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Tripura: कौन हैं महल बेचकर BJP विधायकों को खरीदने की बात कहने वाले प्रद्योत, त्रिपुरा में कितना है जादू?
Thu, 16 Feb 2023 05:03 PM IST
हिमांशु मिश्रा
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Thu, 16 Feb 2023 05:03 PM IST
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टिपरा मोथा पार्टी के प्रमुख प्रद्योत देबबर्मा
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
त्रिपुरा में गुरुवार को विधानसभा के लिए वोट डाले गए। इस बीच, एक बयान सुर्खियों में रहा। ये बयान दिया है टिपरा मोथा पार्टी के प्रमुख प्रद्योत देबबर्मा ने। प्रद्योत ने चुनाव के बाद भाजपा के विधायकों को खरीदने तक का एलान कर दिया। देबबर्मा ने कहा कि अगर हमें यानी टिपरा मोथा को 30 से कम सीटें मिलती है तो मैं अपने महल के कुछ हिस्सों को बेचकर बीजेपी के 25-30 विधायकों को खरीदने के बारे में सोच रहा हूं। मेरे पास पैसा ही पैसा है।ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या सच में ऐसा हो सकता है? आखिर कौन हैं प्रद्योत बर्मा जो भाजपा के विधायकों को खरीदने का दावा कर रहे हैं? आइए जानते हैं...
क्यों चर्चा में हैं प्रद्योत?
त्रिपुरा चुनाव में इन दिनों सबसे ज्यादा अगर किसी की चर्चा हो रही है तो वह टिपरा मोथा पार्टी (टीएमपी) के प्रमुख प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा की। प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा का जन्म चार जुलाई 1978 को दिल्ली में हुआ। प्रद्योत त्रिपुरा के 185वें राजा किरीट बिक्रम किशोर देबबर्मा और महारानी बीहूबी कुमारी देवी के बेटे हैं। प्रद्योत की पढ़ाई शिलॉन्ग में हुई है। प्रद्योत के पिता राजा किरीट बिक्रम किशोर देबबर्मा तीन बार लोकसभा के सांसद और मां दो बार विधायक रह चुकी हैं।
प्रद्योत अभी त्रिपुरा के आदिवासियों के लिए अलग से 'ग्रेटर टिपरालैंड' राज्य की मांग कर रहे हैं। इस मांग के साथ टिपरा मोथा ने चुनावी मैदान में भी ताल ठोकी है। प्रद्योत की पार्टी 42 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। माना जा रहा है कि इस बार चुनाव में टिपरा मोथा के प्रमुख प्रद्योत 'किंगमेकर' साबित हो सकते हैं।
त्रिपुरा चुनाव में इन दिनों सबसे ज्यादा अगर किसी की चर्चा हो रही है तो वह टिपरा मोथा पार्टी (टीएमपी) के प्रमुख प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा की। प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा का जन्म चार जुलाई 1978 को दिल्ली में हुआ। प्रद्योत त्रिपुरा के 185वें राजा किरीट बिक्रम किशोर देबबर्मा और महारानी बीहूबी कुमारी देवी के बेटे हैं। प्रद्योत की पढ़ाई शिलॉन्ग में हुई है। प्रद्योत के पिता राजा किरीट बिक्रम किशोर देबबर्मा तीन बार लोकसभा के सांसद और मां दो बार विधायक रह चुकी हैं।
प्रद्योत अभी त्रिपुरा के आदिवासियों के लिए अलग से 'ग्रेटर टिपरालैंड' राज्य की मांग कर रहे हैं। इस मांग के साथ टिपरा मोथा ने चुनावी मैदान में भी ताल ठोकी है। प्रद्योत की पार्टी 42 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। माना जा रहा है कि इस बार चुनाव में टिपरा मोथा के प्रमुख प्रद्योत 'किंगमेकर' साबित हो सकते हैं।
कांग्रेस छोड़कर 2019 में पार्टी बनाई
अपनी पार्टी बनाने से पहले प्रद्योत बिक्रम कांग्रेस में रह चुके हैं। जब उन्होंने कांग्रेस छोड़ी उस वक्त वह त्रिपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष थे। कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने टिपरा मोथा का गठन किया। शुरू में यह गैर राजनीतिक संगठन था। हालांकि, 2021 में स्थानीय चुनाव में ताल ठोककर प्रद्योत बिक्रम के संगठन ने राजनीतिक पारी की शुरूआत की।
कांग्रेस से अलग होने के बाद प्रद्योत ने ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ की मांग रखी। प्रद्योत का कहना है कि, 'ग्रेटर टिपरालैंड' मौजूदा त्रिपुरा राज्य से अलग एक राज्य होगा। नई जातीय मातृभूमि मुख्य रूप से उस क्षेत्र के स्वदेशी समुदायों के लिए होगी जो विभाजन के दौरान पूर्वी बंगाल से भारत आए बंगालियों की वजह से अपने ही क्षेत्र में अल्पसंख्यक हो गए थे। 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान बंगाली लोगों की एक बड़ी संख्या ने त्रिपुरा में शरण ली। जनगणना 2011 के अनुसार, बंगाली त्रिपुरा में 24.14 लाख लोगों की मातृभाषा है जो यहां की 36.74 लाख आबादी में से दो-तिहाई है। प्रद्योत अलग राज्य की मांग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अलग राज्य आदिवासियों के अधिकारों और संस्कृति की रक्षा करने में मदद करेगा, जो बंगाली समुदाय के लोगों के आ जाने से अब अल्पसंख्यक हो गए हैं।
अपनी पार्टी बनाने से पहले प्रद्योत बिक्रम कांग्रेस में रह चुके हैं। जब उन्होंने कांग्रेस छोड़ी उस वक्त वह त्रिपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष थे। कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने टिपरा मोथा का गठन किया। शुरू में यह गैर राजनीतिक संगठन था। हालांकि, 2021 में स्थानीय चुनाव में ताल ठोककर प्रद्योत बिक्रम के संगठन ने राजनीतिक पारी की शुरूआत की।
कांग्रेस से अलग होने के बाद प्रद्योत ने ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ की मांग रखी। प्रद्योत का कहना है कि, 'ग्रेटर टिपरालैंड' मौजूदा त्रिपुरा राज्य से अलग एक राज्य होगा। नई जातीय मातृभूमि मुख्य रूप से उस क्षेत्र के स्वदेशी समुदायों के लिए होगी जो विभाजन के दौरान पूर्वी बंगाल से भारत आए बंगालियों की वजह से अपने ही क्षेत्र में अल्पसंख्यक हो गए थे। 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान बंगाली लोगों की एक बड़ी संख्या ने त्रिपुरा में शरण ली। जनगणना 2011 के अनुसार, बंगाली त्रिपुरा में 24.14 लाख लोगों की मातृभाषा है जो यहां की 36.74 लाख आबादी में से दो-तिहाई है। प्रद्योत अलग राज्य की मांग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अलग राज्य आदिवासियों के अधिकारों और संस्कृति की रक्षा करने में मदद करेगा, जो बंगाली समुदाय के लोगों के आ जाने से अब अल्पसंख्यक हो गए हैं।
क्या भाजपा के लिए हो सकती है मुश्किल?
टिपरा मोथा पार्टी ने पिछले साल अप्रैल में हुए त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) के चुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-आईपीएफटी गठबंधन के साथ सीधे मुकाबले में ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ की मांग पर 28 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की थी। सूबे की 20 विधानसभा सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। राज्य में आदिवासियों की संख्या भी 32 प्रतिशत है। यही कारण है कि भाजपा के सामने टिपरा मोथा बड़ी चुनौती बन सकती है। इस बार के चुनाव में टिपरा मोथा को किंगमेकर बताया जा रहा है। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति लगभग सभी पार्टियां करती आईं हैं। विधायकों के खरीद-फरोख्त के आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे में अगर चुनाव बाद ऐसा कुछ होता है तो ये नया नहीं होगा।
टिपरा मोथा पार्टी ने पिछले साल अप्रैल में हुए त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) के चुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-आईपीएफटी गठबंधन के साथ सीधे मुकाबले में ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ की मांग पर 28 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की थी। सूबे की 20 विधानसभा सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। राज्य में आदिवासियों की संख्या भी 32 प्रतिशत है। यही कारण है कि भाजपा के सामने टिपरा मोथा बड़ी चुनौती बन सकती है। इस बार के चुनाव में टिपरा मोथा को किंगमेकर बताया जा रहा है। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति लगभग सभी पार्टियां करती आईं हैं। विधायकों के खरीद-फरोख्त के आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे में अगर चुनाव बाद ऐसा कुछ होता है तो ये नया नहीं होगा।
राजनीति छोड़ने का भी जारी किया था बयान
इससे पहले टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा ने कहा था कि वह 16 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद राजनीति छोड़ देंगे और कभी भी एक राजा की तरह वोट नहीं मांगेंगे। उन्होंने कहा कि यह निश्चित है कि दो मार्च के बाद वह राजनीति में नहीं होंगे, लेकिन हमेशा अपने लोगों के साथ रहेंगे।
इससे पहले टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा ने कहा था कि वह 16 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद राजनीति छोड़ देंगे और कभी भी एक राजा की तरह वोट नहीं मांगेंगे। उन्होंने कहा कि यह निश्चित है कि दो मार्च के बाद वह राजनीति में नहीं होंगे, लेकिन हमेशा अपने लोगों के साथ रहेंगे।