प्रकाश पर्व 2018: अनोखा था गुरु नानक का जीवन, इस घटना के बाद बन गए थे संत
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गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म की स्थापना की थी। समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए उन्होंने अपने परिवारिक जीवन और सुख का भी ध्यान नहीं रखा और लोगों की भलाई के लिए दूर-दूर तक कई यात्राएं की। इस साल 23 नवंबर को नानक जी का जन्मदिन प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाएगा। आइए इस खास मौके पर जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कई अहम बातें।
सन 1485 ई. में नानक का विवाह बटाला की रहने वाली एक लड़की सुलक्खनी से हुआ।सुलक्खनी के पिता का नाम मूला था। 28 वर्ष की आयु में नानक जी के घर उनके पुत्र श्रीचन्द का जन्म हुआ। जिसके बाद 31 वर्ष की आयु में उनके दूसरे बेटे लक्ष्मीदास अथवा लक्ष्मीचन्द पैदा हुए। गुरु नानक के पिता उन्हें कृषि व्यापार में लगाना चाहते थे लेकिन उनके सारे प्रयास गलत सिद्ध हुए।
घोड़े के व्यापार से मिले पैसों को गुरु नानक ने साधुसेवा में लगा दिया। पिता के पूछने पर उन्होंने अपने पिता से कहा कि यही सच्चा व्यापार है। जिसके बाद उन्हें सन् 1504 ई. में उनके बहनोई जयराम के पास सुल्तानपुर भेज दिया गया।
सुल्तानपुर में अपने बहनोई जयराम के प्रयासों के बाद नानक जी को वहां के गवर्नर दौलत खां के यहां काम पर रख लिए गया।यहां वो अपना काम बड़ी ईमानदारी के साथ करते रहे।जिसकी वजह से वहां की जनता के साथ शासक दौलत खां भी नानक से बेहद खुश हुए।
गुरु नानक रोजाना सुबह बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। कहा जाता है कि एक दिन वह स्नान करने के बाद जंगल की ओर गए जहां वो एकाएक वन में अन्तर्धान हो गए।बताया जाता है कि उन्हें वहां परमात्मा का साक्षात्कार हुआ।जिसके बाद वो अपने परिवार की जिम्मेदारी अपने ससुर मूला को सौंपकर धर्म के प्रचार में लग गए। मरदाना उनकी यात्रा में बराबर उनके साथ रहा।
इनपुट- भारत डिस्कवरी