भारत में स्त्री को देवी का दर्जा दिया है लेकिन ये तस्वीर समाज में अलग और घर की चार दीवारी में कुछ और ही दिखाई देती है। दर्जा देने से सम्मान नहीं बढ़ जाता बल्कि लोग उस पर कितना अमल करते हैं फर्क उससे पड़ता है। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, असमानता और हिंसा की घटनाएं नई नहीं हैं बल्कि आज के दौर में ये प्रतिशत बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में देवी कही जाने वाली स्त्री की दशा क्या होगी इसकी कल्पना की जा सकती है।
हाल ही में आई ऑक्सफेम इंडिया 2019 की समानता और असामनता की रिपोर्ट में भारत के प्रमुख राज्यों में महिलाओं की स्थिति के विषय में बात की गई है। जिसमें करीब 1 हजार परिवारों पर बनाई गई रिपोर्ट से जानकारी मिली है कि घर के मर्दों ने छोटी-छोटी बातों पर महिलाओं को मारने, पीटने और फटकारने की बात स्वीकारी है।
इससे साफ जाहिर है कि पुरुषों में पितृसत्तात्मक सोच दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। पितृसत्तात्मक समाज में एक औरत तभी तक देवी मानी जाती है जब तक वो पुरुषों की सही या गलत हर बात चुपचाप सुनती है। अगर किसी गलत बात पर महिला ने अपना मत रखने की या विरोध करने की कोशिश की हिंसा की शुरुआत वहीं से होती है।
शोध में शामिल करीब 53% मर्दों ने माना कि अगर महिला बच्चे की परवरिश ठीक ढंग से नहीं कर रही है तो उसे फटकारना गलत नहीं है। महिला द्वारा किचन की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने पर 41% मर्दों ने उन्हें मारने-पीटने की बात कही है। वहीं 42% मर्दों ने माना कि अगर महिला पीने का पानी न भरे और खाना बनाने के लिए ईंधन न लाए तो उसे मारना सही है। 54% मर्दों ने माना कि अगर औरत बिना इजाजत अपनी मर्जी से कहीं बाहर जाती है तो उसे फटकारना या मारना उनका अधिकार है।
ऐसी सोच रखने वाले पुरुष जब तक इस समाज में हैं तब तक महिला का उत्थान मुश्किल है। आज हमारे समझ में महिला सशक्तिकरण की बात की जाती है लेकिन शोध में आई ये बातें एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर कब ये सूरत बदलेगी?