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रिटायरमेंट के बाद खुशियों का बंधन

Thu, 07 Dec 2023 04:06 PM IST
प्रकाश चंद जोशी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रकाश चंद जोशी Updated Thu, 07 Dec 2023 04:06 PM IST
सार

कई लोगों के लिए रिटायरमेंट का मतलब है अपनी सारी जिम्मेदारियों से रिटायर हो जाना और फिर अपने तरीके से जिंदगी को जीना। समय की कोई पाबंदी नहीं, रोज-रोज दफ्तर जाने की टेंशन नहीं, लेकिन कई लोगों के लिए यह रिटायरमेंट अकेलेपन की सौगात भी लेकर आता है।

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The bond of happiness after retirement
Retirement - फोटो : istock

विस्तार

लक्ष्मी कुमारी,

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वे 'रिटायर्ड' हैं, इसका मतलब यह नहीं कि वे 'टायर्ड' हैं। उन्हें अपनी खुशियों में शरीक करें और उनकी सलाह के लिए जगह निकालें। जिंदगी खिल-सी उठेगी।

सरोज बाला 60 वर्ष की उम्र में फिर से व्यस्त हो गई हैं। इतनी कि पहले कभी नहीं रहीं। सुबह से लेकर शाम-रात तक उनके रहन-सहन का तरीका बदल गया है। सच कहा जाए तो वह अब आकर जिंदगी को जी रही हैं। पति के रिटायरमेंट के बाद उन्हें लगने लगा था कि उनकी जिंदगी भी ठहर जाएगी, क्योंकि पति की नौकरी के चलते सुबह से शाम तक उनके लिए लगे रहना ही तब एकमात्र उद्देश्य होता था और यह चिंता रहने लगी थी कि अब आगे क्या होगा?
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सुबह से लेकर शाम तक रहना तो घर में ही है, लेकिन साथ में अब पति भी रहेंगे। बस साथ रहने की इसी उम्मीद ने सरोज बाला को एक नए जोश से भर दिया। नतीजा यह कि वह अब पहले से ज्यादा सक्रिय और खुश रहने लगी हैं। जाहिर है, पति भी खुश हैं। उधर सरकारी नौकरी से रिटायर हुईं मिथिलेश के बेटे और बहू को इस बात की टेंशन हो गई कि अब माता जी भी घर पर रहेंगी, जिसका उनके जीवन और दिनचर्या पर असर पड़ेगा। पहले तो किसी तरह मैनेज हो जाता था।
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हालांकि, उनके बहू-बेटे दोनों कामकाजी हैं और सुबह घर से निकलते हैं तो शाम को ही लौटते हैं। हमारे यहां रिटायरमेंट शब्द के साथ नौकरी ही नहीं, कई सारी चीजों से रिटायर होने का चलन जुड़ा हुआ है। रिटायर होने का मतलब होता है कि अब आप बेकार हैं, अब आपके पास करने के लिए कोई रोजाना का काम नहीं है, एक तरह से आप बेकार और बेमतलब हैं!

कई लोगों के लिए रिटायरमेंट का मतलब है अपनी सारी जिम्मेदारियों से रिटायर हो जाना और फिर अपने तरीके से जिंदगी को जीना। समय की कोई पाबंदी नहीं, रोज-रोज दफ्तर जाने की टेंशन नहीं, लेकिन कई लोगों के लिए यह रिटायरमेंट अकेलेपन की सौगात भी लेकर आता है। खासकर उनके लिए, जिन्होंने नौकरी करते समय घर-परिवार को इतना समय नहीं दिया। सारा जीवन दफ्तर के नाम कर दिया और जब वह अचानक एक दिन घर बैठ गए तो कई तरह की बीमारियों, अकेलेपन या अवसाद का शिकार हो गए। घर में बहू-बेटे या अन्य परिजन भी

ऐसे व्यक्तियों को ज्यादा समय नहीं दे पाते। शहरों में तो अधिकतर एकल परिवारों के बीच किसी का रिटायर्ड होना किसी बोझ से कम नहीं माना जाता। खासकर उन लोगों के लिए, जिनके पास रिटायरमेंट के बाद कोई सामाजिक जीवन या फिर से काम करने या अपने समय का सदुपयोग करने के लिए कोई ठोस योजना नहीं होती।

कई उदाहरण हैं कि घर में रिटायरमेंट के बाद हर छोटी-बड़ी चीज में दखलअंदाजी करने से बहू-बेटे परेशान हो गए और उन्हें यही लगने लगा कि काश, अभी रिटायर्ड न होते! रिटायरमेंट के बाद आपका भी आगे का जीवन सुखी एवं स्वस्थ रहे और परिवार वालों या बहू-बेटे के जीवन में कोई विघ्न न आए, इसके लिए संतुलन बनाने की आवश्यकता होती है। एक ऐसा संतुलन, जिसमें किसी भी पक्ष को अपना जीवन जीने में कोई परेशानी न हो और कोई किसी को एक-दूसरे पर बोझ न समझे।

बाद का अकेलापान

रिटायरमेंट जीवन का एक चरण है, जिसका कई लोग इंतजार करते हैं। वर्षों की कड़ी मेहनत और समर्पण के बाद अलार्म के बिना जागने और अपने समय के साथ जो आप चाहते हैं, उसे करने की आजादी का विचार रोमांचक होता है। हालांकि रिटायरमेंट की वास्तविकता अक्सर हमारी अपेक्षाओं से काफी अलग हो सकती है, लेकिन एक बार जब रिटायर हो जाते हैं तो खुद को अकेला और अलग-थलग महसूस करते हैं। सेवानिवृत्ति के साथ हमारी सामाजिक गतिशीलता में एक महत्वपूर्ण बदलाव आता है।

काम के सहकर्मी, जो कभी दैनिक साथी थे, अब आस-पास नहीं हैं और हमारे जीवन में एक शून्य पैदा कर देते हैं। कल तक काम की नियमित दिनचर्या जो हमें व्यस्त रखती थी, अचानक रुक जाती है। काम ही नहीं, रोज का दफ्तर आना-जाना बंद हो जाता है, जो अकेलेपन की भावनाओं को जन्म देने का काम करता है। रिटायर्ड लोग अक्सर साथ के लिए बच्चों पर निर्भर हो जाते हैं। सामाजिक संपर्क के लिए बच्चों पर यह बढ़ती निर्भरता उन्हें समाज से अलग-थलग और अकेला महसूस कराती है।

समाज से नाता

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, लेकिन रोजी-रोटी के चक्कर में समाज से उसका नाता कट-सा जाता है। इसीलिए बहुत-से लोग रिटायरमेंट का इंतजार करते हैं। हालांकि रिटायरमेंट के साथ चुनौतियों का एक नया दौर भी आता है, जिसका कई लोग अनुमान नहीं लगा पाते। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हमारे सामाजिक दायरे सिकुड़ते जाते हैं। ऐसे में समाज से फिर से नाता जोड़ने के कई फायदे हैं। इसके लिए आप कई तरह से सामाजिक भूमिकाएं निभा सकते हैं। समाज भी

वरिष्ठ लोगों की बात को महत्व देता है। अत: अपने मन और पसंद के हिसाब से समाज के लिए कार्य करें। यह समाज से अधिक आपके लिए महत्वपूर्ण होगा। ये कार्य तनाव को कम करने, अच्छे मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और समग्र जीवन में संतुष्टि बढ़ाने में भी मदद करते हैं। अब आप तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त हैं तो समाज के लिए कुछ नया कर आगे का जीवन सफल बना सकते हैं।

अलगाव के नकारात्मक प्रभाव

रिटायरमेंट की उम्र के करीब आते-आते कई माता-पिता खुद को बच्चों के व्यक्तिगत जीवन में शामिल करने लगते हैं। हालांकि वे ऐसा प्यार और अच्छे इरादे से करते हैं, लेकिन बच्चे इसे अपनी जिंदगी में दखलअंदाजी समझने लगते हैं और माता-पिता से दूर भागने लगते हैं या उन्हें कई चीजों में शामिल करने से कतराने लगते हैं। इसका शारीरिक और मानसिक असर माता-पिता पर पड़ता है। इससे उनके जीवन में अलगाव और अकेलापन पैदा होने लगता है।

यहां पर संतुलन बनाने की आवश्यकता होती है। बच्चों को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि माता-पिता रिटायरमेंट के बाद उनके जीवन में बेवजह दखल देने लगे हैं। वहीं, रिटायर्ड व्यक्ति को जब यह अहसास होने लगता है कि दफ्तर में कोई नहीं रहा और घर पर भी कोई नहीं पूछ रहा तो वे दुखी हो जाते हैं। इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है और वे मानसिक अलगाव के शिकार हो जाते हैं। यह स्थिति भी खतरनाक है। इससे बचने का तरीका दोनों तरफ से खोजना चाहिए। नियमित सामाजिक बातचीत के बिना व्यक्ति आस-पास की दुनिया से कटा महसूस करता है।

बच्चों के साथ तालमेल

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और जीवन के दूसरे दौर में प्रवेश करते हैं, हम अक्सर अपने करीबी लोगों से आराम और साथ की तलाश में रहते हैं। हालांकि आज के समाज ने माता-पिता और उनकी बड़ी संतानों के बीच तालमेल में बदलाव देखा है। अधिकांश माता-पिता अभी भी रिटायरमेंट के वर्षों में अच्छी तरह से रहते हैं, फिर भी बच्चों के साथ स्वस्थ संबंधों को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। रिटायरमेंट के बाद इन रिश्तों को बनाए रखना बहुत जरूरी है। एक समय में हमें सहारे की जरूरत तो पड़ेगी। यदि बच्चों के साथ मजबूत संबंध होंगे तो सुनहरे वर्षों के दौरान जीवन में खुशियां इनके जरिये ही आएंगी। बड़े बच्चों के साथ स्वस्थ संबंधों को बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक संवाद है। आपका बच्चा वास्तव में क्या कह रहा है, इस पर ध्यान दें। उसके विचारों को सुनें। वह क्या चाहता है, इसका अंदाजा लगाने से आपको भी उसी के अनुरूप संवाद करने में आसानी होगी।

शौक बड़ी चीज है

पूरा जीवन मशीन बनकर निकाल दिया। जो करना पसंद था, वह कर नहीं पाए। कारण, रोजी-रोटी और बच्चों के चक्कर में समय ही नहीं मिला। तो अब भी देर नहीं हुई है। अब तो समय ही समय है। अपने शौक को जिंदा कीजिए। घूमने के शौकीन हैं तो निकल पड़िए दुनिया की सैर करने, संगीत का शौक है तो छेड़िए सुरों को, पढ़ने का शौक है तो पढ़ डालिए इतिहास एवं वर्तमान को और समाज सेवा करनी है तो घर एवं मोहल्ले से ही शुरू कर डालिए। आपको तो अच्छा लगेगा ही, बच्चे भी खुश रहेंगे! मकसद तो यही है कि रिटायरमेंट के बाद आपका जीवन सुखी हो और बच्चों को भी आपके होने से अच्छा लगे। उन्हें कोई बोझ न महसूस हो और आपसी तालमेल से एक-दूसरे के साथ-साथ समाज से भी नाता जुड़ा रहे।

पुराने शौक को जिंदा करें

डॉ. मनुश्री गुप्ता

प्रोफेसर, मनोचिकित्सा विभाग

वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज, दिल्ली


सोशल आइसोलेशन किसी भी वजह से हो सकता है। कभी खेती में एक-दूसरे की जरूरत पड़ती थी, तो पूरा परिवार साथ रहता था, लेकिन अब इस तरह की सारी जरूरतें औद्योगीकरण ने खत्म कर दीं। जो लोग नौकरी में लग गए, वे अपनी ही दुनिया में रम गए। संयुक्त परिवार की अवधारणा छोटे परिवार में बदल गई। पहले पड़ोस से चीनी मांगकर चाय बना लेते थे, लेकिन अब फूड डिलीवरी का ऑर्डर देते हैं। इससे एक-दूसरे पर निर्भरता खत्म हुई और सोशल नेटवर्क उतने मजबूत नहीं रहे। आस-पड़ोस के लोगों के बीच भी हमें अपना ख्याल खुद रखना पड़ता है। वृद्धावस्था में हमें देखने वाला कोई नहीं होता। इसके अलावा हम अक्सर देखते हैं कि माता-पिता अपने शौक में कोई रुचि नहीं दिखाते। पहले बच्चे आप पर निर्भर थे, इसलिए

आपको पूरा समय देते थे, आप भी उन्हें वक्त देते थे, लेकिन अब वे बड़े हो गए तो उनकी अपनी जिंदगी है। उन्हें नई जिंदगी शुरू करने दें। आप अपने पुराने शौक को जिंदा करें। घर में दो व्यक्तियों का स्वभाव अलग-अलग होता है। किसी को भी किसी को नहीं बदलना चाहिए।

उन्हें हर बात में टोकें नहीं

डॉ. प्रियंका थगेला

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट


रिटायरमेंट के बाद माता-पिता को लगता है कि जिंदगी खत्म हो गई। हालांकि इस तरह की सोच सबकी नहीं होती, लेकिन आपको खुलकर जीना चाहिए। इसके लिए कोई उपलब्धि हासिल करना जरूरी नहीं है। माता-पिता रिटायरमेंट के बाद परिवार के साथ किस तरह की साझेदारी कर सकते हैं या किस तरह का सम्मान चाहते हैं, इसको व्यक्त करना जरूरी है। माता-पिता और बच्चों की अपनी दिनचर्या है। दोनों एक-दूसरे को बाधित न करें।


माता पिता भी बच्चों को ज्यादा टोका-टाकी न करें, क्योंकि इस उम्र के लोग ज्यादा ओपन रहते हैं, बोलना चाहते हैं, चुप नहीं रहना चाहते। वहीं, बच्चे ध्यान रखें कि एक उम्र के बाद पुरानी चीजों से लगाव हो जाता है, इसलिए बच्चे उनकी पुरानी चीजों को उनसे दूर न करें। वे किताब पढ़ना चाहते हैं या किसी दोस्त के साथ बाहर जाना चाहते हैं, किसी रिश्तेदार से फोन पर बात करना चाहते हैं तो उनको बार-बार टोकें नहीं। इससे उनकी मानसिक सेहत पर असर पड़ सकता है। मकसद है रिटायरमेंट को एक आसान स्टेज बनाना।

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