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अगर युद्ध हुआ तो कौन देगा ईरान का साथ, कौन होगा अमेरिका के पाले में?
Mon, 06 Jan 2020 10:30 PM IST
Mohit Mudgal
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Mohit Mudgal
Updated Mon, 06 Jan 2020 10:30 PM IST
सार
- सैन्य शक्ति में अमेरिका का जवाब नहीं, ईरान है बहुत पीछे
- अगर जंग हुई तो भारत जैसे देश उठाएंगे बड़ा नुकसान
- ईरान के पास इराक मिलिशिया का बल, रूस-चीन से सहयोग की उम्मीद
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डोनाल्ड ट्रंप-हसन रोहानी
विस्तार
सामरिक योद्धाओं से लेकर विशेषज्ञों के बीच में एमक्यू-9 यूएवी से ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी पर अमेरिकी हमले का वीडियो वायरल हो रहा है। बताते हैं यह वीडियो पेंटागन ने जारी किया है और इसके माध्यम से अमेरिका अपने फायर पावर का संदेश देने की कोशिश कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को डराने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि यदि ईरान ने हमला किया तो अमेरिका का नया हथियार वक्त का इंतजार कर रहा है। वहीं ईरान अमेरिका पर डरपोक होने का तंज कसकर सही समय, सही जगह पर बदला लेने की धमकी दे रहा है।
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मौन हैं दुनिया के दो बड़े फायर पावर
रूस और चीन अमेरिका-ईरान के टकराव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। दोनों देशों की प्रतिक्रिया पर न केवल अमेरिका की, बल्कि दुनिया के देशों की निगाहें हैं। अमेरिका के बाद दोनों देशों की सैन्य क्षमता अहम स्थान रखती है। दोनों न केवल परमाणु शक्ति संपन्न हैं, बल्कि हाइपरसोनिक मिसाइल और लंबी दूरी की मारक क्षमता रखते हैं। रूस और चीन के बाद फायर पावर के मामले में इस्राइल महत्वपूर्ण है। इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हालात पर गंभीरता से नजर रख रहे हैं। चारों तरफ दुश्मनों से घिरा इस्राइल यदि जंग जैसे हालात बनते हैं तो उसके द्वारा अमेरिका का साथ देने की उम्मीद है। फ्रांस की फायर पावर काफी अच्छी है। ब्रिटेन समेत पूरा यूरोप अभी सुरक्षात्मक और युद्ध जैसे हालात रोकने के प्रयास में है। लेकिन युद्ध जैसी स्थिति आई तो अमेरिका का साथ दे सकते हैं। भारतीय सामरिक विशेषज्ञों की मानें तो विश्व का पूरा सैन्य संतुलन इन्हीं देशों के इर्द गिर्द घूम रहा है।
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किसके दम पर बदला लेगा ईरान?
अमेरिका के मुकाबले ईरान की ताकत काफी कम है। फर्क बस यह है कि इराक में अमेरिका का विरोध बढ़ा है और इराक पड़ोसी देश ईरान के पक्ष में खड़ा हुआ है। 8.25 करोड़ की आबादी वाले ईरान के पास पांच लाख सैनिक हैं। उसके पास छोटी, मध्यम, 2000 किमी तक मार करने वाली मिसाइलें, चौथी पीढ़ी तक के फाइटर जेट, हेलीकाप्टर हैं। ग्लोबल फायर पावर ने उसे सैन्य शक्ति में दुनिया में 13वां स्थान दिया है, लेकिन याद रखना होगा कि ईरान से अमेरिका और उसके बेस की दूरी हजारों किमी दूर है। ईरान से अमेरिका की सरहद तक पहुंचना तेहरान के सैन्य बलों के लिए एक तरह से नामुमकिन है।
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इसकी तुलना में अमेरिका के पास उच्चस्तरीय मिसाइल, फाइटर जेट आदि का सुरक्षा कवच है। अमेरिका से ही ईरान पर हमला करने की ताकत है। मानव रहित टारगेट को धड़ाधड़ उड़ा देने वाले विमानों का जखीरा है। परमाणु हथियार के मामले में भी अमेरिका का तरकस भरा है। इतना ही नहीं खाड़ी के देशों में अमेरिका के फाइटर, सैनिक, युद्धपोत, विध्वंसक ईरान के चारों ओर तैनात हैं। एयर मार्शल (रिटा.) एनबी सिंह का भी कहना है कि अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान के मुकाबले बहुत तगड़ी है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ईरान के पास किसके कंधे का जोर है?
रूस से ईरान को बहुत उम्मीद
अमेरिका सीरिया में तख्तापलट चाहता था। राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से हटाने के लिए अमेरिका ने पूरी कोशिश की, लेकिन रूस ने कैस्पियन सागर से मिसाइल फायर करके अमेरिका के सपने पर पानी फेर दिया। रूस ने अपने उन्नत जंगी जहाजों, फाइटर जेटों को सीरिया के आकाश में भेजा और एस-400 ट्रायम्फ को सीरिया में तैनात करके उसकी सुरक्षा की। रूस से ईरान को बहुत उम्मीद है। ईरानी डिप्लोमैट रूस के साथ आने पर चीन का साथ पाने का भरोसा कर सकते हैं, क्योंकि चीन और अमेरिका के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं।
ईरान सीरिया के बहुत करीब है। इस समय नाटो सदस्य देश तुर्की से उसकी अच्छी निभ रही है। जनरल कासिम सुलेमानी ने लीबिया के हिजबुल्लाह, यमन के हूती से ईरान को मजबूती से जोड़ा था। ईरान को दोनों का साथ मिल सकता है। हमास जैसे संगठन भी ईरान का साथ दे सकते हैं। अंत में ईरान की भौगोलिक स्थिति उसके बहुत पक्ष में है। ईरान तीन तरफ पहाड़, एक तरफ समुद्र से घिरा है। स्टेट ऑफ होरमुज सीधे उसके नियंत्रण में रहता है। जहां से वह अमेरिका और उसके सहयोगियों का व्यापार, कारोबार तक रोक सकता है। ईरान का मध्य का हिस्सा बड़ा रेगिस्तान(मरुस्थल) है। यह भौगोलिक स्थिति जंग जैसी स्थिति में उसे काफी लाभ पहुंचाती है।
अमेरिकी सैन्य शक्ति से चारों ओर घिरा है ईरान
ईरान से सटे अफगानिस्तान, इराक, तुर्की, सीरिया,जार्डन, कुवैत, सऊदी अरब, बहरीन, कतर, यूएई, ओमान में अमेरिका के सैनिक हैं। युद्धपोत, फाइटरजेट तैनात है। अमेरिका ने कई सैन्य अड्डे बनाए हैं। किसी भी तरह की जंग की स्थिति बनने पर पश्चिम एशिया के उसके इन ठिकानों को ईरान से बड़ी चुनौती मिल सकती है। अमेरिका के ये सभी ठिकाने ईरान की सैन्य शक्ति की जद में आ सकते हैं। दूसरे अमेरिका साइबर हमले के मामले में बड़ी महारत रखता है। वह ईरान के स्वचालित युद्धक अस्त्रों को साइबर हमले से असरहीन कर सकता है। 2008 में ईरान पर एक ऐसा ही साइबर हमला हुआ था। तब उसके करीब 30 हजार कंप्यूटर ने काम करना बंद कर दिया था। साइबर अटैक और हैकिंग के मामले में इस्राइल को भी महारत हासिल है। अमेरिका और इस्राइल की तरह रूस और चीन ने भी अपने साइबर अटैक विंग को काफी धार दी है।
जंग हुई तो भारत उठाएगा बड़ा नुकसान
भारत किसी भी दशा में युद्ध का पक्षधर नहीं है। नई दिल्ली लगातार दुनिया से शांति के रास्ते पर चलने की अपील कर रही है, लेकिन अमेरिका के साथ ईरान का टकराव बढ़ने पर भारत जैसे विकासशील देश बड़ा नुकसान उठा सकते हैं। भारत में उदारीकरण के बाद कारोबार, बाजार वैश्विक बाजारों से जुड़ चुका है। भारत को दुनिया के देशों के कारोबारियों से भारत में निवेश की उम्मीद है। इसके अलावा भारत ऊर्जा और हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र में दुनिया के देशों से निर्यात पर निर्भर है।
जंग जैसे हालात में भारत पर अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चिंता रहेगी। करीब 4000 भारतीय नागरिक ईरान में रहते हैं। फारस की खाड़ी और तटीय क्षेत्र में भी भारतीयों की अच्छी तादाद है। खाड़ी देशों और पश्चिम एशिया में 80 लाख से एक करोड़ भारतीयों के होने का अनुमान है। कोई भी युद्ध जैसे हालात न केवल भारत की सुरक्षा संबंधी चिंता बढ़ा सकता है, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडारण पर भी इसका विपरीत असर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमत भी आसमान छू सकती है और इससे भारत की विकास योजनाओं पर विपरीत असर पड़ सकता है।