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दशहरा 2026: भगवान श्रीराम के इन आदर्शों के आगे नहीं टिक सका रावण का अहंकार

Sat, 17 Oct 2026 05:27 PM IST
सोनिया चौहान लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनिया चौहान Updated Sat, 17 Oct 2026 05:27 PM IST
सार

Lord Shri Rama Virtues: दशहरा सत्य और धर्म की जीत का प्रतीक है। रावण ज्ञानी और शक्तिशाली होने के बावजूद अहंकार के कारण हार गया, जबकि भगवान श्रीराम ने अपने गुणों, मर्यादा और धर्म के बल पर विजय प्राप्त की। 

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Dussehra 2026: Reason behind ravana defeat in ramayana against lord shri rama
रावण की विद्वता पर भारी पड़े श्रीराम के ये गुण - फोटो : Ai Generated

विस्तार

Dussehra 2026: दशहरा यानी विजयादशमी का पर्व हमें याद दिलाता है कि अंत में जीत हमेशा सत्य और धर्म की होती है। रामायण के अनुसार, रावण अत्यंत विद्वान, वेदों का ज्ञाता और शक्तिशाली राजा था, लेकिन उसका अहंकार और गलत फैसले उसके विनाश का कारण बने। वहीं, भगवान श्रीराम ने अपने धैर्य, मर्यादा, करुणा और धर्म के मार्ग पर चलकर आदर्श स्थापित किया। यही वजह है कि दशहरे पर रावण दहन के साथ भगवान श्रीराम के गुणों और उनके जीवन से मिलने वाली सीख को भी याद किया जाता है। आइए जानते हैं श्रीराम के उन गुणों के बारे में, जो उन्हें महान बनाते हैं।

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श्रीराम के जीवन में मर्यादा और अनुशासन का महत्व

भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, संयम और शालीनता बनाए रखी। वहीं, रावण अपनी शक्ति और अहंकार के कारण सही-गलत का अंतर भूल गया। श्रीराम का जीवन सिखाता है कि विपरीत हालात में भी अपनी मर्यादा और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए।

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श्रीराम से सीखें विनम्रता और शिष्टाचार 

भगवान श्रीराम का व्यक्तित्व विनम्रता और शिष्टाचार की मिसाल था। वे गुरुजनों का सम्मान करते थे और मित्रों, सहयोगियों सहित सभी के प्रति आदर भाव रखते थे। दूसरी ओर, रामायण में रावण के अहंकार को उसके पतन का एक प्रमुख कारण बताया गया है। श्रीराम का जीवन सिखाता है कि सच्ची महानता ज्ञान और शक्ति में ही नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति सम्मान और विनम्र व्यवहार में भी होती है।

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सत्य और धर्म के मार्ग पर हमेशा अडिग रहे श्रीराम

भगवान श्रीराम के जीवन में कितनी भी कठिन परिस्थितियां आईं, लेकिन उन्होंने हमेशा धर्म और सत्य का साथ दिया। वहीं, रामायण में रावण को वेदों का ज्ञाता बताया गया है, लेकिन उसका आचरण उसके ज्ञान के विपरीत था। श्रीराम का जीवन सिखाता है कि केवल ज्ञान प्राप्त करना ही काफी नहीं, बल्कि उसे अपने व्यवहार और कर्मों में उतारना भी जरूरी है।



अहंकार से दूर रहे श्रीराम

रामायण में रावण के पतन की एक बड़ी वजह उसका अहंकार बताया गया है। वहीं, भगवान श्रीराम ने अपार शक्ति और सामर्थ्य होने के बावजूद विनम्रता और मर्यादा का साथ नहीं छोड़ा। धार्मिक मान्यताओं में रावण के दस सिर को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी जैसी बुराइयों का प्रतीक भी माना जाता है। श्रीराम का जीवन संदेश देता है कि व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे अहंकार से दूर रहकर विनम्रता अपनानी चाहिए।


कर्तव्यपरायणता और आदर्श चरित्र की मिसाल हैं श्रीराम
भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में पुत्र, भाई, पति और राजा के रूप में कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से किया। उनके फैसलों में मर्यादा, नैतिकता और जिम्मेदारी की झलक दिखाई देती है। वहीं, रामायण में रावण के कई कार्यों को उसकी महत्वाकांक्षा, लालसा और अहंकार से जोड़कर देखा जाता है। श्रीराम का जीवन सिखाता है कि सच्चा आदर्श वही है, जो हर परिस्थिति में अपने कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता दे। 
 

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