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जानिए सबसे खतरनाक कैंसर के बारे में

Sat, 05 Apr 2014 11:29 AM IST
Updated Sat, 05 Apr 2014 11:29 AM IST
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lungs cancer is the most dangerous cancer

एक अध्ययन से पता चला है कि फेफड़े के कैंसर से पीड़ित आधे लोगों की मौत छह महीने के अंदर ही हो जाती है।

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कैंसर मरीजों के जीवित रहने की दर में बदलाव की निगरानी करने वाली संस्था मैकमिलन कैंसर सपोर्ट का कहना है कि शुरुआती जांच में बीमारी का पता लगाना ही बचने का मुख्य उपाय है।

अध्ययन के अनुसार, स्तन एवं प्रोस्टेट कैंसर के मामले में पांच वर्ष तक जीवित रहने की दर 80 प्रतिशत होती है, जबकि फेफड़े के कैंसर के मामले में यह दर 10 प्रतिशत है।
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फेफड़े के कैंसर से पीड़ित जो लोग पांच वर्ष तक जीवित रहते हैं उनमें किसी और कैंसर के शिकार होने की संभावना दस गुनी ज़्यादा होती है।

संस्था ने 2004 से 2011 के बीच इंग्लैंड के लगभग 85,000 कैंसर मरीजों के अनुभवों का अध्ययन किया और रिपोर्ट तैयार की है।

शोधकर्ताओं ने उन लोगों के बारे में जानकारी इकट्ठा की जो चारों प्रकार के -स्तन, प्रोस्टेट, फेफड़ा और मस्तिष्क- कैंसरों में से किसी एक से शुरुआती जांच में पीड़ित मिले।
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शोधकर्ताओं ने दिखाया कि स्तन कैंसर से पीड़ित 20 प्रतिश महिला और प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित 25 प्रतिशत पुरुष रोग के पता लगने के बाद कम से कम से कम सात वर्ष तक जीवित रहे।

लेकिन फेफड़े के कैंसर या मस्तिष्क कैंसर की तस्वीर कहीं ज्यादा भयावह दिखी।

मस्तिष्क कैंसर में तो जीवित रहने की संभावना एक प्रतिशत होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, फेफड़े के कैंसर से पीड़ित पांच में एक रोगी की पुष्टि होने के एक महीने में ही मृत्यु हो जाती है, जबकि 73 प्रतिशत रोगी साल भर के अंदर मर जाते हैं।

हालांकि कैंसर की अन्य बीमारियों में जीवित रहने की दर इंग्लैंड में पिछले 40 वर्षों में बढ़ी है।

मैकमिलन के मुखिया सायरन डेवेन ने कहा कि अध्ययन के नतीजों में ''भारी उतार चढ़ाव'' का पता चला है।

'सबसे बड़ा हत्यारा'
ब्रिटिश लंग फाउंडेशन के चीफ एक्जीक्यूटिव डॉ। पेनी वुड्स ने कहा कि यूरोप और अमरीका के मुक़ाबले फेफड़े के कैंसर में जीवन प्रत्याशा का कम रहने के पीछे देरी से पता लगना एक बड़ा कारण है।


उन्होंने कहा कि फेफड़े का कैंसर देश में सबसे बड़ा हत्यारा है और हमें सचेत रहना होगा।

फेफड़े के कैंसर के अधिकांश मामले धूम्रपान से संबंधित होते हैं जोकि इस बीमारी का सबसे बड़ा कारक है।

हालांकि इसकी दर पुरुषों में कम हो रही है और महिलाओं में इसका ख़तरा बढ़ रहा है क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध और सत्तर के दशक के बाद उनमें धूम्रपान की आदत बढ़ी है।

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