तहकीकात: क्यों मुश्किल होती जा रही है कोरोना से जंग, हैरान कर देगी मेडिकल स्टाफ और बेड की सच्चाई
देश में 'कोरोना से जंग' आखिर इतनी मुश्किल क्यों होती जा रही है? मेडिकल स्टाफ, जिसमें डॉक्टर, नर्स और तकनीकी कर्मी शामिल हैं, क्या उनकी संख्या अपने देश के लिए पर्याप्त है? मौजूदा स्थिति में 'आईसीयू बेड' का सबसे बड़ा संकट है। वित्त आयोग 'कोविड के दौर में' 2021-26 के लिए जारी रिपोर्ट में कई अहम खुलासे हुए हैं। ये रिपोर्ट हैरान करने वाली है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 18 लाख 99 हजार 228 अस्पताल बेड हैं। खास बात है कि इसमें साठ फीसदी से अधिक बेड निजी क्षेत्र में हैं यानी एक हजार की आबादी पर लगभग 1.4 बेड ही मिल रहे हैं।
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विस्तार
चीन के अस्पतालों में बेड का घनत्व प्रति एक हजार की आबादी पर चार से ज्यादा है। श्रीलंका, ब्रिटेन और अमेरिका में प्रति एक हजार की आबादी पर तीन तो थाईलैंड और ब्राजील के अस्पतालों में दो से अधिक बेड की व्यवस्था है। बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मणिपुर, मध्यप्रदेश और असम के अस्पतालों में बेड का घनत्व खासा कम है। गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, हरियाणा और तेलंगाना में सार्वजनिक अस्पतालों के बेड का घनत्व अपेक्षाकृत कम है। इनकी पूर्ति निजी अस्पतालों के बेड से पूरी करने का प्रयास किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य आउट पोस्ट यानी उप केंद्रों की 23 फीसदी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की 37 फीसदी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की 28 फीसदी से अधिक कमी सामने आई है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। तीन साल पहले तक भारत में 11.54 लाख पंजीकृत एलोपैथिक आयुर्विज्ञान चिकित्सक, 29.66 लाख नर्स और 11.25 लाख फार्मासिस्ट थे। जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो चिकित्सक और नर्सों के बीच का अनुपात डब्लूएचओ द्वारा निर्धारित मानक की अपेक्षा बहुत कम है।
भारत में जनसंख्या की तुलना में चिकित्सकों का अनुपात 1:1511 है। इसी तुलना में नर्सों का अनुपात 1:670 है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो मानक तय किए हैं, वे क्रमश: 1:1000 और 1:300 के विपरीत हैं। यदि यह माना जाए कि राज्य चिकित्सा परिषदों में पंजीकृत सभी एलोपैथिक चिकित्सक उसी राज्य में प्रैक्टिस कर रहे हैं तो भी राज्यों के मध्य जनसंख्या और एलोपैथिक चिकित्सकों के अनुपात में व्यापक अंतर नजर आता है। प्रमुख राज्यों में से झारखंड, हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की स्थिति बहुत अधिक खराब है।
बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और यूपी जैसे राज्यों में जनसंख्या की तुलना में सरकारी चिकित्सकों का अनुपात काफी कम है। बिहार, झारखंड, सिक्किम और तेलंगाना में नर्सों की कमी सबसे ज्यादा है। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में सभी श्रेणी के स्वास्थ्य कर्मियों की कमी है। विभिन्न राज्यों के आयुर्विज्ञान महाविद्यालयों में सीटों की संख्या अत्यधिक विषम है। वजह, कुल आयुर्विज्ञान तथा शल्य चिकित्सा स्नातक 'एमबीबीएस' सीटों की दो तिहाई सीटें केवल देश के सात राज्यों (तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात) में केंद्रित हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति द्वारा यह अनुशंसा की गई है कि प्राथमिक स्वास्थ्य पर व्यय को कुल स्वास्थ्य व्यय के दो तिहाई तक बढ़ाया जाए। हालांकि अभी तक केवल 53 फीसदी तक ही ऐसा किया जा सका है। प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, जिसमें निवारण और संवर्धन शामिल है, में किए गए निवेश से बहुत ही कम लागत पर, बेहतर स्वास्थ्य और विकास के परिणाम प्राप्त होते हैं। यह रोग को रोककर और सामान्य स्वास्थ्य को बढ़ावा देकर महंगी, जटिल देखभाल की आवश्यकता को कम करने में सहायता करता है। स्वास्थ्य संबंधी प्रति व्यक्ति व्यय में बहुत अधिक अंतर है।
बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में यह व्यय सबसे कम रूप में देखा जा सकता है। इनका स्वास्थ्य संबंधी प्रति व्यक्ति खर्च केरल और तमिलनाडु का लगभग आधा है। मेघालय को छोड़कर सभी राज्य अपने बजट का आठ फीसदी से भी कम स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च कर रहे हैं। पंजाब, तेलंगाना, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार और नागालैंड अपने बजट का पांच फीसदी से भी कम स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े
- देश में अस्पताल बेडों की संख्या 18,99,228 है। एक हजार की आबादी पर हैं केवल 1.4 बेड।
- पंजाब, तेलंगाना, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार और नागालैंड स्वास्थ्य क्षेत्र पर कुल बजट का पांच फीसदी से भी कम खर्च कर रहे हैं।
- मेघालय को छोड़कर बाकी सभी राज्य अपने बजट का आठ फीसदी से भी कम स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च कर रहे हैं।
- 22 सितंबर 2020 तक भारत में दो लाख 47 हजार 972 ऑक्सीजन बेड थे। 28 जनवरी तक इनकी संख्या एक लाख 57 हार 344 रह गई। ये कमी 36.54 फीसदी रही।
- इसी अवधि में कोविड मरीजों के लिए आईसीयू बेड की संख्या में 46 फीसदी की कमी आई है। 22 सितंबर को इनकी संख्या 66,638 थी जो 28 जनवरी को 36,008 रह गई।