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रूस से कच्चे तेल का आयात: भारत को अमेरिका की नाराजगी की क्यों नहीं है परवाह?

Wed, 06 Apr 2022 02:22 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Wed, 06 Apr 2022 02:22 PM IST
सार

एयर वाइस मार्शल (पूर्व) एनबी सिंह कहते हैं कि जर्मनी, फ्रांस समेत तमाम यूरोप के देश रूस से प्राकृतिक गैस, कच्चा तेल समेत अन्य सामान सस्ती दर पर ले रहे हैं। वहां के बैंक रूस को भुगतान कर रहे हैं। ऐसे में भारत के पास भी इसके ठोस कारण हैं। भारत को रूस से सस्ता तेल आदि मिल रहा है तो क्यों न खरीदे?

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Why India does not care about US on Crude oil import from Russia
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ एस जयशंकर - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अमेरिका और रूस के बीच शीतयुद्ध का भयानक दौर चल रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन अपने रूस के समकक्ष व्लादिमीर पुतिन को न केवल क्रूर तानाशाह कह रहे हैं, बल्कि मानवता का हत्यारा जैसे 'विशेषणों' से संबोधित करने से नहीं चूक रहे हैं। जवाब में पुतिन अपनी रणनीति से उन्हें जवाब दे रहे हैं। लेकिन इसी के साथ भारत भी अमेरिकी चिंताओं और नाराजगी की बहुत परवाह नहीं कर रहा है। भारत ने रूस से कच्चे तेल के आयात समेत अन्य मामले में अमेरिका की नहीं सुनी। विदेश नीति के जानकार भारत के इस कदम को सही ठहरा रहे हैं। कूटनीति के जानकारों का कहना है कि कई दशक बाद भारत ने अमेरिका की नाराजगी की परवाह नहीं की है।

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विदेश मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार कहते हैं कि भारत समझदारी दिखा रहा है। अमेरिकी दबाव के आगे झुकना भारत के लिए ठीक नहीं है। विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी एसके शर्मा कहते हैं कि भारत की इस मजबूरी को अमेरिका भी समझ रहा है। हालांकि वह कहते हैं कि भारत के लिए यूक्रेन के मसले पर अमेरिका की मंशा को नजरअंदाज करना एक साहसिक कदम ही कहा जाएगा। एसके शर्मा कहते हैं कि विदेश नीति, सामरिक नीति, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति के हिसाब से भारत ने सही कदम उठाया है। वह कहते हैं कि यहां अमेरिका की भी मजबूरी है कि वह भारत के फैसले के खिलाफ बहुत दबाव नहीं बना सकता। शर्मा कहते हैं कि इसे अमेरिका के राजनयिक भी अच्छी तरह से समझते हैं। उन्हें पता है कि रूस के साथ संबंध न रखने का दबाव बढ़ाने पर भारत इसे अनसुना कर सकता है। इसलिए दक्षिण सागर और क्षेत्रीय स्थिति को देखते हुए अमेरिका भारत पर ज्यादा दबाव बनाने से बच रहा है।

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भारत के साथ दोहरा मानदंड अपनाना ठीक नहीं

एयर वाइस मार्शल (पूर्व) एनबी सिंह कहते हैं कि जर्मनी, फ्रांस समेत तमाम यूरोप के देश रूस से प्राकृतिक गैस, कच्चा तेल समेत अन्य सामान सस्ती दर पर ले रहे हैं। वहां के बैंक रूस को भुगतान कर रहे हैं। ऐसे में भारत के पास भी इसके ठोस कारण हैं। भारत को रूस से सस्ता तेल आदि मिल रहा है तो क्यों न खरीदे? एयर वाइस मार्शल कहते हैं कि अमेरिका यहां दोहरा मानदंड नहीं अपना सकता। विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला और विदेश मंत्री एस जयशंकर भी इसी तरह का तर्क दे चुके हैं। एयर वाइस मार्शल का कहना है कि भारत के रक्षा क्षेत्र के 70 फीसदी से अधिक साजो-सामान रूस से आयातित हैं। इसलिए भारत रूस की अनदेखी नहीं कर सकता। तीसरा बड़ा कारण क्षेत्रीय सुरक्षा की चिंताएं हैं। वह कहते हैं कि भारत और चीन के बीच में जब भी मध्यस्थता की स्थिति आती है, रूस से मदद मिलती रही है। इस मामले में अमेरिका के हाथ तंग रहते हैं। हालांकि भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर क्वैड फोरम में शामिल है। लेकिन इसके बावजूद क्षेत्रीय दृष्टि से चीन भारत का पड़ोसी देश है। रूस सामरिक साझीदार देश है। इसलिए भारत ने क्षेत्रीय, आर्थिक, सामरिक और रणनीतिक समीकरण को ध्यान में रखकर कदम बढ़ाया है।

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