बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस टेस्टिंग से जुड़ी एक तस्वीर वायरल हो रही है। इस तस्वीर में दावा किया जा रहा है कि कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए जो स्वॉब स्टिक नाक के अंदर डाली जा रही है, वह 'ब्लड ब्रेन बैरियर' पर जाकर सैंपल ले रही है। इस जैसे कई अन्य दावों की पड़ताल की गई है। स्वॉब स्टिक के ब्लड ब्रेन बैरियर तक पहुंचने का दावा पूरी तरह गलत साबित हुआ। ये सोचना पूरी तरह गलत है कि आप अपनी नाक में एक स्वॉब स्टिक (रुई का फाहा) डालकर 'ब्लड ब्रेन बैरियर' तक पहुंच सकते हैं। ये दावा करना भी ब्लड ब्रेन बैरियर के प्रति कम समझ को दर्शाता है।
Coronavirus test: कोरोना का टेस्ट कराने से क्या दिमाग पर असर पड़ता है? जानिए पूरी सच्चाई
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दिमाग सुरक्षित रहता है
दरअसल, दिमाग के आसपास इसकी सुरक्षा के लिए कई स्तर की व्यवस्था होती है। सबसे पहले दिमाग खोपड़ी में सुरक्षित रहता है। इसके बाद दिमाग तरल पदार्थ और झिल्लियों में कैद रहता है। दिमाग के आसपास बह रही खून की धमनियों में ब्लड ब्रेन बैरियर मौजूद होता है। यह कई परतों वाली कोशिकाओं से बना होता है। इसका काम खून में मौजूद अणुओं को दिमाग में पहुंचने से रोकना और ऑक्सीजन समेत अन्य पोषक तत्वों को जाने देना है। ऐसे में अगर स्वॉब स्टिक को नाक के अंदर डालकर ब्लड ब्रेन बैरियर तक पहुंचना है तो उसे कई परतों के उत्तकों में छेद करते हुए एक हड्डी में छेद करके, खून की नसों में पहुंचना होगा। तब जाकर आप ब्रेन ब्लड बैरियर तक पहुंच पाएंगे।
ब्रिटिश न्यूरोसाइंस एसोसिएशन से जुड़ी डॉक्टर लिज कॉल्टहार्ड कहती हैं, 'जब तक नाक में स्वॉब डालते हुए उतना दबाव न लगाया जाए कि उत्तकों और हड्डी की कई परतें टूट जाएं, तब तक स्वॉब ब्लड ब्रेन बैरियर तक नहीं पहुंच सकता है। हमने अपनी न्यूरोलॉजी प्रेक्टिस के दौरान कोविड स्वॉब से किसी तरह की समस्या नहीं देखी हैं।'
दरअसल, 'नेजोफेरेंजियल स्वॉब' कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए नाक की पिछली दीवार के नमूने लेता है। ये कई स्वॉब सैंपल तकनीकों में से एक है। ब्रिटेन समेत कई देशों में कोविड-19 की जांच करने के लिए नाक और गले का स्वॉब सैंपल नियमित रूप से लिया जा रहा है। लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन से जुड़े टॉम विंगफील्ड कहते हैं, 'मैंने अस्पताल में काम करते हुए कई मरीजों का स्वॉब सैंपल लिया है और हर हफ्ते एक ट्रायल के लिए अपना स्वॉब सैंपल भी लेता हूं। नाक में किसी भी चीज का इतना अंदर जाना थोड़ा अजीब है। स्वॉब सैंपल लिए जाते समय थोड़ी खुजली या गुदगुदाहट हो सकती है लेकिन दर्द नहीं होना चाहिए।'
ये झूठे दावे बीती छह जुलाई को कुछ अमेरिकी फेसबुक अकाउंट्स से शुरू हुए थे। कुछ दावों में इस बात का भी जिक्र है टेस्टिंग से इनकार करने से जुड़े कई कॉल भी आ रहे हैं। इनमें से कुछ दावों को फैक्ट चेक करने वाली संस्थाओं ने झूठा बताया है। ये भी देखा गया कि कि यही ग्राफिक रोमेनियन, फ्रेंच, डच और पुर्तगाली फेसबुक यूजर्स के अकाउंट पर भी शेयर हो रहे हैं।
टेस्टिंग किट से नहीं फैलता कोरोना वायरस
खराब टेस्टिंग किट की कुछ रिपोर्ट्स को भी गलत तरीक से पेश कर बताने की कोशिश की गई कि इनसे टेस्ट कराने से कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा है। एक खबर की हेडलाइन में ये बताया गया था महामारी के शुरुआती दौर में यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के लैब में टेस्ट के दौरान अपनाए गए गलत तरीकों के कारण टेस्ट सही तरीके से नहीं हो पाए थे। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि ये टेस्ट करवाने वाले लोग इससे संक्रमित हो सकते हैं।