25 से कम उम्र वाले भी बन रहे हैं हार्ट अटैक के शिकार, दिल की बीमारियों से बचाएंगी ये नई तकनीकें
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एक दशक पहले हृदय रोगों की बात करते हुए उम्र मायने रखती थी, क्योंकि यह एक प्रमुख कारण था जो हृदय रोगों की समस्या को बढ़ाता था। इस समय काम का तनाव, खराब लाइफ स्टाइल और खान-पान की गलत आदतें युवा पीढ़ी के बीच कई स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ावा दे रही है। इसमें हृदय रोग ने तो आज की युवा पीढ़ी पर बुरी तरह अटैक किया है।
क्या कहते हैं डॉक्टर
जब 32 वर्षीय प्रकाश को मनीपाल हॉस्पिटल, द्वारका में डॉ. युगल के. मिश्रा के सामने लाया गया तो उसके लक्षण स्पष्ट तौर पर इस बात की तरफ इशारा कर रहे थे कि मरीज को तत्काल कोरोनरी आर्टरी बाईपास ग्राफ्ट की आवश्यकता है। वह सीने में गंभीर दर्द, सांस लेने में परेशानी, अत्यधिक थकान और घबराहट जैसी समस्याओं के साथ आया था।
लक्षणों पर रहें अलर्ट
दरअसल, जब भी किसी मरीज को हार्ट अटैक आता है तो हृदय के कुछ हिस्सों में रक्त की पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति न हो पाने के कारण उन्हें भरपूर मात्रा में ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं। सीएबीजी सर्जरी के माध्यम से उन हिस्सों में एक मुक्त नस या आर्टियल बाईपास का इस्तेमाल कर नए सिरे से खून पहुंचाया जाता है। यह हृदय के सामान्य हिस्सों से ब्लॉक आर्टरियों को बाईपास कर प्रभावित इलाकों से जोड़ा जाता है। मुक्त नस या आर्टरी को मरीज के शरीर के अन्य हिस्सों से लिया जाता है जैसे पैर या फीमर यानी जांघ की हड्डी या भुजाओं या फिर सीने के हिस्सों से ही इन्हें लिया जाता है।
इस बारे में डॉ. युगल के मिश्रा, प्रमुख, कार्डिएक साइंसेज एवं प्रमुख कार्डियो वैस्क्यूलर सर्जन ने कहते हैं, 'क्योंकि मरीज 32 वर्ष का युवा था हमारा लक्ष्य ऐसी सर्जिकल प्रक्रिया अपनाना था जो उन्हें जल्दी से जल्दी अपने पैर पर खड़े होने में सक्षम बना सके। न्यूनतम नुकसानदायक सर्जिकल प्रक्रिया न सिर्फ रक्त का न्यूनतम नुकसान सुनिश्चित करता है बल्कि इसमें मरीज में सुधार की अवधि भी कम होती है। इसके साथ अस्पताल में भी कम समय ठहरना पड़ता है।
बाईपास ग्राफ्टिंग का पारंपरिक तरीका रिब केज या स्टरनम के माध्यम से कट लगाना होता है जिसका मतलब है सीने की हड्डियों में कट लगाना। इस तरीके का उद्देश्य पारंपरिक सीएबीजी से होने वाले नुकसान को कम करना और इसके साथ ही सर्जिकल रीवैस्क्यूलराइजेषन के उपयोग और टिकाऊपन को सुरक्षित रखना।
हालांकि जोखिम के कई कारण बताए गए, धूम्रपान और तंबाकू के अन्य रूप, डिसलिपिडेमिया या ब्लड लिपिड का उच्च स्तर और उच्च रक्तचाप युवाओं में जोखिम के प्रमुख कारण हैं। डॉ. मिश्रा ने बताया, सीएबीजी की जरूरत वाले मरीजों की औसत उम्र काफी हद तक कम होती जा रही है। शोध में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं।
90 के दशक के मध्य में भारत में हर वर्ष करीब 10,000 सीएबीजी सर्जरियां होती हैं। मौजूदा आंकड़े इसमें महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाते हैं और आज के समय में हर वर्ष करीब 60,000 सर्जरियां होती हैं। मेरे अनुभव में मरीजों की उम्र घटकर 20 से 40 वर्षों के बीच रह गई है और यह खतरनाक आंकड़ा है। 2015 तक 6.2 करोड़ भारतीय सीएडी से पीड़ित हैं जिनमें से 2.3 करोड़ मरीज 40 वर्ष से कम उम्र के थे। अनुमान दर्शाते हैं कि 2025 तक सीएडी में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हो जाएगी।’’
बेहतर प्रौद्योगिकी और नवोन्मेश के साथ सर्जरी हृदय के धड़कते हुए या रक्त की पंपिंग करते हुए भी की जा सकती है और इसे ऑफ पंप कोरोनरी बाईपास (ओपीसीएबी) सर्जरी कहते हैं। यह प्रक्रिया ज्यादातर मरीजों में की जा सकती है। मिनिमली इनवैसिव डायरेक्ट कोरोनरी आर्टरी बाईपास (एमआईडीसीएबी) परफ्यूजन पंप का उपयोग किए बगैर किया जा सकता है।
जैसा कि नाम से पता चलता है कि इसमें किया गया कट अपेक्षाकृत छोटा होता है और हृदय के पास सीने के बाएं हिस्से में किया जाता है। हृदय तक पहुंच के लिए रिब का छोटा हिस्सा निकाला जाता है। यह उन मरीजों में किया जा सकता है जिन्हें कट के करीब आर्टरियों पर एक या दो ग्राफ्ट की आवश्यकता होती है।
डॉ. युगल के मिश्रा कहते हैं-,जीवनशैली में बदलाव और तेजी से होते शहरीकरण ने भारत में कार्डिएक बीमारियों को बढ़ावा दिया है। सर्जरियों में विकसित हो रही प्रौद्योगिकियों और नवोन्मेश के साथ डॉक्टर कार्डिएक देखभाल में बेहतर गुणवत्ता मुहैया कराने में सक्षम हुए हैं, खास तौर पर अत्यधिक जोखिम वाली सर्जरियों में ऐसी देखभाल की सख्त जरूरत होती है। मेरे अनुभव में मैंने कई मरीजों का उपचार किया जिनमें अधिकतर सीएबीजी और वैल्यू रिप्लेसमेंट के मामले रहे हैं।
दुनिया भर में कार्डियोवैस्क्यूलर बीमारियों के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है और लगातार बढ़ रहे हैं, खासतौर पर विकासशील देशों में। एक विकासशील देश के तौर पर भारत में यही स्थिति है, इसके साथ ही भारत में पिछले तीन दशकों में कोरोनरी आर्टरी बीमारियां दोगुनी हो गई हैं जो विकसित देशों के मुकाबले बिल्कुल उलट है जहां ऐसे मामले 50 फीसदी कम हुए हैं।
सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 35 वर्ष से कम उम्र में बीमारी में 10 फीसदी बढ़ोतरी का अनुमान है। पिछले तीन दशकों में डायबिटीज मेलिटस, उच्च रक्तचाप, डाइस्लिपीडेमिया समेत जोखिम के कारणों में भी बढ़ोतरी हुई है। मेटाबॉलिक सिंड्रोम जो उच्च रक्तचाप, मोटापे, ग्लूकोज टॉलरेंस, अधिक ट्रिगलीसेराइड्स, कम एचडीएल कोलेस्ट्राॅल जैसे कई कार्डियोवैस्क्यूलर जोखिम कारणों का समूह भी भारत में बढ़ा है।
नोटः यह लेख आपकी जागरूकता बढ़ाने के लिए साझा किया गया है। किसी बीमारी के शिकार हैं तो अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।