{"_id":"645fa52a28e99ede310de266","slug":"who-is-responsible-for-bjp-defeat-in-karnataka-committee-will-be-formed-for-review-poll-2023-2023-05-13","type":"story","status":"publish","title_hn":"कर्नाटक हार का जिम्मेदार कौन?: केंद्रीय नेताओं की तरफ उठी उंगली, हार की समीक्षा के लिए बनेगी कमेटी","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
कर्नाटक हार का जिम्मेदार कौन?: केंद्रीय नेताओं की तरफ उठी उंगली, हार की समीक्षा के लिए बनेगी कमेटी
सार
भाजपा ने जिस तरह कर्नाटक में हनुमान और मुस्लिम आरक्षण फैक्टर पर दांव खेला है, वह भी मतदाताओं को जातीय सोच से बाहर निकालने में असफल साबित हुआ। यह पार्टी के लिए एक बड़ा सबक है कि वह केवल हिंदू-मुसलमान फैक्टर के सहारे सभी राज्यों में जीत हासिल नहीं कर सकती।
विज्ञापन
कर्नाटक चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कर्नाटक में भाजपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। पार्टी जल्द ही एक कमेटी का गठन कर इस हार की समीक्षा करेगी। कमेटी में पार्टी के केंद्रीय नेताओं के साथ-साथ कर्नाटक के दो प्रमुख राज्य स्तरीय नेता भी शामिल किए जा सकते हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, महासचिव बीएल संतोष और गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। भाजपा के एक नेता ने अमर उजाला को बताया कि पार्टी को किसी राज्य में जीत मिलती है या हार, वह उसकी समीक्षा अवश्य करती है। कर्नाटक में मिली हार के कारणों की भी समीक्षा की जाएगी। विभिन्न मुद्दे पार्टी के राज्य स्तरीय नेताओं के द्वारा पार्टी नेतृत्व के संज्ञान में लाए गए हैं। उन सभी मुद्दों पर विचार-विमर्श कर नक नई रणनीति के साथ पार्टी जल्द ही तेलंगाना के चुनाव की तैयारी में जुटने वाली है। तेलंगाना में इसी साल के अंत में नवंबर-दिसंबर माह में चुनाव हो सकते हैं।
मिशन दक्षिण पर असर
जिस दौर में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे और संगठन की ताकत के सहारे लगातार एक के बाद एक लक्ष्य हासिल करती जा रही है, उसी दौर में पूरी कोशिश के बाद भी कर्नाटक में हुई करारी हार से पार्टी को करारा झटका लगा है। कर्नाटक की हार से पार्टी के लिए दक्षिण का दरवाजा बंद होने का अनुमान भी लगाया जा रहा है क्योंकि इसी कर्नाटक मॉडल के सहारे पार्टी तेलंगाना, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी विस्तार की संभावनाएं खोज रही थी, लेकिन कर्नाटक की हार ने यह बता दिया है कि भाजपा अभी दक्षिण की नब्ज समझने में चूक कर रही है। इसे ठीक किए बिना दक्षिण के मतदाताओं का दिल जीतना मुश्किल है। उसे यह समझना पड़ेगा कि दक्षिण की राजनीति उत्तर भारत की राजनीति से काफी उलट है और दक्षिण के लिए उसे अलग तरीके से चुनाव को देखने की आवश्यकता है।
अलग कारक तलाशने होंगे
भाजपा ने जिस तरह कर्नाटक में हनुमान और मुस्लिम आरक्षण फैक्टर पर दांव खेला है, वह भी मतदाताओं को जातीय सोच से बाहर निकालने में असफल साबित हुआ। यह पार्टी के लिए एक बड़ा सबक है कि वह केवल हिंदू-मुसलमान फैक्टर के सहारे सभी राज्यों में जीत हासिल नहीं कर सकती।
विज्ञापन
इन पर ज्यादा भरोसा महंगा पड़ा
दरअसल, पार्टी नेताओं के बीच चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने कर्नाटक के बारे में पूरी तरह से प्रह्लाद जोशी और बीएल संतोष पर भरोसा किया और उन्हें निर्णय लेने की पूरी आजादी दी। इसी तरह सीटी रवी की भूमिका को लेकर भी प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं।
पार्टी नेताओं में आपसी सहयोग नहीं
पार्टी नेता मान रहे हैं कि कर्नाटक को लेकर एक के बाद एक कई गलतियां हुई हैं जिससे बचा जा सकता था। जिस तरह पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य के स्थानीय नेताओं को भरोसे में लिए बिना टिकटों का बंटवारा किया, उसने पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव भर दिया। कर्नाटक में केंद्रीय नेता प्रह्लाद जोशी और बीएल संतोष के ज्यादा दखल को लेकर भी असंतोष सामने आ रहा था, लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
गुजरात मॉडल दक्षिण में नहीं चलेगा
पार्टी के एक नेता ने कहा कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को यही लग रहा था कि जिस तरह वह गुजरात में अंतिम समय में पूरी सरकार को बदलकर सरकार विरोधी नकारात्मक ज्वार एंटी इनकमबेंसी फैक्टर को कमजोर करने में सफलता पाई थी। यह फैक्टर उत्तराखंड में भी सफल रहा था। पार्टी का मानना था कि यह दांव दक्षिण में भी सफल रहेगा, लेकिन चुनाव परिणाम बताते हैें कि कर्नाटक में प्रयोग असफल साबित हुआ। नेताओं का मानना है कि उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव से पहले नेतृत्व परिवर्तन की बात की जा रही थी, यदि ऐसा हुआ होता तो उत्तर प्रदेश में भी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता था। इस प्रकरण का संदेश है कि पार्टी को राज्यवार नीति को समझते हुए चलना होगा।
इसका बड़ा कारण यह हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात से ही होने के कारण सरकार की पूरी खामी उनकी छवि के नीचे दब गई, लेकिन दक्षिण की राजनीति में सदैव से स्थानीय फैक्टर ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं। कर्नाटक में भी यही हुआ और स्थानीय नेताओं के कमजोर सहयोग के कारण पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।
येदियुरप्पा सिमट गए
पूरे चुनाव अभियान में येदियुरप्पा बाहर नहीं निकले। उन्होंने अपने बेटे के चुनाव प्रचार तक अपने को सीमित कर लिया था। इससे लिंगायत मतदाताओं की पार्टी से नाराजगी बढ़ती गई और वे कांग्रेस के पक्ष में टूट गए।
पीएम न होते तो ....
इस पूरे चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की खूब चर्चा रही। उनके चुनाव प्रचार के असर को लेकर भी मंथन जारी है। विभिन्न सर्वे में 19 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को वोट देने के पीछे केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कारण बताया है। भाजपा के एक नेता के मुताबिक, प्रधानमंत्री के सघन चुनाव प्रचार के कारण भाजपा एक सम्मानजनक स्कोर तक पहुंच सकी। यदि पीएम चुनाव प्रचार न करते तो भाजपा एक बार फिर 40 के आसपास ठहर जाती जैसा कि पूर्व में येदियुरप्पा की नाराजगी के कारण भाजपा को रुकना पड़ गया था।
लोकसभा में क्या होगा असर?
नेता के मुताबिक, मतदाताओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को लेकर कोई प्रश्न नहीं है। विभिन्न सर्वे और चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। पिछले लोकसभा चुनाव के पूर्व भी भाजपा को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में करारी हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने इन्हीं राज्यों में क्लीन स्वीप कर दिया। नेता के मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा कर्नाटक में एक बार फिर सभी सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रहेगी।
विज्ञापन
मिशन दक्षिण पर असर
जिस दौर में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे और संगठन की ताकत के सहारे लगातार एक के बाद एक लक्ष्य हासिल करती जा रही है, उसी दौर में पूरी कोशिश के बाद भी कर्नाटक में हुई करारी हार से पार्टी को करारा झटका लगा है। कर्नाटक की हार से पार्टी के लिए दक्षिण का दरवाजा बंद होने का अनुमान भी लगाया जा रहा है क्योंकि इसी कर्नाटक मॉडल के सहारे पार्टी तेलंगाना, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी विस्तार की संभावनाएं खोज रही थी, लेकिन कर्नाटक की हार ने यह बता दिया है कि भाजपा अभी दक्षिण की नब्ज समझने में चूक कर रही है। इसे ठीक किए बिना दक्षिण के मतदाताओं का दिल जीतना मुश्किल है। उसे यह समझना पड़ेगा कि दक्षिण की राजनीति उत्तर भारत की राजनीति से काफी उलट है और दक्षिण के लिए उसे अलग तरीके से चुनाव को देखने की आवश्यकता है।
विज्ञापन
अलग कारक तलाशने होंगे
भाजपा ने जिस तरह कर्नाटक में हनुमान और मुस्लिम आरक्षण फैक्टर पर दांव खेला है, वह भी मतदाताओं को जातीय सोच से बाहर निकालने में असफल साबित हुआ। यह पार्टी के लिए एक बड़ा सबक है कि वह केवल हिंदू-मुसलमान फैक्टर के सहारे सभी राज्यों में जीत हासिल नहीं कर सकती।
विज्ञापन
इन पर ज्यादा भरोसा महंगा पड़ा
दरअसल, पार्टी नेताओं के बीच चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने कर्नाटक के बारे में पूरी तरह से प्रह्लाद जोशी और बीएल संतोष पर भरोसा किया और उन्हें निर्णय लेने की पूरी आजादी दी। इसी तरह सीटी रवी की भूमिका को लेकर भी प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं।
पार्टी नेताओं में आपसी सहयोग नहीं
पार्टी नेता मान रहे हैं कि कर्नाटक को लेकर एक के बाद एक कई गलतियां हुई हैं जिससे बचा जा सकता था। जिस तरह पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य के स्थानीय नेताओं को भरोसे में लिए बिना टिकटों का बंटवारा किया, उसने पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव भर दिया। कर्नाटक में केंद्रीय नेता प्रह्लाद जोशी और बीएल संतोष के ज्यादा दखल को लेकर भी असंतोष सामने आ रहा था, लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
गुजरात मॉडल दक्षिण में नहीं चलेगा
पार्टी के एक नेता ने कहा कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को यही लग रहा था कि जिस तरह वह गुजरात में अंतिम समय में पूरी सरकार को बदलकर सरकार विरोधी नकारात्मक ज्वार एंटी इनकमबेंसी फैक्टर को कमजोर करने में सफलता पाई थी। यह फैक्टर उत्तराखंड में भी सफल रहा था। पार्टी का मानना था कि यह दांव दक्षिण में भी सफल रहेगा, लेकिन चुनाव परिणाम बताते हैें कि कर्नाटक में प्रयोग असफल साबित हुआ। नेताओं का मानना है कि उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव से पहले नेतृत्व परिवर्तन की बात की जा रही थी, यदि ऐसा हुआ होता तो उत्तर प्रदेश में भी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता था। इस प्रकरण का संदेश है कि पार्टी को राज्यवार नीति को समझते हुए चलना होगा।
इसका बड़ा कारण यह हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात से ही होने के कारण सरकार की पूरी खामी उनकी छवि के नीचे दब गई, लेकिन दक्षिण की राजनीति में सदैव से स्थानीय फैक्टर ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं। कर्नाटक में भी यही हुआ और स्थानीय नेताओं के कमजोर सहयोग के कारण पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।
येदियुरप्पा सिमट गए
पूरे चुनाव अभियान में येदियुरप्पा बाहर नहीं निकले। उन्होंने अपने बेटे के चुनाव प्रचार तक अपने को सीमित कर लिया था। इससे लिंगायत मतदाताओं की पार्टी से नाराजगी बढ़ती गई और वे कांग्रेस के पक्ष में टूट गए।
पीएम न होते तो ....
इस पूरे चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की खूब चर्चा रही। उनके चुनाव प्रचार के असर को लेकर भी मंथन जारी है। विभिन्न सर्वे में 19 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को वोट देने के पीछे केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कारण बताया है। भाजपा के एक नेता के मुताबिक, प्रधानमंत्री के सघन चुनाव प्रचार के कारण भाजपा एक सम्मानजनक स्कोर तक पहुंच सकी। यदि पीएम चुनाव प्रचार न करते तो भाजपा एक बार फिर 40 के आसपास ठहर जाती जैसा कि पूर्व में येदियुरप्पा की नाराजगी के कारण भाजपा को रुकना पड़ गया था।
लोकसभा में क्या होगा असर?
नेता के मुताबिक, मतदाताओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को लेकर कोई प्रश्न नहीं है। विभिन्न सर्वे और चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। पिछले लोकसभा चुनाव के पूर्व भी भाजपा को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में करारी हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने इन्हीं राज्यों में क्लीन स्वीप कर दिया। नेता के मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा कर्नाटक में एक बार फिर सभी सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रहेगी।