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'ट्रंप की बैन लिस्ट में लादेन का देश सऊदी अरब क्यों नहीं?'
तारिक अता/ बीबीसी मॉनिटरिंग
Updated Mon, 30 Jan 2017 03:31 PM IST
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ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह ख़मेनेई
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ईरान की राजधानी तेहरान में अधिकारियों और देश की मीडिया ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के नए एक्जीक्यूटिव ऑर्डर पर हैरानी और दुख जताया है। ट्रंप ने शनिवार को ईरान समेत सात अन्य देशों के नागरिकों को अमरीका में आने के लिए रोकने के लिए एक्जीक्यूटिव ऑर्डर पर दस्तखत किए थे।
ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी ने इस आदेश की आलोचना करते हुए कहा है कि "ये वक्त देशों के बीच दीवारें बनाने का नहीं है"। वो ट्रंप की एक अन्य विवादित योजना की ओर इशारा कर रहे थे, जिसके तहत अमरीका और मेक्सिको के बीच दीवार बनाई जानी है। उन्होंने कहा, "वो भूल गए हैं कि बर्लिन की दीवार सालों पहले टूट गई थी.... आज हमें जरूरत हैं शांति से साथ में रहने की, न कि देशों के बीच दूरियां बनाने की।"
ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद जरीफ ने कई ट्वीट कर ट्रंप के इस आदेश की आलोचना की। उन्होंने रविवार सवेरे किए इन ट्वीट में #MuslimBan हैशटैग का इस्तेमाल किया। उन्होंने लिखा, "मुसलमानों पर लगे इस बैन को इतिहास में कट्टरपंथियों और उनके समर्थकों के लिए एक बड़े उपहार के रूप में याद किया जाएगा।"
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एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, "सभी को एक ही तराजू में तौलने और भेदभाव करने से चरमपंथी समूहों के नेताओं को इन कमजोरियों का फायदा उठाने का मौका मिलेगा। हम अमरीकी नागरिकों का सम्मान करते हैं। अमरीकियों और अमरीकी की शत्रुतापूर्ण नीतियों के बीच अंतर रखते हुए ईरान भी अपने नागरिकों को बचाने के लिए कदम उठाएगा।"
ईरान की संसद, मजलिस के स्पीकर अली लाजिरानी ने इस आदेश को "डर की निशानी" बताया। मजलिस में नेताओं के संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "इस कदम ने हमें बताया है कि अमरीका कितना डरा हुआ है.... इस आदेश ने गणतंत्र और मानवाधिकार के चोगे के नीचे छिपे अमरीका के हिंसक नस्लभेदी व्यवहार को दुनिया के सामने रख दिया है।"
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ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी ने इस आदेश की आलोचना करते हुए कहा है कि "ये वक्त देशों के बीच दीवारें बनाने का नहीं है"। वो ट्रंप की एक अन्य विवादित योजना की ओर इशारा कर रहे थे, जिसके तहत अमरीका और मेक्सिको के बीच दीवार बनाई जानी है। उन्होंने कहा, "वो भूल गए हैं कि बर्लिन की दीवार सालों पहले टूट गई थी.... आज हमें जरूरत हैं शांति से साथ में रहने की, न कि देशों के बीच दूरियां बनाने की।"
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ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद जरीफ ने कई ट्वीट कर ट्रंप के इस आदेश की आलोचना की। उन्होंने रविवार सवेरे किए इन ट्वीट में #MuslimBan हैशटैग का इस्तेमाल किया। उन्होंने लिखा, "मुसलमानों पर लगे इस बैन को इतिहास में कट्टरपंथियों और उनके समर्थकों के लिए एक बड़े उपहार के रूप में याद किया जाएगा।"
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एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, "सभी को एक ही तराजू में तौलने और भेदभाव करने से चरमपंथी समूहों के नेताओं को इन कमजोरियों का फायदा उठाने का मौका मिलेगा। हम अमरीकी नागरिकों का सम्मान करते हैं। अमरीकियों और अमरीकी की शत्रुतापूर्ण नीतियों के बीच अंतर रखते हुए ईरान भी अपने नागरिकों को बचाने के लिए कदम उठाएगा।"
ईरान की संसद, मजलिस के स्पीकर अली लाजिरानी ने इस आदेश को "डर की निशानी" बताया। मजलिस में नेताओं के संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "इस कदम ने हमें बताया है कि अमरीका कितना डरा हुआ है.... इस आदेश ने गणतंत्र और मानवाधिकार के चोगे के नीचे छिपे अमरीका के हिंसक नस्लभेदी व्यवहार को दुनिया के सामने रख दिया है।"
ईरानी अखबारों ने भी निकाला गुस्सा
डोनाल्ड ट्रंप
अखबारों ने भी निकाला गुस्सा
ईरान के अखबारों ने भी ट्रंप के आदेश पर जमकर गुस्सा निकाला और कई ने इसे नस्लभेदी कदम बताया। 'जावन' अखबार के पहले पन्ने पर बड़े हलफों में लिखा गया, "एक नस्लभेदी आदेश"। अखबार का कहना है कि ट्रंप के ताजा आदेश ने "शुरू से ही उनकी नीतियों के नस्लभेदी होने के बारे में बता दिया है।"
मध्यमार्गी अखबार 'तिजारत' ने शीर्षक लगाया "हिटलर के बदले आए हैं ट्रंप"। इसी अखबार ने एक और लेख छापा जिसमें इसने कैप्शन दिया, "ट्रंप एक ऐसा संकट हैं जो चरमपंथ से ज्यादा खतरनाक है।" अखबार के अनुसार अमरीकी रष्ट्रपति चुनाव के दौरान किए विवादित वादों को ट्रंप एक-एक कर हकीकत की शक्ल दे रहे हैं। अखबार ने बीते साल दिसंबर में किए ट्रंप के ट्वीट के बारे में लिखा इस तरह के ट्वीट चिंताजनक हैं।
उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है कि ट्रंप एक खतरा पैदा करना चाहते हैं जो दाएश (कथित इस्लामिक स्टेट), अल-नुस्रा फ्रंट, अल-कायदा और अन्य चरमपंथी और कट्टरपंथियों से भी बडा होगा। ऐसा लग रहा है कि ट्रंप एक तरह के संकट की रचना कर रहे हैं जो सभी चरमपंथियों से बडा होगा और उनसे ज्यादा खतरनाक भी होगा।"
कुछ अन्य अखबारों ने आश्चर्य जताया है कि इस वीजा बैन की लिस्ट में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान को शामिल नहीं किया गया है जबकि 9/11 हमलों और चरमपंथी घटनाओं में इन देशों के नागरिकों शामिल थे।
रुढ़िवादी अखबार 'हिमायत' का कहना है, "ट्रंप का आदेश में चरमपंथियों के खिलाफ लड़ाई का दिखावा मात्र है क्योंकि अमरीकी वीजा चरमपंथियों का पोषण करने वालों के दिया जा रहा है।" 'खुरासन' ने इन्हीं कारणों से ट्रंप के आदेश को 'विरोधाभासी' बताया है।
ईरान के अखबारों ने भी ट्रंप के आदेश पर जमकर गुस्सा निकाला और कई ने इसे नस्लभेदी कदम बताया। 'जावन' अखबार के पहले पन्ने पर बड़े हलफों में लिखा गया, "एक नस्लभेदी आदेश"। अखबार का कहना है कि ट्रंप के ताजा आदेश ने "शुरू से ही उनकी नीतियों के नस्लभेदी होने के बारे में बता दिया है।"
मध्यमार्गी अखबार 'तिजारत' ने शीर्षक लगाया "हिटलर के बदले आए हैं ट्रंप"। इसी अखबार ने एक और लेख छापा जिसमें इसने कैप्शन दिया, "ट्रंप एक ऐसा संकट हैं जो चरमपंथ से ज्यादा खतरनाक है।" अखबार के अनुसार अमरीकी रष्ट्रपति चुनाव के दौरान किए विवादित वादों को ट्रंप एक-एक कर हकीकत की शक्ल दे रहे हैं। अखबार ने बीते साल दिसंबर में किए ट्रंप के ट्वीट के बारे में लिखा इस तरह के ट्वीट चिंताजनक हैं।
उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है कि ट्रंप एक खतरा पैदा करना चाहते हैं जो दाएश (कथित इस्लामिक स्टेट), अल-नुस्रा फ्रंट, अल-कायदा और अन्य चरमपंथी और कट्टरपंथियों से भी बडा होगा। ऐसा लग रहा है कि ट्रंप एक तरह के संकट की रचना कर रहे हैं जो सभी चरमपंथियों से बडा होगा और उनसे ज्यादा खतरनाक भी होगा।"
कुछ अन्य अखबारों ने आश्चर्य जताया है कि इस वीजा बैन की लिस्ट में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान को शामिल नहीं किया गया है जबकि 9/11 हमलों और चरमपंथी घटनाओं में इन देशों के नागरिकों शामिल थे।
रुढ़िवादी अखबार 'हिमायत' का कहना है, "ट्रंप का आदेश में चरमपंथियों के खिलाफ लड़ाई का दिखावा मात्र है क्योंकि अमरीकी वीजा चरमपंथियों का पोषण करने वालों के दिया जा रहा है।" 'खुरासन' ने इन्हीं कारणों से ट्रंप के आदेश को 'विरोधाभासी' बताया है।