कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर की कार्यशैली ने सरकार को मुश्किल में डाला, संघ नेता भी नाराज
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की कार्यशैली ने सरकार को मुश्किलों में डाल दिया है। किसान कानूनों पर सरकार एक ऐसी स्थिति में फंस गई है जहां से वह पूरी तरह रोल बैक करती हुई नहीं दिखना चाहती है क्योंकि इससे सरकार की छवि पर नकारात्मक असर पड़ेगा। वहीं, किसान नेता इससे कम कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं जिससे वार्ता की राह आगे बढ़ती हुई नहीं दिख रही है। 14 दिन के आंदोलन और पांच-छह दौर की वार्ता के बाद मामला आज भी वहीं खड़ा दिख रहा है जहां से इसकी शुरूआत हुई थी। सरकार को इस स्थिति में डालने के लिए कृषि मंत्री तोमर की उस कार्यशैली को जिम्मेदार माना जा रहा है जिसमें उन्होंने इतना महत्वपूर्ण कदम उठाने से पहले किसी को भरोसे में नहीं लिया। किसान संगठनों, विपक्ष के नेताओं के साथ-साथ उन्होंने संघ नेताओं की भी प्रमुख सलाह को भी नजरअंदाज कर दिया।
आरएसएस के एक शीर्ष नेता के मुताबिक, जब इस कानून को लाए जाने की भूमिका तैयार की जा रही थी, उसी समय भारतीय किसान संघ ने सरकार की नीतियों पर आपत्ति जताई थी। भारतीय किसान संघ हर हाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य को एक कानूनी अधिकार बनाए जाने की वकालत कर रहा था। इसके लिए संघ के कुछ शीर्ष नेताओं की भी राय ली गई थी। इन नेताओं की राय थी कि देश के किसान को आर्थिक मजबूती दिए बिना देश का संपूर्ण विकास करना संभव नहीं है। लेकिन बताया जाता है कि इस कानून के कारण देश पर पड़ने वाले भारी आर्थिक बोझ की आशंका से केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस प्रस्ताव को अस्वीकर कर दिया।
नेता के मुताबिक मंत्री ने इस प्रस्ताव को शीर्ष अधिकारियों की सलाह पर खारिज कर दिया जबकि इस मॉडल को लागू करने पर खर्च प्राइवेट सेक्टर को उठाना पड़ता। लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रस्ताव न स्वीकार कर कृषि मंत्री ने किसानों की नाराजगी मोल ले ली। संघ के नेताओं का यहां तक मानना है कि अगर एमएसपी का कानून किसानों को दे दिया गया होता तो किसान उससे पूर्ण संतुष्ट हो जाता और यह आंदोलन ही खड़ा नहीं होता।
किसान न्यायालयों की बात भी नकारी
आरएसएस के कृषि विशेषज्ञों की लंबे समय से यह राय रही है कि देश में किसानों को न्याय नहीं मिल पाता। इसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती है। इससे किसानों को पूर्ण छुटकारा पाने के लिए संघ ने देश के हर जिले में किसान न्यायालयों को बनाए जाने का मॉडल पेश किया था।
इस कानून को पेश किए जाने के पहले भी इसे कृषि कानूनों में शामिल किए जाने का सुझाव दिया गया था। लेकिन नए किसान कोर्ट बनाने पर आने वाले खर्चों की आशंका से केंद्र सरकार ने यह प्रस्ताव भी इनकार कर दिया। जबकि नए किसान कानूनों को पास करने के बाद किसान इसे एक बड़ा मुद्दा बना चुके हैं। किसानों को लगता है कि कांट्रैक्ट फार्मिंग में अगर उन्हें सामान्य अदालतों में जाने का अधिकार नहीं दिया गया तो इससे उनका नुकसान हो सकता है।
आखिर बातचीत में पेंच फंसने के बाद अब केंद सरकार उन्हें सामान्य अदालतों में जाने का विकल्प दे रही है (किसानों ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है)। कुछ विशेषज्ञ अदालतों की जगह किसान ट्रिब्यूनल बनाने की वकालत भी कर रहे हैं जो बेहद कम खर्चीला और त्वरित होता है। इसके पास दंडात्मक अधिकार भी होते हैं।
अधिकारियों के बीच फंसे मंत्री
नरेंद्र सिंह तोमर के बारे में यह धारणा आम हो चली है कि अधिकारियों के चक्कर में उन्होंने किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों की सलाह की उपेक्षा की। इतना ही नहीं, उन्होंने विपक्ष के कृषि में विशेष रुचि रखने वाले नेताओं से भी बातचीत की कोशिश नहीं की। अगर सरकार कानून का मॉडल तैयार करते समय कुछ संगठनों, विपक्ष के कुछ नेताओं से बातचीत का रास्ता अपनाती तो आज यह स्थिति न बनती। यही कारण है कि अब ऐसी स्थिति बन गई है जिससे निकलने की राह सरकार को नहीं सूझ रहा है।