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सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा हाईकोर्ट का फैसला?: बहाल की अधिकारी की सेवा, कहा- बर्खास्त करना मौत की सजा जैसा

Mon, 19 Oct 2026 07:52 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 19 Oct 2026 07:52 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारी के लिए नौकरी से बर्खास्तगी मौत की सजा जैसी हो सकती है। अदालत ने पेरियार यूनिवर्सिटी के उप-पंजीयक आर. सरवणन की सेवा बहाल करने के फैसले को बरकरार रखा। उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप था। जांच में जरूरी सबूत क्यों नहीं मिले? मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ का आदेश क्यों पलटा गया? क्या वैकल्पिक उपाय होने पर भी हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है?

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Why Did Supreme Court Overturn High Court Verdict Officer Reinstated, Dismissal Called Like Death Penalty
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा मद्रास हाईकोर्ट का फैसला? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सरकारी नौकरी से बर्खास्त होना किसी कर्मचारी और उसके परिवार के लिए बड़ा झटका हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा है कि सरकारी कर्मचारी के लिए सेवा से बर्खास्तगी की सजा मौत की सजा से कम नहीं है। अदालत ने तमिलनाडु की पेरियार यूनिवर्सिटी के उप-पंजीयक आर. सरवणन को बड़ी राहत देते हुए उनकी सेवा बहाल करने का आदेश बरकरार रखा। उन पर आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने का आरोप था, लेकिन अदालत के मुताबिक, उन्हें दोषी ठहराने के लिए जरूरी सबूत मौजूद नहीं थे।

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सुप्रीम कोर्ट ने बर्खास्तगी को मौत की सजा जैसा क्यों बताया?
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने 16 अक्टूबर के आदेश में कहा कि नौकरी से बर्खास्तगी या सेवा से हटाना सरकारी कर्मचारी के लिए सबसे कठोर सजा है। इसका असर केवल कर्मचारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार पर भी पड़ता है। ऐसी सजा से कर्मचारी अपनी नौकरी और उससे जुड़े लाभ खो सकता है और आर्थिक रूप से बेसहारा हो सकता है। अदालत ने कहा कि इतने गंभीर परिणामों वाले मामलों में हाईकोर्ट केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता। उचित मामलों में उसे हस्तक्षेप करना चाहिए।
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पेरियार यूनिवर्सिटी के अधिकारी को किस आरोप में हटाया गया था?
तमिलनाडु की पेरियार यूनिवर्सिटी में उप-पंजीयक आर. सरवणन पर आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने का आरोप लगाया गया था। विश्वविद्यालय ने आरोपों की जांच के लिए एक सदस्यीय आयोग बनाया था। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, आयोग के सामने सरवणन के खिलाफ कोई दस्तावेज या जरूरी सबूत पेश नहीं किए गए। इसके बावजूद उन्हें दोषी ठहरा दिया गया और सेवा से हटा दिया गया। अदालत ने कहा कि जांच रिपोर्ट में निकाले गए निष्कर्ष अनुमान और अटकलों पर आधारित थे। ऐसे निष्कर्षों के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
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मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सरवणन को पहले मद्रास हाईकोर्ट की एकल पीठ से राहत मिली थी और उनकी सेवा बहाल करने का फैसला दिया गया था। बाद में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ के आदेश को रद्द कर दिया और एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने कहा कि खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले में दखल देने के लिए कोई ठोस और उचित कारण नहीं बताया। अदालत के अनुसार, विश्वविद्यालय के अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने भी आयोग की रिपोर्ट स्वीकार करते समय इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उसके निष्कर्षों के समर्थन में कानूनी रूप से मान्य सबूत नहीं थे।


क्या कर्मचारी को वैकल्पिक उपाय होने पर भी हाईकोर्ट जा सकता है?
विश्वविद्यालय ने दलील दी थी कि सरवणन को तमिलनाडु सेवा नियमों के तहत उपलब्ध वैकल्पिक उपाय अपनाना चाहिए था और हाईकोर्ट को सीधे मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होना हाईकोर्ट की संवैधानिक शक्तियों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाता। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट सरकारी या विभागीय आदेश की वैधता, तर्कसंगतता और प्रक्रिया की निष्पक्षता की जांच कर सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैकल्पिक उपाय अपनाने का नियम सुविधा के लिए है, कोई कठोर प्रतिबंध नहीं। जब किसी कर्मचारी को बिना कानूनी सबूत के सजा दी जाती है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।

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