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झारखंडः प्रवासी मजदूरों का पहला हवाई सफर-किसी को लग रहा था बहुत डर तो किसी ने कहा आकाश 'स्वर्ग' जैसा

Fri, 29 May 2020 08:05 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: संजीव कुमार झा Updated Fri, 29 May 2020 08:05 AM IST
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Jharkhand migrant workers who returned from the chartered plane mumbai to birsa munda airport, shared their experiences
प्रवासी मजदूर(file photo) - फोटो : पीटीआई

रांची के बिरसा मुंडा एयरपोर्ट पर गुरुवार को मुंबई से वापस लौटने वाले 174 प्रवासी श्रमिकों के चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी। आखिर खुशी हो भी क्यों न, हवाई जहाज में चढ़ने का सपना जो पूरा हुआ। इस यात्रा के अनुभव के बारे में जब कुछ श्रमिकों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सपने में भी नहीं सोचा था कि वे कभी हवाई जहाज से यात्रा कर पाएंगे। वे सभी इस यात्रा के लिए बार-बार झारखंड सरकार और एलुमनाई नेटवर्क ऑफ नेशनल स्कूल ऑफ बंगलूरू  का शुक्रिया अदा कर रहे थे।  

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दरअसल झारखंड के इन 174 प्रवासी श्रमिकों ने गुरुवार की सुबह मुंबई के छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से एयर एशिया की विशेष चार्टर्ड विमान से उड़ान भरी थी। सवा दो घंटे बाद यानि सुबह 8.20 बजे ये सभी लोग रांची के बिरसा मुंडा हवाई अड्डे पर पहुंचे। बता दें कि इन लोगों की यात्रा का खर्च एलुमनाई नेटवर्क ऑफ नेशनल स्कूल ऑफ बंगलूरू ने उठाया।  
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इन हवाई यात्रियों में कईयों ने पहली बार हवाई यात्रा की। ये लोग राज्य के गढ़वा, हज़ारीबाग़, रांची आदि जिलों के निवासी हैं। कुछ मजदूर अकेले अपने घर लौटे, तो कुछ के साथ उनका परिवार भी वापस आया है। इन्हीं में से कुछ यात्रियों ने अपने पहले हवाई सफर का अनुभव भी साझा किया।

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  •  एक यात्री ने कहा कि मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं भी कभी हवाई जहाज में सफर कर पाउंगा

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार मुंबई में टाइल्स फिटर के रूप में काम करने वाले एक प्रवासी श्रमिक शंकर मंडल, गुरुवार सुबह घबराए हुए थे, क्योंकि वे पहली बार हवाई जहाज से उड़ान भरने जा रहे थे। शंकर मंडल कहते हैं कि वे कभी सपने में भी नहीं सोचे थे कि उन्हें अचानक से इस तरह से हवाई सफर करने का मौका मिलेगा। मंडल, झारखंड के हजारीबाग रोड के निवासी हैं और अपने परिवार और 10 अन्य रिश्तेदारों के साथ मुंबई से रांची के बिरसा मुंडा हवाई अड्डे के लिए उड़ान भरी थी।


मंडल ने आगे बताया कि मैंने मुंबई में कई बार अपने सिर के ऊपर से विमान को उड़ान भरते देखा। लेकिन, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं भी कभी हवाई जहाज में सफर कर पाउंगा क्योंकि मैं एक प्रवासी श्रमिक हूं और मुझे अपनी सीमा पता है। मैं उन लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने हमारे लिए यह व्यवस्था की। वे हमारे लिए भगवान हैं क्योंकि इस लंबे लॉकडाउन के दौरान हमारी सारी बचत समाप्त हो गई थी।

  • आकाश स्वर्ग की तरह लग रहा था

वहीं मंडल की पत्नि रीता देवी ने बताया कि यह सपने का पूरा होने जैसा था। जब फ्लाइट ने उड़ान भरनी शुरू की तो मैं डर गई थी। मुझे उतरते समय भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। यह एक अनूठा अनुभव था, इस दौरान आकाश स्वर्ग की तरह लग रहा था।

  • लॉकडाउन के एक महीने के बाद भोजन के संकट का सामना

झारखंड के गिरिडीह जिले के नवादा के रहने वाले असलम अंसारी ने कहा कि लॉकडाउन के एक महीने के बाद, हमारी सारी बचत समाप्त होने लगी और खाने के लाले पड़ने लगे। उन्होंने कहा कि हमने झारखंड लौटने का सोचा लेकिन हमारे पास आने का कोई विकल्प नहीं था। असलम अंसारी अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ रांची के लिए उड़ान भरी थी। असलम मुंबई में एक दर्जी के रूप में काम करते थे। और 22 मार्च से नौकरी छुट गई थी।
 

  • झारखंड सरकार के प्रवक्ता का दावा पहली बार ऐसा हुआ है

झारखंड सरकार के प्रवक्ता ने दावा किया है कि लॉकडाउन के बाद यह देश में पहला मौका है, जब प्रवासी मजदूरों को विमान से अपने राज्य वापस लाया गया है। प्रवक्ता ने बताया कि मुंबई से रांची के बिरसा मुंडा हवाईअड्डे पहुंचे मजदूरों की स्क्रीनिंग भी की गई। साथ ही उन्हें नाश्ता और पानी की बोतल दी गई। 

उन्होंने आगे बताया कि मजदूरों को उनके संबंधित जिले भेजने के लिए रांची जिला प्रशासन की ओर से बसों की व्यवस्था की गई थी, जिनसे उन्हें उनके घरों के लिए रवाना किया गया। उनमें से एक ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान वे परेशानी का सामना कर रहे थे। ऐसे में झारखंड सरकार की पहल से वे अपने घर लौट आए हैं।

  • बंगलूरू स्थित नेशनल लॉ स्कूल के पूर्व छात्रों के प्रयास से संभव हुई यह यात्रा

बता दें कि इस विशेष विमान का खर्च बंगलूरू स्थित नेशनल लॉ स्कूल के पूर्व छात्रों ने उठाया है। जिन्होंने यात्रा के लिए धन जुटाया। छह पूर्व छात्र सुहान मुखर्जी, प्रियंका रॉय, अर्कजा सिंह, शील त्रेहन, प्रिया शर्मा और शुवा मंडल ने इस यात्रा को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे लोग कुछ और विमानों का इंतजाम करा रहे हैं ताकि मजदूरों की सुखद वापसी हो सके।

उन्होंने कहा कि शुरुआत में, हम प्रवासी श्रमिकों को भेजने के लिए बसों की व्यवस्था कर रहे थे। लेकिन, जब हमने लागत की तुलना की, तो हमने पाया कि उड़ान की लागत बस के अपेक्षा बहुत अधिक नहीं थी। बस से कुल लागत लगभग 11 लाख रुपये कि थी। फिर हमने उन्हें फ्लाइट से भेजने का फैसला किया और फंड जुटाना शुरू किया।

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