फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jharkhand ›   Santhal Tribe In Jharkhand Put A Ban On The Shroud System Money Will Have To Be Given To The Victim Family

झारखंडः कफन प्रथा को हटाने के लिए एकजुट हो रहे संथाल जनजाति के लोग, बदले में पीड़ित परिवार को देंगे धन राशि

Wed, 22 Feb 2023 11:59 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: संजीव कुमार झा Updated Wed, 22 Feb 2023 11:59 AM IST
सार

संथाल जनजाति की परंपरा के अनुसार, सभी को मृतकों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए 2.5 मीटर का कफन लाना अनिवार्य होता था।

विज्ञापन
Santhal Tribe In Jharkhand Put A Ban On The Shroud System Money Will Have To Be Given To The Victim Family
संथाल जनजाति - फोटो : Social Media

विस्तार

झारखंड में संथाल जनजाति अपने एक प्राचीन मृत्यु संस्कार को सुधारने के नए रास्ते पर हैं। इसके तहत कफन प्रथा को हटाने के लिए सभी एकजुट हो रहे हैं। सभी अब इस कफन प्रथा को हटाकर आर्थिक रूप से मदद करने का फैसला लिया है। झारखंड के हजारीबाग जिले के चरही में लंबी बीमारी के बाद पिछले महीने  65 वर्षीय टुंडा मांझी के निधन के बाद अंतिम संस्कार में करीब 200 लोग शामिल हुए थे। गांव के पास वन विभाग की जमीन पर उनका अंतिम संस्कार किया गया था। उस दौरान उनकी कब्र पर सैकड़ों लोगों ने कफन चढ़ाया था जिससे वहां सिर्फ कफन ही कफन जमा हो गए थे।
विज्ञापन


संथाल जनजाति की परंपरा के अनुसार, सभी को मृतकों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए 2.5 मीटर का कफन लाना अनिवार्य होता था। इन कफनों को पार्थिव शव के साथ ही दफ्न किया जाता है। इनकी मात्रा इतनी होती है कि लोग इन्हें खरीदने के लिए 50-200 रुपये खर्च करने के बाद कब्र के पास ही जला देते हैं। हालांकि सदियों से चली आ रही यह रस्म अब खत्म होने वाली है।
विज्ञापन


कफन प्रथा को खत्म कर आर्थिक मदद करने का फैसला
पिछले महीने संथाल समुदाय के सैकड़ों लोग कजरी भुरकुंडा गांव में एकत्र हुए और अपनी कफन परंपरा को बदलने का फैसला किया। उस बैठक में, उन्होंने एक विकल्प सुझाया: जो लोग अंतिम दर्शन करना चाहते हैं वे या तो मृतक के परिवार को वित्तीय सहायता प्रदान कर सकते हैं या समुदाय को खिलाने के लिए अनाज और सब्जियां ला सकते हैं। हजारीबाग, रामगढ़ और बोकारो में भी इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


संथाल जनजाति में गरीबी चरम पर
संथाल जनजाति में, कुछ परिवार एक दिन में दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पाते हैं। कजरी भुरकुंडा में, कई परिवार कच्चे घरों में रहते हैं और फर्श पर सोते हैं, जिसका अर्थ है कि अंतिम संस्कार का खर्च उठाना उनके लिए कठिन होता है। वे ऋण लेते हैं और लागत को पूरा करने के लिए कीमती सामान जैसे साइकिल और पंखे बेचते हैं। कभी-कभी जब उन्हें किसी स्रोत से आर्थिक मदद नहीं मिलती है तो वे अनुष्ठानों को स्थगित कर देते हैं।


दिहाड़ी मजदूर महावीर मुर्मू ने कहा कि हम अभी तक अपने पिता का अंतिम संस्कार नहीं कर पाए हैं। हमें अभी भी समुदाय को खाना खिलाना है, जिसकी कीमत लगभग 30,000 रुपये होगी। मैं जो कमाता हूं वह शायद ही इतना होता है कि गुज़ारा हो सके। हम इसे कैसे वहन कर सकते हैं?  महावीर मुर्मू जो एक दिहाड़ी खेतिहर मजदूर के रूप में प्रतिदिन 200 रुपये कमाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed