Alert: आपके बच्चे के दिल में भी तो नहीं है छेद? भारत में बढ़ रहे हैं मामले, जानिए इस बीमारी के बारे में सबकुछ
डॉक्टर बताते हैं कि देश में हर घंटे दिल में छेद की समस्या के साथ करीब चार बच्चे जन्म ले रहे हैं। यह भविष्य में हृदय संबंधित बीमारियों के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र पर दबाव बढ़ाने वाली समस्या हो सकती है। जन्मजात हृदय संबंधित समस्याओं के शिकार बच्चों को विशेष उपचार की आवश्यकता होती है।
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आपने भी अपने आस-पास के किसी न किसी बच्चे के दिल में छेद होने की समस्या के बारे में जरूर सुना होगा। ये दिक्कत दुनियाभर के बच्चों में देखी जा रही है। वैश्विक आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि दिल से संबंधित बीमारियों का खतरा सभी उम्र के लोगों में तेजी से बढ़ता जा रहा है, बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। जन्मजात होने वाली हार्ट की ये समस्या भविष्य में कई प्रकार की गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती है, जिसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों के अलर्ट करते हैं।
दिल में छेद की समस्या और इससे पीड़ित बच्चों के मामले काफी आम होते जा रहे हैं। जैसा कि इस बीमारी का नाम है, क्या वास्तव में इसके कारण दिल में छेद हो जाता है? या फिर ये कोई अलग समस्या है। इस बारे में समझने के लिए अमर उजाला ने पुणे स्थित एक अस्पताल में वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ नरेंद्र.एन सिंह से बातचीत की।
डॉक्टर बताते हैं कि देश में हर घंटे दिल में छेद की समस्या के साथ करीब चार बच्चे जन्म ले रहे हैं। यह भविष्य में हृदय संबंधित बीमारियों के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र पर दबाव बढ़ाने वाली समस्या हो सकती है। जन्मजात हृदय संबंधित विकारों के शिकार बच्चों को विशेष उपचार की आवश्यकता होती है।
दिल में छेद होने की समस्या
दिल में छेद होने की समस्या को मेडिकल की भाषा में वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (वीएसडी) के नाम से जाना जाता है। ये एक जन्मजात दोष है जिसके कारण हृदय के लोवर चैंबर (निचले कक्षों) के बीच असामान्य रूप से ओपनिंग (सामान्य बोलचाल की भाषा में छेद) हो जाती है। यह शिशुओं में सबसे आम हृदय दोष है।
वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट के कारण ऑक्सीजन युक्त रक्त का संचार शरीर के बाकी हिस्सों में होने के साथ छेद के कारण फेफड़ों में भी वापस आने लग जाता है। डॉक्टर कहते हैं, कई बार छोटे आकार के छेद की समस्या अपने आप ठीक हो जाती हैं। हालांकि अगर इसका आकार बड़ा है और इसके कारण गंभीर समस्याएं होने लगे तो डॉक्टर सर्जरी करने की सलाह दे सकते हैं।
दिल में छेद होने के क्या कारण हैं?
डॉक्टर बताते हैं, दिल में छेद की समस्या गर्भावस्था के दौरान बच्चे का दिल विकसित होने के समय होता है। जब हार्ट को बाएं और दाएं हिस्सों में बांटने वाली मांसपेशियां पूरी तरह से नहीं बन पाती हैं, तो इसके कारण स्वाभाविक रूप से एक गैप बन जाता है। इस गैप या छेद का आकार अलग-अलग हो सकता है।
डॉ नरेंद्र कहते हैं, इस तरह की दिक्कत के क्या कारण हैं ये बहुत स्पष्ट नही हैं। पर कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि कुछ प्रकार के आनुवंशिकी और पर्यावरणीय कारक इसमें भूमिका निभा सकते हैं। वीएसडी की दिक्कत अकेले या फिर हृदय की अन्य कुछ समस्याओं के साथ भी हो सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट के कारण कई बार हार्ट अटैक और हृदय से संबंधित कुछ अन्य प्रकार की दिक्कतों को खतरा हो सकता है।
कहीं आपके बच्चे को भी तो नहीं है ये दिक्कत?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, सभी माता-पिता को जन्म के बाद एक बार बच्चों के हार्ट की जांच जरूर करानी चाहिए। जन्मजात हृदय दोष के लक्षण आमतौर पर जन्म के पहले कुछ हफ्तों या महीनों के दौरान ही दिखाई दे जाते हैं। वेंट्रिकुलर सेप्टल दोष (वीएसडी) के लक्षण छेद के आकार और किसी अन्य हृदय समस्या होने पर निर्भर करते हैं। अगर आपके बच्चे को भी इस तरह की कोई समस्या हो रही है तो तुरंत किसी विशेषज्ञ की सलाह ले लें।
- तेजी से सांस लेना या सांस फूलना
- घरघराहट की आवाज आना, स्टेथोस्कोप से ये समस्या और स्पष्ट होती है।
- हार्ट बीट बहुत ज्यादा या कम होना।
- अक्सर थकान या कमजोरी महसूस होते रहना।
ऐसे बच्चों में होता है ज्यादा जोखिम
वैसे तो दिल में छेद होने का खतरा किसी भी बच्चे को हो सकता है पर कुछ बच्चों में इसका जोखिम अधिक देखा जाता रहा है।
जिन बच्चों का जन्म समय से पहले हो जाता है या फिर डाउन सिंड्रोम और अन्य आनुवंशिक स्थितियों की समस्या है उनमें वेंट्रिकुलर डिफेक्ट होने का जोखिम भी अधिक देखा जाता रहा है। इतना ही नहीं वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट के साथ पैदा हुए बच्चों में कई और दिकक्तें (जैसे एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट, डबल आउटलेट सिंड्रोम) होने का भी खतरा अधिक रहता है, इसलिए जरूरी हो जाता है कि बच्चे की एक बार अच्छे से जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह ले लें।
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स्रोत और संदर्भ
About Ventricular Septal Defect
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।