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जिनका राजधर्म अटल था!

Thu, 16 Aug 2018 07:55 PM IST
राजेश बादल 
राजेश बादल  Updated Thu, 16 Aug 2018 07:55 PM IST
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Whose religion was firm!

अटल बिहारी वाजपेयी अब नहीं हैं। भारतीय लोकतंत्र में गैर कांग्रेसवाद का सबसे मुखर स्वर। सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक। हार नहीं मानूंगा का एलान करते करते सदी का हस्ताक्षर आखिरकार महाकाल से हार गया। अटलजी सशरीर भले ही नहीं हैं लेकिन एक दयालु, सदभाव-शांति के पुजारी और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर उनका व्यक्तित्व हमेशा हमारे बीच रहेगा। वे युगपुरुष थे और युगपुरुष कभी नहीं मरा करते।

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सवाल यह है कि अटलजी का कौन सा रूप याद रखा जाए? एक स्वतंत्रता सेनानी या एक साहित्यकार, एक पत्रकार या एक विलक्षण राजनेता, एक महान देशभक्त या राष्ट्रभाषा हिंदी का सेवक, सबको साथ लेकर चलने वाला प्रधानमंत्री या कठिन से कठिन क्षणों में अपना राजधर्म न छोड़ने वाला संकल्पशील महापुरुष, एक ईमानदार भारतीय या फिर इन सबसे ऊपर एक सच्चा इनसान। एक व्यक्ति में इतने सारे रूपों का समावेश आज के विश्व में दुर्लभ संयोग है। लंबे समय तक इस शून्य को भरना नामुमकिन सा है।
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भारतीय संसद में जब उन्होंने अपनी पारी एक नौजवान, तनिक शर्मीले राजनेता के तौर पर प्रारंभ की तो एकदम से किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन जब उन्होंने एक दिन पंडित नेहरू की मौजूदगी में सरकार की विदेशनीति पर अपने यक्ष प्रश्न उठाए तो नेहरू जी भी तारीफ किए बिना नहीं रह सके। क्या संयोग है कि जब 1977 में वे विदेश मंत्री बने तो उन्होंने पाया कि उनके दफ्तर से नेहरू जी की तस्वीर हटा दी गई है। उन्होंने बेहद गुस्सा दिखाया और पूरे सम्मान के साथ नेहरू जी की तस्वीर लगवाई।
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यही नहीं, उन्होंने नेहरू युग की विदेश नीति को ही स्वीकार किया। नेहरू ने उनकी प्रतिभा की सार्वजनिक तारीफ की थी और जब पाकिस्तान ने 1971 में भारत पर युद्ध थोपा तो उसे मुंह तोड़ जवाब देने के लिए अटल जी ने उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सार्वजनिक तारीफ की थी। उनका मानना था कि नीति हमेशा देश की होती है किसी व्यक्ति विशेष की नहीं। यह उदारता आज के नियंताओं के लिए सबक है। जल्द ही उन्होंने उस दौर के धुरंधर संसदीय महापुरुषों के बीच अपना स्थान बना लिया।

इनमें नेहरू जी के अलावा श्यामाप्रसाद मुखर्जी, राममनोहर लोहिया, मोरारजी देसाई, के कामराज, चौधरी चरणसिंह, फीरोज गांधी, जगजीवनराम, मधु दंडवते, मधुलिमये, सुशीला नैयर, वायवी चव्हाण जैसे लोग थे। जब जनता पार्टी की सरकार बिखर रही थी तो अटल जी ने मजबूती दिखाई और पार्टी को तोड़ने वाले शिखर नेताओं को आड़े हाथों लिया। यही नहीं, एक समय ऐसा भी आया था जब अटलजी को लगा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जरूरत से ज्यादा राजनीतिक दखल दे रहा है तो उन्होंने 2 अगस्त 1979 को इंडियन एक्सप्रेस में - वी आर ऑल टू ब्लेम शीर्षक से बेहद तीखा लेख लिखा।

इसमें उन्होंने साफ साफ कहा कि संघ को सत्ता संघर्ष से दूर रहना चाहिए और उसे स्पष्ट करना चाहिए कि उसके हिंदू राष्ट्र का मतलब सिर्फ भारतीय राष्ट्र से है। संघ को आइना दिखाने वाले आजतक सिर्फ अटल जी ही हुए हैं। इसके बाद खुद बाला साहेब देवरस को इस पर बोलना पड़ा था। उन्होंने स्वीकार किया था कि अगर संघ को बदलना पड़ा तो बदलेंगे। परिवर्तन प्रकृति का नियम है।

जनता पार्टी की सरकार में विदेशमंत्री रहते हुए ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में अपना भाषण राष्ट्रभाषा हिंदी में दिया तो सारे संसार के करोड़ों हिंदी प्रेमियों का मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया। अमेरिका से लौटने पर उन्होंने लिखाः 

गूंजी हिंदी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार
राष्ट्रसंघ के मंच से हिंदी की जयजयकार
देख स्वभाषा प्रेम, हिंद हिंदी में बोला
भाषा का यह प्रेम विश्व अचरज से डोला 
कह कैदी कविराय मैम की माया टूटी 
भारत माता धन्य स्नेह की सरिता फूटी

विदेशमंत्री के रूप में उनकी पारी को भारतीय हितों के अनुरूप काम करने के लिए याद की जाएगी। सन 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद पहले अधिवेशन में ,"अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा "एलान करने वाले अटलजी ही थे। भले ही 1996 में वे तेरह दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने, लेकिन अपने लोकतांत्रिक फर्ज को उन्होंने याद रखा। वे जानते थे कि उनकी सरकार बहुमत साबित नहीं कर पाएगी, लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति के निर्देश का पालन करते हुए मंत्रिमंडल का गठन किया था। वे चाहते तो सांसदों को अपने पक्ष में करने के लिए अनुचित तरीके अपना सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

जब उन्हें पूरे पांच साल के लिए प्रधानमंत्री पद पर काम करने का अवसर मिला तो सभी दलों को साथ लेकर चलने के बेजोड़ कौशल का परिचय दिया। उन्होंने पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाया। लाहौर तक बस लेकर गए और सद्भावना यात्री के रूप में भाईचारे का संदेश छोड़कर आए। मगर जब पाकिस्तान ने इस भरोसे पर पीठ में छुरा घोंपा और कारगिल युद्ध छेड़ा तो वाजपेयी जी ने सबक भी सिखाया। पाकिस्तान युद्ध बंद कराने के लिए अमेरिका की शरण में गया तो उन्होंने बेहद सख्त रवैया अख्तियार किया। यही नहीं, पोखरण में जिस परमाणु परीक्षण की शुरुआत इंदिरा गांधी ने की थी, उसे अटल जी ने और ताकतवर शक्ल में तब्दील किया।

आर्थिक प्रतिबंधों की भी परवाह नही की। उदार, दयालु और कवि हृदय प्रधानमंत्री का यह साहसिक रूप देखकर लोगों ने लाल बहादुर शास्त्री को याद किया। जब गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए तो वाजपेयी जी कसमसा कर रह गए। फिर भी उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की सीख दी। उनके जीवन में यह एक मुश्किल घड़ी थी। वैसे उनका कार्यकाल कम चुनौतीभरा नहीं था। कांधार कांड, संसद पर हमला, लालकिले पर आतंकवादी हमला और अक्षरधाम जैसी आतंकवादी वारदातें उन्हीं के कार्यकाल में हुईं। उस दौरान बड़े संयम और परिपक्व नजरिए से अटलजी ने उनका सामना किया। दो हजार चौदह में जब उन्हें भारतरत्न से सम्मानित किया गया तो सारे देश ने एक स्वर में उनका अभिनंदन किया।

और अब बात 1991 के चुनाव की। प्रचार पूरी रफ्तार पर था। इसी बीच राजीव गांधी की हत्या हो गई। अटल जी बेहद सदमें में थे। जब राजीव प्रधानमंत्री थे तो उन्हीं दिनों अटल जी को कुछ गंभीर बीमारी हुई। ऑपरेशन अमेरिका में होना था। आर्थिक संकट था। एक दिन राजीव अटलजी के पास आए। बोले, एक संसदीय प्रतिनिधि मंडल अमेरिका जा रहा है। आप उसके मुखिया हैं। इसके बाद राजीव गांधी ने अमेरिका में उनके पूरे इलाज की व्यवस्था की। ऑपरेशन के बाद पांच बार उन्हें अमेरिका जाना पड़ा। राजीव गांधी ने सारे प्रबंध किए और किसी को पता न चला। अटल जी ने खुद इसका खुलासा किया। वह भी चुनाव के दिनों में। अटलजी ने कहा, राजीव एक बेहतरीन इंसान थे। क्या आज आप राजनीति के इस रूप की कल्पना भी कर सकते हैं? 


मेरी उनसे पहली मुलाकात 1980 के चुनाव प्रचार के दौरान हुई। मेरी अनेक रिपोर्ट्स और उनका एक साक्षात्कार उन्हें काफी पसंद आया था। इसके बाद टेलीविजन में आने के बाद उनसे कई मुलाकातें हुईं। टीवी साक्षात्कार लिए। वो प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्हें मेरा नाम याद था। हमेशा वे मुझे पहले नाम से ही बुलाते थे। मैंने उन पर एक फिल्म बनाई थी। मध्यप्रदेश हमेशा उनका पसंदीदा राज्य बना रहा। ग्वालियर के बाड़े की मिठाई और चाट उन्हें बेहद पसंद थी। हाल के कुछ वर्षों में उनकी लगातार बीमारी ने उन्हें राजनीति से संन्यास लेने पर विवश कर दिया था लेकिन उनकी एक कविता शायद अवचेतन में भी चलती रही होगी। ये कविता हैः

मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा कोई इरादा न था
मोड़ पर मिलेंगे, इसका वादा न था
रास्ता रोक कर खड़ी हो गई वो
यों लगा, जिंदगी से बड़ी हो गई
तू दबे पांव, चोरी छिपे से न आ 
सामने वार कर, फिर मुझे आजमा
मौत से बेखबर, जिंदगी का सफर
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर
पार पाने का कायम मगर हौसला,
देख तूफां का तेवर, त्यौरी तन गई
मौत से ठन गई!

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