{"_id":"61cd895f5b593c44450db166","slug":"woman-can-not-be-forced-to-cohabit-with-husband-even-by-court-decree-gujarat-hc","type":"story","status":"publish","title_hn":"मुस्लिम बहुविवाह पर बड़ा फैसला: कोर्ट के आदेश पर महिला को पति के साथ सहवास के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
मुस्लिम बहुविवाह पर बड़ा फैसला: कोर्ट के आदेश पर महिला को पति के साथ सहवास के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
Thu, 30 Dec 2021 03:56 PM IST
सुरेंद्र जोशी
पीटीआई, अहमदाबाद
पीटीआई, अहमदाबाद
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Thu, 30 Dec 2021 03:56 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पहली पत्नी अपने पति के साथ रहने से इनकार कर सकती है, भले ही मुस्लिम लॉ में पति को एक से ज्यादा पत्नियां रखने की इजाजत है। कोर्ट ने कहा कि बहुविवाह को कभी प्रोत्साहित नहीं किया गया है।
विज्ञापन
गुजरात हाईकोर्ट
- फोटो : social media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
गुजरात हाईकोर्ट ने गुरुवार को मुस्लिम बहुविवाह प्रथा से जुड़े एक अहम फैसले में कहा कि किसी महिला को कोर्ट के आदेश पर उसके पति के साथ सहवास के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। पति के वैवाहिक अधिकार कायम रखने के लिए महिला को बाध्य नहीं किया जा सकता। इस व्यवस्था के साथ ही हाईकोर्ट ने बनासकांठा के परिवार न्यायालय का आदेश पलट दिया।
विज्ञापन
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पहली पत्नी अपने पति के साथ रहने से इनकार कर सकती है, भले ही मुस्लिम लॉ में पति को एक से ज्यादा पत्नियां रखने की इजाजत है। कोर्ट ने कहा कि बहुविवाह को कभी प्रोत्साहित नहीं किया गया है।
विज्ञापन
भारत में मुस्लिम लॉ का मजबूरन पालन
अपने हालिया आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'भारत में मुस्लिम लॉ मानने को मजबूर किया गया है और उसमें बहुविवाह को एक संस्था के रूप में बर्दाश्त करने की बात है, लेकिन यह पति को कोई मौलिक अधिकार नहीं है कि वह अपनी पत्नी को किसी भी परिस्थिति में अन्य महिला के साथ रहने को मजबूर कर सके।'
विज्ञापन
गुजरात हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के हालिया आदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) को संविधान में मात्र एक आशा के रूप में नहीं रखा गया है। गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस निराल मेहता की पीठ ने कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के मामले में पूरी तरह पति के अधिकारों के अनुसार ही फैसला नहीं हो सकता। परिवार न्यायालय को भी यह विचार करना चाहिए कि पत्नी को पति के साथ रहने के लिए मजबूर करना अन्याय नहीं होगा।
बनासकांठा की फैमिली कोर्ट का आदेश खारिज
इन टिप्पणियों के साथ ही गुजरात हाईकोर्ट ने बनासकांठा जिले के एक परिवार न्यायालय के जुलाई 2021 के फैसले के खिलाफ एक महिला द्वारा अपील को मंजूर कर लिया। परिवार न्यायालय ने महिला को आदेश दिया था कि वह ससुराल जाए और अपने वैवाहिक दायित्व का पालन करे। हाईकोर्ट ने इस फैसले को खारिज कर दिया।
महिला को पसंद नहीं था बहुविवाह
इस दंपती का निकाह 25 मई 2010 को बनासकांठा के पालनपुर में हुआ था। जुलाई 2015 में उन्हें एक बेटा हुआ। याचिका के अनुसार महिला एक नर्स है, जो सरकारी अस्पताल में काम करती है। वह जुलाई 2017 में अपने बेटे को लेकर ससुराल से अलग हो गई थी। इसके बाद ससुराल वालों ने उसे प्रताड़ित किया, इस कारण वह आस्ट्रेलिया चली गई और वहां नौकरी करने लगी। महिला ने अपनी याचिका में कहा कि वह बहुविवाह के विचार के खिलाफ थी, इसलिए उसने अपने बेटे के साथ ससुराल छोड़ दिया था।
वैवाहिक अधिकार बहाली के कोर्ट बाध्य नहीं कर सकती
हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश XXI नियम 32(1) और (3) का जिक्र करते हुए कहा कि 'कोई भी व्यक्ति किसी महिला या उसकी पत्नी को सहवास करने और वैवाहिक अधिकार स्थापित करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है। यदि पत्नी सहवास करने से इनकार करती है, तो इस तरह के मामले में, उसे ऐसे अधिकारों को बहाल करने के लिए कोर्ट के आदेश से मजबूर नहीं किया जा सकता है।'
पति ने यह दलील दी थी
पति का कहना था कि उसकी पत्नी ने बगैर किसी कानूनी आधार के घर छोड़ा था। जब उसे समझा बुझाकर वापस लाने के प्रयास विफल हुए तो वह परिवार अदालत गया। इस अदालत ने पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए महिला को पति के वैवाहिक अधिकार बहाल करने का आदेश दिया था।