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विश्व एमपीएस जागरूकता दिवस : देश के 11 अस्पतालों को दिए 40 करोड़, लेकिन मरीजों की संख्या के आगे यह नाकाफी

Mon, 15 May 2023 06:34 AM IST
Jeet Kumar परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली।
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Mon, 15 May 2023 06:34 AM IST
सार

आमतौर पर इलाज के अभाव में 10 से 15 साल तक ही यह बच्चे जीवित रह पाते हैं, लेकिन तब तक इनके उपचार में परिवार को सालाना दो करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

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World MPS Awareness Day, 40 crores given to 11 hospitals of the country
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

महाराष्ट्र के नांदेड़ निवासी 11 साल की श्रुति वंजारे म्यूकोपॉलीसैकरिडोसिस यानी एमपीएस बीमारी से ग्रस्त है। मुंबई के किंग्स एडवर्ड अस्पताल में पंजीकृत श्रुति के इलाज में करीब 50 करोड़ रुपये का खर्च होगा। अभी तक अलग-अलग एनजीओ की मदद से उनका परिवार इलाज करा रहा था, लेकिन अब औरों से मदद मिलना बंद है। मां सुजाता वंजारे का कहना है कि अगर जल्द ही उनकी बेटी को इलाज नहीं मिला तो उसकी जिंदगी खतरे में आ जाएगी।

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श्रुति की तरह देश में ऐसे कई बच्चे हैं जो दुर्लभ रोग एमपीएस से ग्रस्त हैं। आमतौर पर इलाज के अभाव में 10 से 15 साल तक ही यह बच्चे जीवित रह पाते हैं, लेकिन तब तक इनके उपचार में परिवार को सालाना दो करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। अगर शुरुआती दो साल में बीमारी पता चल जाए तो बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक विकल्प हो सकता है, लेकिन देरी से पता चले तो रोगी की जान का जोखिम भी बढ़ जाता है।
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सरकार ने इन मरीजों की आर्थिक मदद के लिए राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति 2021 लागू की है, जिसके तहत 50 लाख रुपये मिलने का प्रावधान है। हालांकि, दो साल बाद भी इस योजना का लाभ मरीजों को नहीं मिला है। 15 मई को दुनियाभर में इस बीमारी को लेकर विश्व एमपीएस जागरूकता दिवस मनाया जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो प्रसव पूर्व जांच के जरिये इस दुर्लभ रोग के दंश से बचा जा सकता है। गर्भावस्था की पहली तिमाही के बाद भ्रूण में इन बीमारियों का पता लगाना आसान होता है।
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बीमारी के पांच प्रकार
एमपीएस के पांच प्रकार हैं, जिनमें से चार प्रकार के मरीज भारत में हैं। एमपीएस I और एमपीएस II को क्रमश: हर्लर सिंड्रोम और हंटर सिंड्रोम कहा जाता है। इसके अलावा एमपीएस VI और एमपीएस V भी है। इन्हें लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (एलएसडी) कहते हैं, जिसमें मरीज के शरीर में ग्लाइकोसामिनोग्लाइकेन्स (जीएजी) नामक चीनी अणुओं की लंबी शृंखला को तोड़ने के लिए कुछ एंजाइम विकसित नहीं हो पाते हैं। जन्म लेने के कुछ समय बाद बच्चों में लक्षण दिखना शुरू हो जाते हैं।

बचाव के दो ही रास्ते
डॉक्टरों के अनुसार, एमपीएस से बचने के दो ही रास्ते हैं। पहला, प्रसव पूर्व जांच। दूसरा, पीड़ित बच्चे के जन्म लेने के दो साल के भीतर बोन मैरो ट्रांसप्लांट करवाना। इसमें करीब 20 लाख का खर्चा आता है।

अस्पतालों को दी राशि
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक,  दुर्लभ बीमारियों से ग्रस्त मरीजों के इलाज के लिए देश के 11 अस्पतालों को 40 करोड़ दिए गए हैं। अकेले दिल्ली एम्स को 10 करोड़ दिए हैं। अन्य 10 अस्पतालों को तीन-तीन करोड़ दिए गए। मंत्रालय का कहना है, एक से दो सप्ताह के दौरान इन अस्पतालों में मरीजों का उपचार शुरू होगा।

देश में 55 से ज्यादा बच्चे पंजीकृत
स्वास्थ्य मंत्रालय की क्राउड फंडिंग वेबसाइट के अनुसार, भारत में कुल 553 दुर्लभ मरीज हैं, जिनमें से एमपीएस I के 27, एमपीएस II के 28 और एमपीएस VI व एमपीएस V के चार मामले पंजीकृत हैं। सभी मरीज बच्चे हैं। इन बीमारियों को राष्ट्रीय नीति 2021 के समूह 3 (ए) के तहत वर्गीकृत किया गया है। इन दोनों बीमारियों के उपचार को देश में क्रमश: 2006 और 2014 में औषधि महानियंत्रक से मान्यता मिली।


पर्याप्त बजट नहीं, समाधान की जरूरत
दुर्लभ रोग इंडिया फाउंडेशन के निदेशक सौरभ सिंह का कहना है, मरीजों की संख्या और सालाना खर्च के आगे सरकार के 40 करोड़ काफी नहीं है। एक एमपीएस पीड़ित बच्चे के पिता सौरभ कहते हैं, मरीजों के लिए पर्याप्त बजट नहीं है, तो कोई समाधान निकालना चाहिए। सरकार को प्रसव पूर्व जांच के लिए जागरूकता अभियान चलाना चाहिए।

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