पर्यावरण प्रभाव आकलन के ड्राफ्ट पर क्यों मचा हंगामा, नई नीति से क्यों चिंता में हैं विशेषज्ञ
- पर्यावरण क्लियरेंस के नाम पर प्रोजेक्ट्स में होने वाली देरी को टालना चाहती है सरकार,
- लेकिन विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस कदम से जैव विविधता को हो सकता है गंभीर संकट
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पर्यावरण प्रभाव आकलन, 2020 पर जनता की राय लेने के लिए 10 अगस्त अंतिम दिन है। इसे देखते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रस्तावित पर्यावरण ड्राफ्ट का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने इसे राष्ट्र की लूट (लूट ऑफ द नेशन) करार दिया और कहा कि कुछ विशेष उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए पर्यावरणीय नियमों में छूट दी जा रही है।
वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि ड्राफ्ट में अनेक ऐसी छूट दी जा रही हैं, जिससे आने वाले समय में पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचेगा। इस नीति के कारण देश की जैव विविधता को भारी नुकसान हो सकता है और आदिवासी गरीबों के के सामने अस्तित्व का गंभीर संकट पैदा हो सकता है।
किस तरह होगा नुकसान
प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने अमर उजाला को बताया कि 1972 में स्टॉक होम समझौते में पर्यावरण बचाने के मसौदे पर हस्ताक्षर कर भारत ने इसके प्रति अपनी गंभीरता जाहिर की। इस समझौते के आलोक में 1974 में जल और 1981 में वायु से संबंधित कानून बनाए गए। 1984 के भोपाल गैस त्रासदी के बाद एक समुचित पर्यावरण नीति की आवश्यकता महसूस की गई, जिसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के जरिए पूरा किया गया। इस अधिनियम में वर्णित संदर्भों के आलोक में ही 1994 में कुछ विशेष मानदंड बनाए गए और बाद में इनमें संशोधन भी किए गए।
इन नियमों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी प्रोजेक्ट को शुरू करने के पहले उसके कारण स्थानीय लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करना अनिवार्य कर दिया गया। इसके लिए विशेषज्ञों और पर्यावरण वैज्ञानिकों की एक कमेटी से राय ली जाती थी।
इस कमेटी की अनुशंसा पर ही किसी परियोजना को पर्यावरण मंत्रालय से ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) मिलता था। इस प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की राय को भी सुना जाता था।
ये होगा बड़ा बदलाव
लेकिन नई पर्यावरण नीति में किसी भी प्रोजेक्ट को शुरू करने के पहले इस तरह की किसी कमेटी से आकलन करने का प्रावधान हटाया जा सकता है। नई नीति में इस तरह के नुकसान का आकलन योजना के शुरू होने के बाद ‘किया जाता रहेगा’।
इसके पीछे सरकार की मंशा यह है कि सिर्फ पर्यावरण से क्लियरेंस के नाम पर किसी विकास योजना को रोका न जा सके। योजना चलते रहने के साथ ही इसके प्रभाव का भी आकलन कर लिया जाए और संभावित समस्या का निदान कर दिया जाए।
मेधा पाटकर का कहना है कि इस तरह के कानून का दुरुपयोग हो सकता है। प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद कोई बड़ा नुकसान होने पर भी इसे रोकना असंभव हो जाएगा। इसके साथ ही पर्यावरण के हो चुके नुकसान की कभी भरपाई नहीं हो सकेगी। उनका कहना है कि, इसलिए किसी प्रोजेक्ट के शुरू करने के पहले उसके कारण होने वाले पर्यावरणीय नुकसान का आकलन किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई बार विषय के विशेषज्ञ भी किसी पर्यावरणीय नुकसान को सही तरीके से नहीं समझ पाते हैं, जबकि उसी जगह पर रहने वाले स्थानीय लोग, आदिवासी जातियां अपने हजारों सालों के अनुभव से नुकसान को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ पाती हैं। पहले इनकी राय आवश्यक रूप से ली जाती थी, लेकिन बदले मसौदे में इनकी राय लेने की भी जरूरत नहीं समझी जा रही है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण को होने वाले नुकसान ज्यादातर मामलों में एक तरफा या अपूरणीय होते हैं। यानी एक बार नुकसान हो जाने के बाद उनकी कभी क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती। ऐसे में इनका आकलन योजना शुरू करने के पहले ही होना चाहिए, जबकि सरकार विकास के नाम पर इस प्रक्रिया को ही समाप्त कर देना चाहती है।
जैव विविधता को अपूरणीय क्षति संभव
नई नीति में देश की सीमा रेखा के नजदीक होने वाले किसी निर्माण कार्य (जैसे सड़क निर्माण इत्यादि) के लिए पर्यावरण अनुमति लेने से छूट दी जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक इसके पीछे सरकार का तर्क है कि अकसर सीमा क्षेत्र में होने वाले महत्वपूर्ण निर्माण कार्यक्रम को पर्यावरण के नुकसान के बहाने दुश्मन देश की तरफ से साजिशें कर रुकवाने की कोशिश की जाती है। अब बदले मसौदे के कारण इस तरह के प्रोजेक्ट को ऐसी कोई अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी।
लेकिन विशेषज्ञों की चिंता है कि देश की सीमा रेखा ज्यादातर पहाड़ी और वन क्षेत्र के आसपास से होकर गुजरती है। उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर जैसे राज्य विशेष प्राकृतिक विविधता वाले हैं। इन क्षेत्रों में अगर खुली छूट दे दी गई, तो इससे पर्यावरण और जैव विविधता को भारी नुकसान हो सकता है।
जल संसाधन को भारी नुकसान संभव
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी वाराणसी से पश्चिम बंगाल तक गंगा के जरिए जलमार्ग को चालू करने को अपने एक ड्रीम प्रोजेक्ट के तौर पर देखते हैं। वे इसे पूरा करने के लिए जोर-शोर से लगे हुए हैं। लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों को चिंता है कि इस तरह के प्रोजेक्ट से गंगा नदी में पाई जाने वाली जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।
नई नीति में नदियों को चौड़ा करने, जलमार्ग को बढ़ावा देने वाले प्रोजेक्ट्स को भी पर्यावरण क्लियरेंस लेने से छूट मिल सकती है। पर्यावरण विशेषज्ञों को चिंता है कि इससे गंगा के आसपास रहने वाले इलाकों के लोगों की जिंदगी प्रभावित हो सकती है, डॉल्फिन जैसी मछलियों के अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा हो सकता है। इसलिए इस तरह के प्रोजेक्ट्स को अनुमति मिलने से पहले पर्याप्त शोध कर लेना चाहिए।
नई नीति (The Draft of Environment Impact Assessment, EIA, 2020) पर चर्चा के लिए सरकार ने इसे मार्च में जारी किया था। इसके लिए एक समय सीमा दी गई थी, लेकिन कोरोना के कारण देरी होने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे 10 अगस्त तक के लिए बढ़ाने का निर्देश दिया था।