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ANALYSIS : क्या अखिलेश जाइंट किलर साबित होंगे ?
सुदीप ठाकुर
Updated Mon, 06 Mar 2017 02:19 PM IST
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अखिलेश और राहुल
- फोटो : अमर उजाला
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के सात चरणों की लंबी प्रक्रिया के कारण अब तो लोग शायद भूल भी गए होंगे कि पंजाब, उत्तराखंड और गोवा में मतदान हो भी चुके हैं। सातवें चरण के आते-आते पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का सारा फोकस उत्तर प्रदेश पर केंद्रित हो गया है। बेशक, उत्तर प्रदेश के साथ ही मणिपुर के दो चरणों का मतदान भी हो रहा है, लेकिन देश का राजनीतिक विमर्श इस समय सिर्फ देश के सबसे बड़े सूबे पर आकर ठहर गया है।
प्रचार के इतने लंबे अभियान को खींचना कोई मामूली बात नहीं है। पहले आम चुनाव के समय लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए गए थे और पूरी प्रक्रिया 25 अक्टूबर 1951 से लेकर 27 मार्च, 1952 तक करीब पांच महीने तक चली थी। बेशक उसकी तुलना में इन पांच राज्यों के चुनाव में दो महीने यानी करीब आधे से कम वक्त लग रहा है। मगर इस चौबीस घंटे के खबरिया चैनल और ऑनलाइन मीडिया कवरेज के दौर में हर जगह सिर्फ चुनाव ही नजर आता है।
मगर ये चुनाव इसलिए याद नहीं रखे जाएंगे कि ये दो महीने तक चले, बल्कि इसके लिए याद रखे जाएंगे कि यही ऐसा चुनाव थे,जिसमें एक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच सीधा मुकाबला हुआ!
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खासतौर से उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को जिस तरह से खुद की और अपनी सरकार की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया है, ऐसा कोई और उदाहरण भारतीय चुनावी राजनीति में नजर नहीं आता। मोदी के लिए ये चुनाव क्या मायने रखते हैं, यह उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हुए सात किलोमीटर लंबे रोड-शो से समझा जा सकता है, जिसमें वह फूलों से लदे खुले वाहन में अकेले खड़े होकर लोगों का अभिवादन कर रहे थे। उनके साथ भाजपा का कोई दूसरा नेता या मंत्री तक खड़ा नहीं था, जबकि करीब दो दर्जन केंद्रीय मंत्री और भाजपा के तमाम पदाधिकारी दल बल के साथ वाराणसी में ही मौजूद हैं।
कहने की जरूरत नहीं है, कि रणनीति बेशक भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बनाई हो, लेकिन मोदी न सिर्फ भाजपा का चेहरा हैं, बल्कि ऐसा लग रहा है, मानो सूबे की चार सौ तीन सीटों पर भाजपा और सहयोगी दलों की ओर से वही चुनाव लड़ रहे हों।
मई, 2014 के लोकसभा चुनाव की मोदी लहर के बाद से विपक्ष के नेता की जगह आम तौर पर खाली पड़ी हुई है। चाहें, तो विपक्ष के तमाम नेता मोदी से एक सबक तो ले ही सकते हैं, कि प्रतिद्वंद्वी चाहे कितना भी युवा क्यों न हो उसे कमजोर न समझो।
मोदी ने पूरे चुनाव अभियान के दौरान यह साबित कर दिया है कि इस चुनाव में उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी उनसे उम्र में कम से कम बीस वर्ष छोटे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही हैं! मोदी ने सूबे में दो दर्जन से अधिक सभाएं की हैं, और आखिर के चरण आते-आते उन्होंने सीधा निशाना अखिलेश और उनकी सरकार पर साधा है। वह अखिलेश का नाम लेकर उन पर सीधे हमले करते हैं।
मोदी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर भी कटाक्ष किए हैं, लेकिन भाजपा की यह रणनीति का हिस्सा है कि वह राहुल को मसखरा साबित करना चाहते हैं। इस हद तक कि प्रधानमंत्री पद पर बैठे मोदी तक राहुल पर लतीफे गढ़ने से गुरेज नहीं करते। दूसरी ओर बसपा सुप्रीमो मायावती पर उनकी टिप्पणियां बहुत संयत हैं। उन्होंने मायावती पर सीधे हमले कम ही किए हैं। वैसे मायावती पर हमले का जिम्मा उन्होंने भाजपा के दूसरे नेताओं पर छोड़ दिया है।
कुल मिलाकर खुद मोदी अखिलेश को ही अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान रहे हैं, इसलिए यह चुनाव प्रधानमंत्री बनाम मुख्यमंत्री भी हो गया है। दूसरी ओर अखिलेश की स्थिति ऐसी है कि सिर्फ मुख्यमंत्री होने नाते ही नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के घरेलू झगड़े के बाद वही पार्टी का एकमात्र चेहरा रह गए हैं। ऐन आखिर तक सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, उनके छोटे भाई शिवपाल यहां तक कि बेशर्मी के साथ सपा की राज्यसभा सदस्यता पर अब तक काबिज पार्टी से निकाले जा चुके अमर सिंह तक अखिलेश पर सीधा हमले करने से नहीं चूके हैं।
अखिलेश ने अपने पिता की राय के विपरीत जाकर कांग्रेस से गठबंधन तो किया ही, राहुल गांधी के साथ उन्होंने संयुक्त सभाएं और रोड शो भी किए हैं। लेकिन इस गठबंधन के वही सबसे बड़े नेता हैं। अखिलेश भी यह जानते हैं कि इस विधानसभा चुनाव में उनका सीधा मुकाबला प्रधानमंत्री मोदी से है।
जाने-माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई के बाद एक और बड़े पत्रकार और अर्थशास्त्री स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर ने रविवार के अपने कॉलम में राय जताई है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव मोदी जीत रहे हैं। सरदेसाई और अंकलेसरिया दोनों का ही मानना है कि मोदी लहर की एक तरह से वापसी हुई है और नोटबंदी का कोई असर चुनाव में नहीं हुआ है, बल्कि एक तरह से इस पर सूबे के मतदाताओं की मुहर लग रही है।
भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत तौर पर ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब किसी दिग्गज को अपेक्षाकृत कम अनुभवी और युवा नेता ने चुनाव में पराजित कर दिया। मैं यहां ऐसे तीन चुनावों का जिक्र कर रहा हूं, जिसने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है। पहला, 1967 के लोकसभा चुनाव की बात है, जब दक्षिण मुंबई सीट से युवा श्रमिक नेता 37 वर्षीय जॉर्ज फर्नांडीज ने कांग्रेस के दिग्गज एस के दादा पाटिल को पराजित किया था। दूसरा उदाहरण 1977 का है, जब समाजवादी नेता राजनारायण ने रायबरेली में इंदिरा गांधी को पराजित किया और तीसरा अभी 2013 में दिल्ली में आप नेता अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को विधानसभा चुनाव में पराजित किया था। जॉर्ज, राजनारायण और केजरीवाल तीनों को 'जाइंट किलर' कहा गया।
अखिलेश और मोदी किसी सीट पर आमने-सामने नही हैं, मगर उत्तर प्रदेश के चुनाव में दोनों आमने-सामने हैं; इस डिस्क्लेमर के साथ, जैसा कि कुछेक विशेषज्ञों की राय है कि बसपा सुप्रीमो मायावती इस चुनाव की बाजी पलट सकती हैं, यह चुनाव मोदी बनाम अखिलेश अधिक लग रहा है।
क्या अखिलेश मोदी को रोक पाएंगे? यदि भाजपा वहां आसानी से बहुमत हासिल कर लेती है, तो यह कोई बड़ी बात नहीं होगी, क्योंकि तब यही कहा जाएगा कि मोदी और उनका जादू बरकरार है और तब जैसा कि सरदेसाई और अंकलेसरिया ने कहा है कि 2019 में भी भाजपा को कोई नहीं रोक पाएगा। पर यदि गठबंधन बहुमत के करीब भी पहुंच जाता है, तो यह मोदी की प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ी पराजय साबित होगी, बिहार से भी बड़ी।
यह देखने के लिए क्या अखिलेश 'जाइंट किलर' साबित होंगे, 11 मार्च तक इंतजार कीजिए।
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प्रचार के इतने लंबे अभियान को खींचना कोई मामूली बात नहीं है। पहले आम चुनाव के समय लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए गए थे और पूरी प्रक्रिया 25 अक्टूबर 1951 से लेकर 27 मार्च, 1952 तक करीब पांच महीने तक चली थी। बेशक उसकी तुलना में इन पांच राज्यों के चुनाव में दो महीने यानी करीब आधे से कम वक्त लग रहा है। मगर इस चौबीस घंटे के खबरिया चैनल और ऑनलाइन मीडिया कवरेज के दौर में हर जगह सिर्फ चुनाव ही नजर आता है।
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मगर ये चुनाव इसलिए याद नहीं रखे जाएंगे कि ये दो महीने तक चले, बल्कि इसके लिए याद रखे जाएंगे कि यही ऐसा चुनाव थे,जिसमें एक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच सीधा मुकाबला हुआ!
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खासतौर से उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को जिस तरह से खुद की और अपनी सरकार की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया है, ऐसा कोई और उदाहरण भारतीय चुनावी राजनीति में नजर नहीं आता। मोदी के लिए ये चुनाव क्या मायने रखते हैं, यह उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हुए सात किलोमीटर लंबे रोड-शो से समझा जा सकता है, जिसमें वह फूलों से लदे खुले वाहन में अकेले खड़े होकर लोगों का अभिवादन कर रहे थे। उनके साथ भाजपा का कोई दूसरा नेता या मंत्री तक खड़ा नहीं था, जबकि करीब दो दर्जन केंद्रीय मंत्री और भाजपा के तमाम पदाधिकारी दल बल के साथ वाराणसी में ही मौजूद हैं।
कहने की जरूरत नहीं है, कि रणनीति बेशक भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बनाई हो, लेकिन मोदी न सिर्फ भाजपा का चेहरा हैं, बल्कि ऐसा लग रहा है, मानो सूबे की चार सौ तीन सीटों पर भाजपा और सहयोगी दलों की ओर से वही चुनाव लड़ रहे हों।
मई, 2014 के लोकसभा चुनाव की मोदी लहर के बाद से विपक्ष के नेता की जगह आम तौर पर खाली पड़ी हुई है। चाहें, तो विपक्ष के तमाम नेता मोदी से एक सबक तो ले ही सकते हैं, कि प्रतिद्वंद्वी चाहे कितना भी युवा क्यों न हो उसे कमजोर न समझो।
मोदी ने पूरे चुनाव अभियान के दौरान यह साबित कर दिया है कि इस चुनाव में उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी उनसे उम्र में कम से कम बीस वर्ष छोटे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही हैं! मोदी ने सूबे में दो दर्जन से अधिक सभाएं की हैं, और आखिर के चरण आते-आते उन्होंने सीधा निशाना अखिलेश और उनकी सरकार पर साधा है। वह अखिलेश का नाम लेकर उन पर सीधे हमले करते हैं।
मोदी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर भी कटाक्ष किए हैं, लेकिन भाजपा की यह रणनीति का हिस्सा है कि वह राहुल को मसखरा साबित करना चाहते हैं। इस हद तक कि प्रधानमंत्री पद पर बैठे मोदी तक राहुल पर लतीफे गढ़ने से गुरेज नहीं करते। दूसरी ओर बसपा सुप्रीमो मायावती पर उनकी टिप्पणियां बहुत संयत हैं। उन्होंने मायावती पर सीधे हमले कम ही किए हैं। वैसे मायावती पर हमले का जिम्मा उन्होंने भाजपा के दूसरे नेताओं पर छोड़ दिया है।
कुल मिलाकर खुद मोदी अखिलेश को ही अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान रहे हैं, इसलिए यह चुनाव प्रधानमंत्री बनाम मुख्यमंत्री भी हो गया है। दूसरी ओर अखिलेश की स्थिति ऐसी है कि सिर्फ मुख्यमंत्री होने नाते ही नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के घरेलू झगड़े के बाद वही पार्टी का एकमात्र चेहरा रह गए हैं। ऐन आखिर तक सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, उनके छोटे भाई शिवपाल यहां तक कि बेशर्मी के साथ सपा की राज्यसभा सदस्यता पर अब तक काबिज पार्टी से निकाले जा चुके अमर सिंह तक अखिलेश पर सीधा हमले करने से नहीं चूके हैं।
अखिलेश ने अपने पिता की राय के विपरीत जाकर कांग्रेस से गठबंधन तो किया ही, राहुल गांधी के साथ उन्होंने संयुक्त सभाएं और रोड शो भी किए हैं। लेकिन इस गठबंधन के वही सबसे बड़े नेता हैं। अखिलेश भी यह जानते हैं कि इस विधानसभा चुनाव में उनका सीधा मुकाबला प्रधानमंत्री मोदी से है।
जाने-माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई के बाद एक और बड़े पत्रकार और अर्थशास्त्री स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर ने रविवार के अपने कॉलम में राय जताई है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव मोदी जीत रहे हैं। सरदेसाई और अंकलेसरिया दोनों का ही मानना है कि मोदी लहर की एक तरह से वापसी हुई है और नोटबंदी का कोई असर चुनाव में नहीं हुआ है, बल्कि एक तरह से इस पर सूबे के मतदाताओं की मुहर लग रही है।
भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत तौर पर ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब किसी दिग्गज को अपेक्षाकृत कम अनुभवी और युवा नेता ने चुनाव में पराजित कर दिया। मैं यहां ऐसे तीन चुनावों का जिक्र कर रहा हूं, जिसने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है। पहला, 1967 के लोकसभा चुनाव की बात है, जब दक्षिण मुंबई सीट से युवा श्रमिक नेता 37 वर्षीय जॉर्ज फर्नांडीज ने कांग्रेस के दिग्गज एस के दादा पाटिल को पराजित किया था। दूसरा उदाहरण 1977 का है, जब समाजवादी नेता राजनारायण ने रायबरेली में इंदिरा गांधी को पराजित किया और तीसरा अभी 2013 में दिल्ली में आप नेता अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को विधानसभा चुनाव में पराजित किया था। जॉर्ज, राजनारायण और केजरीवाल तीनों को 'जाइंट किलर' कहा गया।
अखिलेश और मोदी किसी सीट पर आमने-सामने नही हैं, मगर उत्तर प्रदेश के चुनाव में दोनों आमने-सामने हैं; इस डिस्क्लेमर के साथ, जैसा कि कुछेक विशेषज्ञों की राय है कि बसपा सुप्रीमो मायावती इस चुनाव की बाजी पलट सकती हैं, यह चुनाव मोदी बनाम अखिलेश अधिक लग रहा है।
क्या अखिलेश मोदी को रोक पाएंगे? यदि भाजपा वहां आसानी से बहुमत हासिल कर लेती है, तो यह कोई बड़ी बात नहीं होगी, क्योंकि तब यही कहा जाएगा कि मोदी और उनका जादू बरकरार है और तब जैसा कि सरदेसाई और अंकलेसरिया ने कहा है कि 2019 में भी भाजपा को कोई नहीं रोक पाएगा। पर यदि गठबंधन बहुमत के करीब भी पहुंच जाता है, तो यह मोदी की प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ी पराजय साबित होगी, बिहार से भी बड़ी।
यह देखने के लिए क्या अखिलेश 'जाइंट किलर' साबित होंगे, 11 मार्च तक इंतजार कीजिए।