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रांची: राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, धर्म जहां रुक जाता है, अध्यात्म वहीं से शुरू होता है

Thu, 16 Nov 2017 11:18 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला
टीम डिजिटल, अमर उजाला Updated Thu, 16 Nov 2017 11:18 PM IST
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ramnath kovind said spirituality starts where religion stops at yogoda satsang math ranchi
योगदा सत्संग मठ में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद - फोटो : @dasraghubar
योगदा सत्संग सोसाइटी ने दुनिया भर में योग विज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। दरअसल, अध्यात्म भारत की आत्मा है, जो भारत की ओर से पूरी दुनिया को महत्वपूर्ण देन है। पहले विवेकानंद और फिर परमहंस योगानंद जी ने अध्यात्म का यह मार्ग प्रशस्त किया था। सोसाइटी से जुड़े लोग, जो सेल्फ रियलाइजेशन (आत्म साक्षात्कार) और मेडिटेशन (ध्यान) के रास्ते पर चल रहे हैं, उन्हें मेरी शुभकामनाएं।  राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने उदगार कुछ यूं व्यक्त किए। झारखंड स्थापना दिवस पर रांची पहुंचे कोविंद ने बुधवार को योगदा सत्संग सोसाइटी में 'ईश्वर-अर्जुन संवाद' का विमोचन किया। 
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि गीता का यह प्रकाशन समयानुकूल है और उपयोगी भी। इस किताब का मर्म मनुष्य के अंदरूनी झंझावत का हर युद्ध लड़ता है। आदमी ऐसी लड़ाई अपने विवेक से नहीं अध्यात्म से ही जीत सकता है। योगानंद जी ने 1918 से 1920 तक रांची के इसी आश्रम को अपनी कर्म स्थली बनाया था। इसके बाद वे अगले 32 वर्षों तक अमेरिका में क्रिया योग का प्रचार-प्रसार करते रहे। 1935 में वे फिर रांची लौट आए थे। गांधीजी भी 1925 में आश्रम आए थे। राष्ट्रपति ने कहा कि धर्म जहां रुक जाता है, अध्यात्म वहीं से शुरू होता है। 
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अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने परमहंस की आत्मकथा 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ योगी' की भी चर्चा की। उन्होंने कहा, 'यह आत्मकथा हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। मैंने भी यह किताब पढ़ी है।'  सोसाइटी के अध्यक्ष चिदानंद जी ने कहा कि 'ईश्वर-अर्जुन संवाद' भारत सहित दुनिया को एक उपहार है। यह गीता के ज्ञान की वैज्ञानिक व्याख्या है।
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पश्चिमी देश उन्हें 'फादर ऑफ योगा' कहते हैं

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परमहंस योगानंद जी
परमहंस ने भारत के राज योग विज्ञान का दुनिया भर खास कर पश्चिम जगत में प्रचार-प्रसार किया इसलिए पश्चिमी देशों में उन्हें 'फादर ऑफ योगा' कहा जाता है। भारत सचमुच दुनिया भर के लिए आध्यात्मिकता का केंद्र है। मैं खुद इसका सबसे बड़ा लाभार्थी हूं। मेरा जन्म पश्चिम में जरूर हुआ, पर मेरी धरती भारत है। मेरा मानना है कि आध्यात्मिकता हर आत्मा को जोड़ती है, तोड़ती नहीं। यह मानव के बेहतर विकास और इसके अस्तित्व के लिए जरूरी है। 

इससे पहले सोसाइटी के महासचिव स्मरणानंद जी ने कहा कि हर आदमी अपने जीवन में निरंतर आनंद, खुशी, विशुद्ध प्यार और सुरक्षा का भाव चाहता है। कौन नहीं चाहता कि यह सब समय, उम्र और मृत्यु से न बंधा हो। हम सभी अपने जीवन में संपूर्णता चाहते हैं लेकिन क्या ऐसा हो पाता है? दरअसल, हम विपरीत परिस्थितियों में पलायनवादी रुख अपनाते हैं। 

परमहंस योगानंद का जीवन और शिक्षा यह संदेश नहीं देती। यह सच्चाई से परिस्थितियों का सामना करना सिखाती है। ईश्वर-अर्जुन संवाद हमें आश्वस्त करता है कि जिस ईश्वर ने अर्जुन से संवाद किया, वह आपसे भी बात करेंगे। यह संवाद हमारे अंदरूनी और बाहरी जीवन में शांति और आनंद कैसे हो, इसका मार्ग दिखाता है। 
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