सॉलिड वेस्ट रिसाइक्लिंग: कचरे के संकट से मुक्ति के साथ खोल सकता है रोजगार के नए द्वार
टेरी की सीनियर फेलो डॉ. शिल्पी कपूर बख्शी ने बताया कि कचरा पूरी दुनिया के लिए बड़ी समस्या बन रहा है, लेकिन अगर इसी का उचित प्रबंधन किया जाए तो यह रोजगार और आर्थिक तरक्की की नई संभावनाएं पैदा कर सकता है...
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विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनिया में प्रति वर्ष 201 करोड़ टन से ज्यादा ठोस कचरा पैदा हो रहा है। इसका एक तिहाई बेहद खतरनाक तरीके से वातावरण में फेंका जा रहा है, जो आने वाले समय में वातावरण के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक ठोस कचरे का कुल उत्पादन बढ़कर 340 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जो दुनिया के लिए बड़ी समस्या बनकर उभर सकता है। लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों की राय है कि अगर इस ठोस कचरे को सही तरीके से निस्तारण की व्यवस्था की जाए तो यही कचरा एक नए विकसित उद्योग की जगह ले सकता है और यह रोजगार उपलब्ध कराने का एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
प्रति व्यक्ति ठोस कचरे का उत्पादन सबसे ज्यादा आर्थिक स्तर पर निर्भर करता है। गरीब वर्ग के लोग कम कचरा पैदा करते हैं, जबकि विकसित अर्थव्यवस्था में लोग प्रति व्यक्ति ज्यादा कचरा पैदा करते हैं। यह मात्रा 0.74 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से लेकर 4.54 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन तक अलग-अलग है।
टेरी की सीनियर फेलो डॉ. शिल्पी कपूर बख्शी ने अमर उजाला को बताया कि कचरा पूरी दुनिया के लिए बड़ी समस्या बन रहा है, लेकिन अगर इसी का उचित प्रबंधन किया जाए तो यह रोजगार और आर्थिक तरक्की की नई संभावनाएं पैदा कर सकता है। भारत जैसे देश में जहां पर्याप्त सस्ता श्रम उपलब्ध है, अगर हाई क्वॉलिटी तकनीक का उपयोग कर रीसाइक्लिंग के बाद अच्छी गुणवत्ता के उपयोगी पदार्थ बनाए जा सकें, तो यही कचरा हमारे लिए नई संभावनाएं खोल सकता है।
कचरे का शोधन
कचरे की रिसाइक्लिंग के मामले में जर्मनी सबसे बेहतर काम कर रहा है जो अपने देश में पैदा हुए कचरे का 56.1 फीसदी रिसाइकिल कर देता है। इसके बाद ऑस्ट्रिया 53.8 फीसदी, दक्षिण कोरिया 53.7 फीसदी, वेल्स 52.2 फीसदी और स्विटरलैंड 49.7 फीसदी रिसाइक्लिंग कर देता है। इस मामले में स्वीडन, नार्वे और सिंगापुर बहुत शानदार काम कर रहे हैं।
भारत में भी रिसाइक्लिंग धीरे-धीरे एक उद्योग का रूप लेता जा रहा है। देश में अंबिकापुर जैसे छोटे-छोटे स्थान भी रिसाइक्लिंग के मामले में बेहतरीन काम कर रहे हैं। इसी प्रकार अहमदाबाद और केरल का त्रिवेंद्रम और एलीपी भी अपने यहां के कुल कचरे का बड़ा भाग रिसाइकिल कर रहे हैं। लेकिन इस क्षेत्र को एक स्थाई उद्योग का स्वरूप देने के लिए बेहतर तकनीकी और आर्थिक मदद की आवश्यकता है।
इस समय रिसाइक्लिंग के बाद बन रहे उत्पाद लोगों को कम पसंद आते हैं। उनके टॉक्सिक होने की संभावना लोगों को रिसाइकिल्ड उत्पाद खरीदने से रोकती है, लेकिन अगर बेहतर तकनीक से इस तरह की समस्याओं को दूर किया जा सके तो यह बड़ा अवसर बन सकता है।
भवन निर्माण क्षेत्र में भारी कचरा पैदा होता है। पुराने भवन को तोड़ने के बाद निकलने वाली सामग्री आज दुनियाभर के शहरों के लिए बड़ी समस्या का कारण बन गई है। लेकिन आज कंपनियां इस कचरे के 75 फीसदी से ज्यादा को रिसाइकल कर रही हैं। इस कचरे से ईंटें, प्लास्टिक और कई अन्य सॉलिड पदार्थ बनाए जा रहे हैं।
चार R का मंत्र
कचरा उत्पादन में प्लास्टिक कचरा एक बड़ी समस्या है। इस कचरे का कम से कम उत्पादन ही दुनिया को कचरे से मुक्ति दिलाने में मदद कर सकता है। इस संदर्भ में विशेषज्ञ 4R का सिद्धांत अपनाने की बात करते हैं। इसमें पहले R का अर्थ Refuse यानी प्लास्टिक पदार्थों के उपयोग से इनकार करना, दूसरे R का अर्थ Reduce यानी प्लास्टिक पदार्थों का कम से कम उपयोग करना, तीसरे R का अर्थ Reuse यानी नए की बजाय पुराने प्लास्टिक पदार्थों का उपयोग करना, और अंत में Recycle यानी पुराने प्लास्टिक पदार्थों को रिसाइकिल कर दोबारा उपयोग करना है।