कौन हैं अन्ना हजारे?: सैनिक से समाजसेवी तक कैसे बदली जिंदगी? एक आंदोलन से हिली थी सरकार और घर-घर पहुंचा नाम
सैनिक से समाजसेवी और फिर आंदोलनकारी बने अन्ना हजारे ने दशकों तक जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाई। 2011 का लोकपाल आंदोलन उनके जीवन का ऐसा मोड़ बना, जिसने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे एक सैनिक देश के सबसे चर्चित जनआंदोलन के चेहरों में शामिल हो गया?
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विस्तार
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की तबीयत में अब सुधार हो रहा है। 89 वर्षीय अन्ना हजारे को रक्त जांच में किडनी में संक्रमण के संकेत मिलने के बाद अहिल्यानगर से मुंबई के बॉम्बे अस्पताल लाया गया था। डॉक्टरों के मुताबिक उनकी हालत स्थिर है और अब वह सामान्य भोजन भी ले रहे हैं। फिलहाल उन्हें दो दिन और निगरानी में रखा जाएगा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और जल संसाधन मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल भी अस्पताल पहुंचकर उनका हाल जान चुके हैं।
करीब पांच दशक के सार्वजनिक जीवन में अन्ना हजारे ने ग्रामीण विकास, शराबबंदी, भ्रष्टाचार, सूचना का अधिकार, ग्रामसभा, लोकपाल, किसानों और चुनाव सुधार जैसे कई मुद्दों पर आंदोलन किए। आइए जानते हैं उनके जीवन और संघर्ष की पूरी कहानी।
किसान बाबूराव हजारे का बचपन
अन्ना हजारे का मूल नाम किसान बाबूराव हजारे है। उनका जन्म 15 जून 1937 को महाराष्ट्र के भिंगार, अहमदनगर में हुआ। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और उनकी पढ़ाई ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में वह मुंबई गए, जहां फूल बेचकर अपना जीवन चलाया।
बचपन में उनकी मां ने उन्हें ईमानदारी और अच्छे संस्कारों की सीख दी। अन्ना ने एक कार्यक्रम में बताया था कि उनकी मां उन्हें चोरी न करने, झूठ न बोलने, बुरी चीजें न सीखने, किसी को तकलीफ न पहुंचाने और बड़ों का सम्मान करने जैसी बातें सिखाती थीं। आगे चलकर यही सीख उनके जीवन के मूल सिद्धांतों का हिस्सा बनी।
25 साल की उम्र में जिंदगी को लेकर उठे सवाल
युवावस्था में अन्ना के मन में भी जीवन को लेकर कई सवाल उठने लगे थे। उन्होंने बताया था कि करीब 25 साल की उम्र में उनके मन में सवाल आया कि आखिर जीवन क्या है और इंसान किसलिए जीता है? इन सवालों का जवाब नहीं मिलने पर उन्हें जिंदगी व्यर्थ लगने लगा और एक समय उनके मन में आत्महत्या के विचार भी आने लगे।
इसी दौरान किसी काम से दिल्ली जाने पर रेलवे स्टेशन के एक बुक स्टॉल पर उन्हें स्वामी विवेकानंद की एक किताब दिखाई दी। उन्होंने वह किताब खरीद ली। विवेकानंद के विचारों को पढ़ते हुए उन्हें अपने सवालों के जवाब मिलने लगे।
अन्ना के मुताबिक, उन्हें समझ आया कि इंसान को अपने जीवन का उद्देश्य तय करना चाहिए और फिर उस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए। इसके बाद उन्होंने लोगों की सेवा करने और समाज में फैली बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया।
हालांकि, इसके बाद भी उनकी राह आसान नहीं रही। उन्होंने बताया था कि कई बार खाने तक के पैसे नहीं होते थे और चने खाकर गुजारा करना पड़ता था। बस से सफर करने या कहीं ठहरने तक के पैसे नहीं होते थे। इसके बावजूद उन्होंने सामाजिक काम के छोटे-छोटे प्रयास जारी रखे।
सेना में कैसे पहुंचे अन्ना?
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद देश में युवाओं से सेना में शामिल होने की अपील की गई। अन्ना ने भी इस अपील का जवाब दिया और 1963 में भारतीय सेना में भर्ती हुए। उन्होंने सेना में करीब 12 साल सेवा की। इस दौरान उनकी तैनाती सिक्किम, भूटान, जम्मू-कश्मीर, असम, मिजोरम और लेह-लद्दाख जैसे कठिन इलाकों में रही।
युद्ध बना जिंदगी का निर्णायक मोड़
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अन्ना खेमकरण सीमा क्षेत्र में तैनात थे। पाकिस्तानी हवाई हमले में उनके कई साथी मारे गए। अन्ना के मुताबिक, वह इस हमले में बाल-बाल बचे और एक गोली उनके सिर के बेहद करीब से निकल गई।
इस घटना ने उन्हें जिंदगी के उद्देश्य के बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया। स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित अन्ना ने मानव सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने का फैसला किया। इसके बाद भी उन्होंने सेना में सेवा जारी रखी और 1975 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर सेना से बाहर आए। इसके बाद वह महाराष्ट्र लौटे और सामाजिक कार्य में सक्रिय हो गए। उन्होंने समाज सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करने और विवाह न करने का संकल्प लिया।
रालेगण सिद्धि से शुरू हुआ सामाजिक काम
सेना से लौटने के बाद अन्ना ने रालेगण सिद्धि में सामाजिक काम शुरू किया। उस समय गांव पानी की कमी, गरीबी, पलायन और शराब की समस्या से जूझ रहा था। उन्होंने युवाओं को संगठित किया और ग्रामीणों को सामूहिक रूप से गांव के विकास में जोड़ा।
जल संरक्षण को विकास का आधार बनाया गया। बारिश के पानी को रोकने के लिए नाला बांध, कंटूर ट्रेंच और दूसरी जल संरचनाएं बनाई गईं। ग्रामीणों ने श्रमदान किया, जिससे खेती और सिंचाई की स्थिति में सुधार हुआ।
इसके साथ शराबबंदी, दहेज विरोध और ग्रामसभा की भागीदारी पर जोर दिया गया। स्कूल, छात्रावास, डेयरी, अनाज बैंक और महिला स्वयं सहायता समूह जैसी सामुदायिक गतिविधियां भी विकसित हुईं। रालेगण सिद्धि का यह मॉडल बाद में ग्रामीण विकास और जल संरक्षण के उदाहरण के तौर पर चर्चित हुआ।
आंदोलनों की लंबी यात्रा
1980 का दशक: गांव और किसानों के मुद्दे
अन्ना के शुरुआती आंदोलन स्थानीय जरूरतों और किसानों की समस्याओं से जुड़े थे। इनमें स्कूल की मंजूरी, गांव के विकास में प्रशासनिक सहयोग, किसानों के लिए ड्रिप सिंचाई और कुएं की सब्सिडी तथा कृषि के लिए बेहतर बिजली व्यवस्था जैसे मुद्दे शामिल थे।
1990 का दशक: भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा
1990 के दशक में अन्ना का संघर्ष सरकारी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ ज्यादा मुखर हुआ। उन्होंने वन विभाग में भ्रष्टाचार, सरकारी विभागों में गड़बड़ियों और मंत्रियों-अधिकारियों के खिलाफ लगे आरोपों की जांच की मांग को लेकर आंदोलन किए।
इसी दौरान उन्होंने जनजागरण यात्राओं के जरिए लोगों को भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से जोड़ना शुरू किया। सूचना का अधिकार, ग्रामसभा के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही भी उनके अभियान के प्रमुख मुद्दे बनते गए।
सूचना का अधिकार बना बड़ा मुद्दा
अन्ना हजारे के सबसे महत्वपूर्ण संघर्षों में सूचना का अधिकार यानी आरटीआई शामिल है। उनकी सोच थी कि सरकार के कामकाज की जानकारी जनता को मिलेगी, तभी भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों पर सवाल उठाए जा सकेंगे।
उन्होंने महाराष्ट्र में सूचना के अधिकार को मजबूत बनाने के लिए आंदोलन किए। इसके साथ ग्रामसभा को अधिक अधिकार देने, सरकारी अधिकारियों के मनमाने तबादलों पर रोक लगाने और सरकारी कामकाज में अनावश्यक देरी खत्म करने की मांग भी उठाई।
2003 का आंदोलन क्यों महत्वपूर्ण था?
2003 में अन्ना ने भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच, सूचना के अधिकार, ग्रामसभा की शक्तियों और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर बड़ा अनशन किया। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया। इसी दौर में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने जनजागरण यात्राएं भी कीं।
2000 के दशक में भी जारी रहा संघर्ष
2000 के दशक में अन्ना ने सूचना के अधिकार को कमजोर करने की कोशिशों का विरोध किया। सहकारी संस्थाओं में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी उन्होंने आंदोलन किए। उनके आंदोलन का तरीका मुख्य रूप से अनशन, सत्याग्रह, जनजागरण और सरकार पर सार्वजनिक दबाव बनाने पर आधारित रहा।
2011: आंदोलन जिसने अन्ना को पूरे देश में पहचान दिलाई
अन्ना के सार्वजनिक जीवन में सबसे बड़ा मोड़ 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन था। 5 अप्रैल 2011 को उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर मजबूत लोकपाल कानून की मांग को लेकर अनशन शुरू किया।
लोकपाल को आसान भाषा में समझें तो यह भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए एक स्वतंत्र संस्था की परिकल्पना थी। अन्ना की मांग थी कि लोकपाल को पर्याप्त स्वतंत्रता और अधिकार दिए जाएं। आंदोलन को देशभर में व्यापक समर्थन मिला। इसके बाद सरकार और अन्ना के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए संयुक्त मसौदा समिति बनाई गई।
अगस्त 2011 में फिर बड़ा आंदोलन
अप्रैल के आंदोलन के बाद भी सरकार और अन्ना के प्रतिनिधियों के बीच कई मुद्दों पर सहमति नहीं बनी। अगस्त 2011 में अन्ना ने फिर अनशन किया। इस बार आंदोलन और बड़ा हुआ और दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी संख्या में लोग जुटे।
देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून की मांग राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गई।
लोकपाल का विचार अन्ना के आंदोलन से कई दशक पहले से मौजूद था। इसके बाद लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 संसद से पारित हुआ और 16 जनवरी 2014 से लागू हुआ।
2011 के बाद भी जारी रहे आंदोलन
किसानों के लिए उचित कीमत
अन्ना किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य देने और खेती की लागत के आधार पर कीमत तय करने की मांग उठाते रहे। बाद के आंदोलनों में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का मुद्दा भी शामिल रहा।
भूमि अधिग्रहण
2015 में अन्ना ने प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण बदलावों के खिलाफ दिल्ली में आंदोलन किया। इसमें किसानों की जमीन और उनके हितों की सुरक्षा प्रमुख मुद्दा था।
एक रैंक-एक पेंशन
2015 में उन्होंने पूर्व सैनिकों के लिए एक रैंक-एक पेंशन की मांग का समर्थन करते हुए जंतर-मंतर पर आंदोलन किया।
चुनाव सुधार
अन्ना ने चुनाव व्यवस्था में सुधार और राजनीति में जनता की भूमिका मजबूत करने की मांग भी उठाई। गैर-दलीय लोकतंत्र और चुनाव सुधार को लेकर उन्होंने कई जनजागरण यात्राएं कीं।
2018 में फिर दिल्ली पहुंचे
मार्च 2018 में अन्ना ने दिल्ली के रामलीला मैदान में फिर आंदोलन किया। इस बार किसानों के लिए उचित मूल्य, लोकपाल-लोकायुक्त की नियुक्ति और चुनाव सुधार उनकी प्रमुख मांगों में शामिल थे।
2019 में लोकायुक्त और किसानों का मुद्दा
2019 में अन्ना ने फिर अनशन किया। इसमें महाराष्ट्र में मजबूत लोकायुक्त व्यवस्था और किसानों को लागत के आधार पर उचित मूल्य देने की मांग प्रमुख रही।