से 08:54 मिनट तक है।
ज्योतिषियों की मानें तो महाशिवरात्रि पर व्रत पारण का समय 27 फरवरी को प्रातः 06 बजकर 48 मिनट से 08:54 मिनट तक है।
05:42 PM, 26-Feb-2025
चार प्रहर की पूजा में मंत्र जाप
- प्रथम प्रहर का मंत्र- 'ह्रीं ईशानाय नमः'
- दूसरे प्रहर मंत्र- 'ह्रीं अघोराय नम:'
- तीसरे प्रहर मंत्र- 'ह्रीं वामदेवाय नमः'
- चौथे प्रहर मंत्र- 'ह्रीं सद्योजाताय नमः
05:27 PM, 26-Feb-2025
Mahashivratri 2025
- फोटो : अमर उजाला
चार प्रहर की पूजा का समय
- रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय - शाम 06:29 से रात 09 बजकर 34 मिनट तक
- रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय - रात 09:34 से 27 फरवरी सुबह 12 बजकर 39 मिनट तक
- रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय - 27 फरवरी को रात 12:39 से सुबह 03 बजकर 45 मिनट तक
- रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय - 27 फरवरी को सुबह 03:45 से 06 बजकर 50 मिनट तक
05:12 PM, 26-Feb-2025
Mahashivratri 2025
- फोटो : अमर उजाला
- शिव पूजा का निशिता काल मुहूर्त: 26 फरवरी 2025, मध्यरात्रि 12:09 बजे से 12:59 बजे तक
- निशिता काल पूजा की कुल अवधि: कुल 50 मिनट
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05:07 PM, 26-Feb-2025
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग
- फोटो : instagram
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे श्रद्धा, भक्ति और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित है, जो ऐतिहासिक एलोरा गुफाओं के पास है। यह 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग माना जाता है और यहां दर्शन करने से सभी पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्व
इस ज्योतिर्लिंग का नाम घृष्णा नाम की एक भक्त महिला के नाम पर पड़ा। घृष्णा ने अपनी भक्ति से शिवजी को प्रसन्न किया और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं यहां ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट होकर भक्तों को आशीर्वाद देने का वचन दिया। यह स्थान सच्चे प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे श्रद्धा, भक्ति और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित है, जो ऐतिहासिक एलोरा गुफाओं के पास है। यह 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग माना जाता है और यहां दर्शन करने से सभी पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्व
इस ज्योतिर्लिंग का नाम घृष्णा नाम की एक भक्त महिला के नाम पर पड़ा। घृष्णा ने अपनी भक्ति से शिवजी को प्रसन्न किया और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं यहां ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट होकर भक्तों को आशीर्वाद देने का वचन दिया। यह स्थान सच्चे प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
04:47 PM, 26-Feb-2025
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग
- फोटो : instagram
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यह तमिलनाडु के रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है। इसे "दक्षिण का काशी" भी कहा जाता है। यह ज्योतिर्लिंग हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है क्योंकि यह भगवान राम से जुड़ा हुआ है।
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का महत्व
रामायण के अनुसार, जब भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ लंका जाने से पहले समुद्र किनारे पहुंचे, तो उन्होंने भगवान शिव की पूजा करने के लिए यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। उन्होंने हनुमान जी को कैलाश पर्वत से शिवलिंग लाने भेजा, लेकिन देरी के कारण माता सीता ने रेत से शिवलिंग बना दिया। इस शिवलिंग को "रामनाथस्वामी" कहा जाता है और यह रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजनीय है।
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यह तमिलनाडु के रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है। इसे "दक्षिण का काशी" भी कहा जाता है। यह ज्योतिर्लिंग हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है क्योंकि यह भगवान राम से जुड़ा हुआ है।
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का महत्व
रामायण के अनुसार, जब भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ लंका जाने से पहले समुद्र किनारे पहुंचे, तो उन्होंने भगवान शिव की पूजा करने के लिए यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। उन्होंने हनुमान जी को कैलाश पर्वत से शिवलिंग लाने भेजा, लेकिन देरी के कारण माता सीता ने रेत से शिवलिंग बना दिया। इस शिवलिंग को "रामनाथस्वामी" कहा जाता है और यह रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजनीय है।
04:33 PM, 26-Feb-2025
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
- फोटो : instagram
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे रक्षक एवं संकटमोचन शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। यह गुजरात के द्वारका से 15 किमी दूर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि यह पूरी तरह स्वयंभू (स्वतः प्रकट) माना जाता है और इसकी पूजा करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के भय और रोगों से मुक्ति मिलती है।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्व
कहा जाता है कि राक्षस दरुक ने अपनी शक्ति से एक नगरी बनाई और वहां लोगों को कैद कर रखा था। उन कैदियों में एक परम शिव भक्त सुहस्त नामक व्यक्ति भी था, जिसने अपनी श्रद्धा से भगवान शिव को प्रसन्न किया। शिवजी प्रकट होकर राक्षस दरुक का अंत किया और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की।यह भय, जादू-टोने और सर्प दोष से मुक्ति देने वाला ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे रक्षक एवं संकटमोचन शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। यह गुजरात के द्वारका से 15 किमी दूर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि यह पूरी तरह स्वयंभू (स्वतः प्रकट) माना जाता है और इसकी पूजा करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के भय और रोगों से मुक्ति मिलती है।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्व
कहा जाता है कि राक्षस दरुक ने अपनी शक्ति से एक नगरी बनाई और वहां लोगों को कैद कर रखा था। उन कैदियों में एक परम शिव भक्त सुहस्त नामक व्यक्ति भी था, जिसने अपनी श्रद्धा से भगवान शिव को प्रसन्न किया। शिवजी प्रकट होकर राक्षस दरुक का अंत किया और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की।यह भय, जादू-टोने और सर्प दोष से मुक्ति देने वाला ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
04:15 PM, 26-Feb-2025
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, जिसे वैद्यनाथ धाम या देवघर भी कहा जाता है, भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह झारखंड के देवघर जिले में स्थित है और इसे मोक्ष प्राप्ति का द्वार माना जाता है। इस मंदिर का उल्लेख कई पुराणों में मिलता है और इसकी महिमा भक्तों के लिए अपार है।
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की और अपना सिर अर्पित किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें ज्योतिर्लिंग दिया और कहा कि इसे जहां रखेंगे, वहीं यह स्थापित हो जाएगा। रावण इसे लेकर लंका जा रहा था, लेकिन एक चाल के तहत इसे देवघर में रख दिया गया और यह यहीं स्थापित हो गया। मान्यता है कि बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन और जलाभिषेक करने से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, जिसे वैद्यनाथ धाम या देवघर भी कहा जाता है, भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह झारखंड के देवघर जिले में स्थित है और इसे मोक्ष प्राप्ति का द्वार माना जाता है। इस मंदिर का उल्लेख कई पुराणों में मिलता है और इसकी महिमा भक्तों के लिए अपार है।
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की और अपना सिर अर्पित किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें ज्योतिर्लिंग दिया और कहा कि इसे जहां रखेंगे, वहीं यह स्थापित हो जाएगा। रावण इसे लेकर लंका जा रहा था, लेकिन एक चाल के तहत इसे देवघर में रख दिया गया और यह यहीं स्थापित हो गया। मान्यता है कि बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन और जलाभिषेक करने से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।