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प्याज की राजनीति में किसान कहीं नहीं

Mon, 18 Nov 2019 10:15 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 18 Nov 2019 10:15 AM IST
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Rising onion prices fueling India inflation
अपने देश में प्याज या टमाटर के दाम उछलते ही कोहराम मच जाता है, क्योंकि प्याज की बलिबेदी पर सरकारें भी चढ़ जाती हैं। - फोटो : self

अपने देश में प्याज या टमाटर के दाम उछलते ही कोहराम मच जाता है, क्योंकि प्याज की बलिबेदी पर सरकारें भी चढ़ जाती हैं। इसलिए राजनीतिक रूप से इस अति संवेदनशील मसले पर सत्ताधारी तुरंत सक्रिय हो उठते हैं ताकि विपक्ष के हाथ यह मारक शस्त्र न लग जाय। लेकिन प्याज या टमाटर उगाने वाला किसान जब फसल बरबाद होने पर या कम दाम मिलने पर आत्महत्या करता है तो न तो उपभोक्ता को दर्द होता है और न ही सरकार को किसी भी तरह की संवेदनशीलता का अहसास होता है। जबकि प्याज और किसान का अस्तित्व एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।  

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केवल कृषि उपज की मंहगाई पर हायतौबा क्यों?
सदी की शुरुआत यानी कि वर्ष 2000 में प्याज की दरें सामान्य स्थिति में फुटकर बाजार में 10 से 15 रुपए किलो के आसपास होती थी और 19 साल बाद मई जून में कीमतें उछलने से पहले फुटकर में उसी प्याज की कीमत 20 रुपए के आसपास रही। जबकि अकृषि उत्पादों या अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें कई गुना अधिक बढ़ गईं। नब्बे के दशक में हमने 5 रुपए लीटर भी पेट्रोल खरीदा जो कि आज 75.35 रुपए प्रति लीटर हो गया। नब्बे के दशक में जो वस्तु 500 रुपए की रही होगी आज उसकी कीमत 5 हजार तक पहुंच गई है।
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सन् 1992 में सोना प्रति 10 ग्राम 4,334 रुपए था जो कि उछल कर 2018 में 31,438 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया। जबकि आलू प्याज या अन्य कृषि उपजों में नब्बे के दशक की तुलना में आज भी मामूली ही वृद्धि हुई। इसी प्रकार 2004-05 के मुकाबले 2018-19 तक चांदी की कीमतों में औसतन 12.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्ष 2010 में ऐसा भी वक्त आया जबकि चांदी ने सीधे 89.8 प्रतिशत की उछाल मारी। सवाल केवल प्याज का नहीं है। किसान द्वारा हाड़-मांस तोड़ने के बाद मिट्टी से पैदा किया गया खाद्यान्न, जिसके बिना हम जीवित ही नहीं रह सकते, की कीमत भी मिट्टी के भाव होने की अपेक्षा की जाती है, जबकि कारखानों या फैक्ट्रियों में उत्पादित वस्तु की आसमान छूती महंगाई पर हम उफ तक नहीं करते।
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मेहनत किसान की और लाभ बिचैलियों का
नेशनल हॉर्टिकल्चर रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन (एनएचआरडीएफ) के अनुसार, प्याज उत्पादन की औसत लागत 9-10 रुपए है और यही लागत किसान को मिल भी रही है। इसका मतलब है कि किसान प्याज के खेतों में जो पसीना बहाता है उससे उसके लिए केवल गरीबी और अभाव ही उपजता है, जबकि उपभोक्ता एक किलो प्याज के लिए 80 से 90 रुपए तक का भुगतान करना पड़ रहा है। फाउंडेशन के अनुसार थोक मूल्य लगभग 35-40 रुपए किलो हो सकता है, दिल्ली में एक औसत उपभोक्ता को 50 रुपये से 80 रुपए के बीच अतिरिक्त देना पड़ता है।

चूंकि उपभोक्ता किसान से बड़ा वोट बैंक है और उसकी राजनीतिक आवाज में भी ज्यादा दम है इसलिये कीमतें बढ़ने पर उपभोक्ता की तो सुनी जाती है मगर संकटग्रस्त किसान द्वारा अपने कष्टों से मुक्ति के लिये सबसे सरल आत्महत्या का रास्ता अपनाने पर सरकारों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती है। केन्द्र सरकार का साल के शुरू में प्याज निर्यात पर 10 प्रतिशत सबसिडी समाप्त करना तथा 1 लाख टन निर्यात करना इसका उदाहरण ही है।

 

Rising onion prices fueling India inflation
लगभग हर घर और हर रसोई में धमक के कारण प्याज एक राजनीतिक हथियार ही नहीं बल्कि राजनीतिक तख्ता पलट का एक हथियार भी बन गया है। - फोटो : एएनआई

तख्ता पलट का हथियार बना प्याज
लगभग हर घर और हर रसोई में धमक के कारण प्याज एक राजनीतिक हथियार ही नहीं बल्कि राजनीतिक तख्ता पलट का एक हथियार भी बन गया है। हर तबके के आधुनिक खानपान में प्याज की बढ़ती मांग के चलते इसका महत्व भी बढ़ता जा रहा है। प्याज की राजनीति में दखल  आज की नहीं है। अगर आपको याद होगा तो अस्सी के दशक में स्वयं इंदिरा गांधी ने प्याज के हथियार का इस्तेमाल तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के खिलाफ किया था। इंदिरा गांधी ने अपने पूर्व आपातकालीन शासन में जेपी आंदोलन के दौरान अपनी सरकार के खिलाफ उपभोक्ता वस्तुओं की महंगाई के खिलाफ जनता के गुस्से को देखा था। जब इंदिरा गांधी सरकार ने इमरजेंसी लगाई थी तब खाद्य मुद्रास्फीति बहुत अधिक थी और प्याज की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गई थीं।

मूल्य वृद्धि का दोष काला बाजारी पर मढ़ा गया था, लेकिन जनता के गुस्से को विपक्ष ने सरकार की ओर मोड़ दिया था। बाद में जनता पार्टी की सरकार उच्च मुद्रा स्फीति का मुकाबला पुरजोर ढंग से नहीं कर पाई जिस कारण इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव में 65 प्रतिशत सीटों पर वापस लौट आयी। वर्ष 1998 में प्याज एक बार फिर बिकराल हुआ तो उसने दिल्ली की राजनीति में उथल पुथल कर दी। उस साल प्याज के 60 रुपये तक उछल जाने के कारण विपक्षी कांग्रेस को एक बड़ा हथियार भाजपा के खिलाफ मिल गया और दिल्ली प्रदेश के उपचुनाव में सुष्मा स्वराज के नेतृत्व में भाजपा चुनाव हार गयी। जबकि इससे पहले दिल्ली में लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया था, मगर भाजपा वापसी नहीं कर सकी है। स्वर्गीय शीला दीक्षित सुषमा स्वराज की जगह दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला और 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं। जो हथियार शीला दीक्षित और कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ चुनाव में चला था बाद में वहीं हथियार केजरीवाल के हाथ लग गया।

दिल्ली में दीक्षित सरकार के पतन के लिये काफी हद तक प्याज की कीमतों को भी माना गया। वर्ष 2013 के चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा के आने पर कांग्रेस के समर्थन से अल्पमत की केजरीवाल सरकार आयी जो ज्यादा नहीं टिक सकी। मगर 2015 में जब दुबारा चुनाव हुये तो आम आदमी पार्टी ने 70 में 67 विधानसभा सीटें जीत कर सत्ता हथिया ली।
 

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अगर मांग कम और आपूर्ति अधिक हो तो वस्तु सस्ती हो जाती है और अगर मांग अधिक और आपूर्ति कम हो तो वस्तु महंगी हो जाती है। - फोटो : अमर उजाला

प्याज की मांग और आपूर्ति में असन्तुलन
किसी भी वस्तु की कीमत मांग और आपूर्ति के बीच सन्तुलन से तय होती है। अगर मांग कम और आपूर्ति अधिक हो तो वस्तु सस्ती हो जाती है और अगर मांग अधिक और आपूर्ति कम हो तो वस्तु महंगी हो जाती है। प्याज अर्थशास्त्र के इस सर्वमान्य सिद्धान्त का अपवाद नहीं है। जिस तरह जनसंख्या बढ़ रही है तथा बढ़ती आबादी का जीवनस्तर उठ रहा है उसी अनुपात में प्याज की मांग भी बढ़ रही है। लेकिन प्याज उगाने वाले खेत शहरीकरण के विस्तार से सिकुड़ने के साथ ही उर्वरा शक्ति के घटने से प्याज की आपूर्ति घटना स्वाभाविक ही है। इस पर अति वृष्टि, बाढ़ और कभी सूखे के कारण भी फसल चैपट हो जाती है। इस बार भी महाराष्ट्र में बाढ़ से किसानों की फसल बरबाद हो गयी। जो प्याज बाजार में आया भी वह अच्छे किस्म का नहीं था। इसलिये प्याज की मांग और आपूर्ति का सन्तुलन बिगड़ना स्वाभाविक ही था।

प्याज की चिंता है मगर प्याज उत्पादक की नहीं
प्याज की कीमतों में उछाल रोकने के लिये प्याज का उत्पादन बढ़ाना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी उस उत्पादक के संकटों को दूर करना भी है। लेकिन हमारे देश में लोगों को प्याज तो सस्ता चाहिये चाहे किसान जिये या मरे। किसान को बीज, खाद, डीजल जैसी खेती के लिये आवश्य चीजें सस्ती मिले या न मिले मगर प्याज सस्ती होनी चाहिये। मौसम की मार से एक तो फसल की बरबादी और ऊपर से कर्ज का बोझ किसानों को आत्महत्याएं करने पर मजबूर कर देता है। दिसम्बर 2018 की ही तो बात है जब श्रेयश अभाले नाम के किसान ने 1 रुपये किलो की दर से  2657 किलाग्राम प्याज बेच कर केवल 6 रुपये का मुनाफा कमाया तो उसने वह रकम मनी आर्डर द्वारा तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस को भेज दी। ये स्थिति जब किसानों की होगी तो वे आत्महत्याएं नही ंतो क्या करेंगे?

दरअसल किसान वर्ग उपभोक्ता से बड़ा वोट बैंक नहीं है, इसलिये उसके संकटों की भी परवाह किसी को नहीं होती है। देश का लगभग 50 प्रतिशत प्याज उत्पादन महाराष्ट्र में होता है जहां देश में सर्वाधिक किसान आत्महत्याएं करते हैं। नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में अकेले वर्ष 2016 में 11,379 किसानों ने आत्महत्याएं कीे जिनमें से मरने वाले 2,550 किसान अकेले महाराष्ट्र के थे। एनसीआरबी की 2016 की रिपोर्ट के आंकड़े प्रति माह 948 और प्रतिदिन 31 किसानों की आत्महत्याओं की पुष्टि करते हैं। महाराष्ट्र का भी 50 प्रतिशत प्याज उत्पादन नासिक में होता है और राज्य की सर्वाधिक आत्महत्याएं भी नासिक में ही दर्ज होती हैं। इसी साल जनवरी के महीने के पहले 20 दिनों में नासिक में 18 किसानों ने आत्महत्याऐं कीं। इसी नवम्बर का महीना ही ले लें तो इसके पहले ही सप्ताह मानसूनी वर्षा से फसल बरबाद होने पर नासिक जिले के 4 किसानों ने आत्महत्याऐं कर रोज-रोज की मुसीबतों से मुक्ति पा ली।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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