ओलंपिक में भारत के पहले हॉकी कप्तान जयपाल की मांग पर बना झारखंड
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भारत ने पहली बार ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था 1928 के एम्सटर्डम खेलों में, जयपाल सिंह को भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया था, उन्होंने रांची से प्रथम श्रेणी में बीए पास किया था। वो उस समय की प्रतिष्ठित समझी जाने वाली आईसीएस की परीक्षा भी पास कर चुके थे और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के बेलियोल कॉलेज में आईसीएस की ट्रेनिंग ले रहे थे।
जयपास सिंह मुंडा जनजाति से आते थे, बाद में उन्होंने हॉकी के बाहर भी भारतीय राजनीति में ख़ासा असर डाला। मशहूर इतिहासकार राम चंद्र गुहा ने अपनी किताब ‘इंडिया आफ़्टर गाँधी- द हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी’ में जयपाल सिंह का ज़िक्र करते हुए लिखा है, “बाद में जयपाल सिंह ‘मारंग गोमके’ बन गए...छोटानागपुर की जनजातियों के बड़े नेता और बाद में भारत का संविधान बनाने के लिए जो संविधान सभा बनाई गई, उसमें उन्होंने न सिर्फ़ छोटा नागपुर बल्कि पूरे भारत की जनजातियों का प्रतिनिधित्व किया, ये उन्हीं का प्रयास था, जिसकी वजह से आज़ादी के बाद जनजातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिला।”
1928 की भारतीय हॉकी टीम में जयपाल सिंह के साथ-साथ एसएम यूसुफ़ और टाइगर पटौदी के पिता इफ़्तेख़ार अली पटौदी को भी शामिल किया गया था, ये तीनों उस समय इंग्लैंड में ही रह रहे थे।
बाक़ी के 13 खिलाड़ी पानी के जहाज़ ‘क़ैसरे हिंद’ से एम्सटर्डम के लिए रवाना हुए. इनमें से नौ खिलाड़ी एंग्लो इंडियन समुदाय से आते थे। लेकिन चलने से पहले ये कहा गया कि 13 में से सिर्फ़ 11 खिलाड़ी ही एम्सटर्डम जा पाएंगे, क्योंकि फ़ेडरेशन के पास उन्हें भेजने के लिए 19000 रुपए कम पड़ रहे हैं।
फ़ेडरेशन ने ऐलान किया कि अगर रुपयों का इंतज़ाम नहीं हुआ, तो बंगाल के शौकत अली और सेंट्रल प्रॉविंस के ए नौरिस एम्सटर्डम नहीं जाएंगे। बाद में ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “अंतत: बंगाल की खेल प्रेमी जनता की उदारता की वजह से शौकत अली और नौरिस एम्सटर्डम जाने वाली टीम में जगह बना पाए, बंगाल के लोगों ने चंदा करके एम्सटर्डम जाने का पैसा जमा किया।”
ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के पहले कप्तान थे जयपाल
जब भारत की टीम इंग्लैंड के टिलबरी बंदरगाह पहुंची, तो उसका स्वागत करने के लिए जयपाल सिंह वहाँ मौजूद थे, जयपाल सिंह को भारतीय टीम ने क़तई प्रभावित नहीं किया। उन्हें वो पुराने ज़माने के कपड़े पहने हुए, देहाती खिलाड़ी लगे।
जयपाल सिंह पूरी टीम को रीजेंट स्ट्रीट के मशहूर भारतीय रेस्तराँ वीरास्वामी ले गए। आज की तरह उस ज़माने में भी वीरास्वामी ख़ासा मंहगा रेस्तराँ हुआ करता था। शुरू के अभ्यास मैचों में शौकत अली और ध्यानचंद ने जयपाल सिंह का ध्यान खींचा।
बाद में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, “ध्यानचंद मुझे शरीफ़ आदमी लगे, उनके पास सिर्फ़ एक पतलून थी। मैं उन्हें रीजेंट स्ट्रीट पर ऑस्टिन रीड की दुकान पर ले गया, हम नीचे की मंज़िल पर गए, जहाँ उन्हें सेल्स मैन ने एक से एक पतलूनें दिखाई। जैसे ही ध्यानचंद ने कहा, क्या मैं इन्हें ऊपर ले जा कर सूरज की रोशनी में देख सकता हूँ, मेरा मुँह शर्म से लाल हो गया। जब मैंने शौकत को ये कहानी बताई तो उसने हंसते हुए कहा, तुम एक लांस नायक से और क्या उम्मीद कर सकते हो?”
जयपाल सिंह को उस समय भारतीय टीम में चुने जाने पर ख़ासा विवाद हुआ था, हाँलाकि ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “जयपाल सिंह की अंग्रेज़ खिलाड़ियों और वहाँ के मैदानों की कंडीशंस की बारीक जानकारी से भारतीय टीम को बहुत फ़ायदा हुआ और ओलंपिक खेलों की तैयारी करने में हमें बहुत मदद मिली।”
लेकिन कई सालों बाद टीम के एक और सदस्य फ़िरोज़ ख़ाँ ने अपनी 100वीं सालगिरह पर सन 2004 में पाकिस्तान में दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था कि जयपाल सिंह का भारतीय टीम में चुना जाना शुरू से ही सवालों के घेरे में था।
उनका कहना था, “जयपाल सिंह ट्रायल के दौरान मौजूद फ़ुल बैक्स से बेहतर तो क़तई नहीं थे, लेकिन टीम मैनेजमेंट की सोच यह थी कि ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ा हॉकी कप्तान, भारत में मौजूद किसी भी खिलाड़ी से बेहतर होगा। पूरी प्रतियोगिता के दौरान जयपाल सिंह भारतीय खिलाड़ियों से दूर ही रहते थे और खाने के दौरान ही उनके पास आते थे।”
फ़िरोज़ ख़ाँ ने इस बात का भी ज़िक्र किया कि जयपाल के टीम मैनेजर रोसेर से संबंध अच्छे नहीं थे और वो मैचों के बीच एम्सटर्डम से वापस इंग्लैंड चले जाते थे।
उनकी कप्तानी में खेले ध्यानचंद, टीम ने किया शानदार प्रदर्शन
भारत ने पहले मैच में ऑस्ट्रिया को 6-0 से हराया, स्टेट्समैन ने अपने 19 मई, 1928 के अंक में लिखा, “दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सेंटर फ़ारवर्ड ध्यान चंद ने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन करते हुए पहले हाफ़ में तीन गोल मारे। दूसरे हाफ़ में ध्यानचंद ने एक गोल और किया, बाक़ी दो गोल शौकत अली और गेटली ने किए।”
अगले मैच में बेल्जियम के ख़िलाफ़ भी भारत को 9-0 से जीत मिली, डेनमार्क को 5-0 से हराने के बाद भारत ने सेमी फ़ाइनल में स्विटज़रलैंड को 6-0 से हराया। फ़ाइनल में भारत ने कमज़ोर टीम खिलाते हुए भी हॉलैंड को 3-0 से हराया। स्टेट्समैन ने अपने 29 मई, 1928 के अंक में लिखा, “भारत की चमत्कारी हॉकी को स्टेडियम में मौजूद सभी चालीस हज़ार दर्शकों ने सराहा।
भारत के दो बड़े खिलाड़ी इस मैच में नहीं खेले, डेनमार्क के ख़िलाफ़ मैच में फ़िरोज़ ख़ाँ की कॉलर बोन टूट गई। शौकत अली को मैच वाले दिन बुख़ार आ गया, लेकिन इसके बावजूद भारत ने प्रभावशाली जीत दर्ज की।”
दिलचस्प बात ये है कि अख़बार में फ़ाइनल में जयपाल सिंह के न खेलने का कोई ज़िक्र नहीं किया गया है। फ़ाइनल में टीम की कप्तानी एरिक पिनेगर ने की। बाद में खेल इतिहासकार केएल कपूर ने अपनी किताब द रोमांस ऑफ़ हॉकी में लिखा, “जयपाल सिंह का टीम छोड़ने का मुख्य कारण टीम प्रबंधन और ऐंग्लो- इंडियन खिलाड़ी थे। उनके राष्ट्रवादी विचार भी हॉकी के बड़ा साहबों को रास नहीं आ रहे थे।”
ध्यान देने वाली बात यह है कि इस टूर्नामेंट में इंग्लैंड ने भाग नहीं लिया, जबकि वो उस साल का यूरोपियन चैंपियन था। उस समय चर्चा ये थी कि उन्हें डर था कि उनका ग़ुलाम देश भारत, उन्हें हॉकी के मैच में हरा न दे, बाद में ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा 'गोल' में लिखा, “पता नहीं इन अफ़वाहों में कितनी सच्चाई थी? लेकिन हम उम्मीद कर रहे थे कि कम से कम भावी ओलंपिक खेलों में हमारा सामना ग्रेट ब्रिटेन से हो, ताकि हम उन्हें दिखा पाएं कि हम उनकी तुलना में कितने अच्छे या बुरे हैं, मेरे लिए ये दुःख की बात रही कि जब तक मैं भारत के लिए खेला.... मेरी ये उम्मीद कभी पूरी नहीं हो पाई।”
संविधान सभा के सदस्य और सांसद भी रहे जयपाल
एम्सटर्डम में भारत ने बिना गोल खाए 29 गोल किए। मज़ेदार बात ये रही कि ये प्रतियोगिता असली ओलंपिक खेल शुरू होने से दो महीने पहले मई, 1928 में खेली गई, जबकि ओपनिंग सेरेमनी और बाक़ी के ओलंपिक खेल जुलाई में हुए।
जयपाल सिंह को इन खेलों में भारत की कप्तानी करने की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी. जब वो ऑक्सफ़ोर्ड पहुंचे तो उन्हें अपने प्रोफ़ेसरों की नाराज़गी का सामना करना पड़ा।
बाद में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, “मुझे बताया गया कि मैंने विश्वविद्यालय के नियमों का उल्लंघन किया है। अगर मुझे आईसीएस में बने रहना है, तो मुझे एक साल की ट्रेनिंग और करनी होगी।
अंग्रेज़ों के लिए ओलंपिक में भारत की कप्तानी करना कोई बड़ी बात नहीं थी। मैंने आईसीएस से इस्तीफ़ा दे दिया और ब्रिटिश सरकार को ये भी बता दिया कि मैं, मुझे दिए गए 350 पाउंड भी वापस नहीं करूँगा। ग़नीमत ये थी कि उन्होंने मुझे जेल नहीं भेजा।”
आईसीएस छोड़ने के बाद, उन्हें ब्रिटिश कंपनी बर्मा शेल ने अपने यहाँ ऊँचे पद पर रखने की पेशकश की, उन्हें कोलकाता की पोस्टिंग मिली। यहीं उनकी मुलाक़ात अपनी भावी पत्नी तारा विन्फ़्रेड मजुमदार से हुई। वो कांग्रेस के पहले अध्यक्ष व्योमेश बनर्जी की पोती थीं।
थोड़े दिनों बाद जयपाल सिंग कॉरपोरेट जगत की नौकरी छोड़कर राजनीति में आ गए, वो पहले संविधान सभा के सदस्य रहे और बाद में तीन बार सांसद रहे।उन्होंने ही पहली बार झारखंड राज्य के गठन की माँग उठाई और अंतत: सन 2000 में झारखंड भारत का नया राज्य बना।