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झारखंड: ट्रेन हादसे में शव से टिकट नहीं मिला तो भी मिलेगा मुआवजा, हाईकोर्ट का अहम फैसला

Thu, 29 Oct 2026 06:31 AM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: शबाहत हुसैन Updated Thu, 29 Oct 2026 06:31 AM IST
सार

झारखंड हाई कोर्ट ने ट्रेन दुर्घटना में यात्री की मौत के बाद शव से टिकट नहीं मिलने पर मुआवजा खारिज करने को गलत ठहराया। अदालत ने रेलवे दावा अधिकरण का फैसला रद्द कर परिजनों को आठ लाख रुपये और छह प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया।

 

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Compensation to be provided even if no ticket is found on a body following a train accident
झारखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसके द्विवेदी की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ट्रेन दुर्घटना में किसी यात्री की मौत होने पर उसके शव से रेल टिकट न मिलने के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज नहीं कर सकते। अदालत ने रेलवे दावा अधिकरण के फैसले को रद्द करते हुए ट्रेन हादसे का शिकार हुए बनमाली गोप के परिजनों को आठ लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि मुआवजे से संबंधित नियमों की व्याख्या उदारता से होनी चाहिए, ताकि पीड़ित परिवारों को न्याय मिल सके और केवल तकनीकी कमियों के कारण कोई परिवार राहत पाने से वंचित न रहे।

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रेलवे दावा अधिकरण के फैसले को किया रद्द

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झारखंड हाई कोर्ट ने रेलवे दावा अधिकरण के 12 सितंबर, 2023 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें टिकट बरामद न होने का हवाला देकर मुआवजे की मांग को ठुकरा दिया गया था। अदालत ने मुआवजा राशि पर दावा आवेदन दाखिल करने की तिथि से लेकर भुगतान का आदेश जारी होने तक छह प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज देने का भी निर्देश दिया है। अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि भारत में करोड़ों नागरिक प्रतिदिन ट्रेनों से सफर करते हैं, क्योंकि वे हवाई जहाज या निजी गाड़ियों का भारी-भरकम खर्च नहीं उठा सकते। ऐसे में हादसों के मामलों में राहत और मुआवजे के प्रावधानों की संकीर्ण या कठोर व्याख्या करने से देश के गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए नियमों की भावना को ध्यान में रखकर न्याय सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है।

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भीड़ में धक्का लगने से हुआ था हादसा

घटना की जानकारी देते हुए मृतक के परिजनों ने बताया कि 1 सितंबर, 2017 को बनमाली गोप पलामू जिले के झींकपानी रेलवे स्टेशन से टाटा-बड़बिल पैसेंजर ट्रेन में चढ़े थे। उन्हें केंदपोसी स्टेशन तक की यात्रा करनी थी। ट्रेन में यात्रियों की भारी भीड़ थी और स्थान न मिलने के कारण बनमाली दरवाजे के पास खड़े होकर सफर कर रहे थे। जब ट्रेन केंदपोसी स्टेशन के समीप पहुंचने लगी, तो उतरने वाले यात्रियों के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। इसी दौरान ट्रेन में अचानक आए तेज झटके और पीछे से लगे धक्के के कारण बनमाली का संतुलन बिगड़ गया और वह चलती ट्रेन से सीधे नीचे पटरियों पर गिर गए। इस भीषण हादसे में उनके दोनों पैर कट गए और अत्यधिक खून बह जाने के कारण मौके पर ही उनकी दर्दनाक मौत हो गई।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट और साक्ष्यों को माना अहम

हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस की पोस्टमार्टम रिपोर्ट, स्टेशन प्रबंधक द्वारा लिखे गए पत्र और मामले के प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों को अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख था कि मृतक के शरीर पर लगी गंभीर चोटें ट्रेन दुर्घटना के कारण ही आई थीं। इसके अतिरिक्त, स्टेशन प्रबंधक के आधिकारिक पत्र में भी रात लगभग 8:25 बजे रेलवे लाइन के निकट एक व्यक्ति का शव मिलने की सूचना दर्ज थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि बनमाली के भाई ने गवाही देते हुए स्पष्ट कहा था कि यात्रा से पूर्व टिकट खरीदा गया था। रेलवे प्रशासन ने भाई की इस गवाही को अदालत में कोई चुनौती नहीं दी। इसके साथ ही रेलवे ने इस दुर्घटना से जुड़ी मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) की जांच रिपोर्ट भी अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं की। इन सभी तथ्यों और दस्तावेज का गहन अध्ययन करने के पश्चात अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि बनमाली वास्तव में एक वैध यात्री थे और ट्रेन में यात्रा के दौरान ही दुर्घटनाग्रस्त होकर उनकी जान चली गई थी।

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