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हिंदुओं के घर किसने लगाए 'बिकाऊ है' के पोस्टर

Sat, 25 Jun 2016 10:49 AM IST
जुबैर अहमद/ बीबीसी संवाददाता, कैराना से
जुबैर अहमद/ बीबीसी संवाददाता, कैराना से Updated Sat, 25 Jun 2016 10:49 AM IST
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Who imposed tolet posters on Kairana hindu homes

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना से हिंदुओं के पलायन के दावों पर विश्वास करने वाले जितने मिल जाएंगे उतने ही इसे झूठा साबित करने वाले भी।

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भारतीय जनता पार्टी ने अपने दावों को सही साबित करने के लिए पलायन करने वालों की जो लिस्ट निकाली थी उस पर शुरू में पार्टी बैकफुट पर जाती नजर आई लेकिन पार्टी अब एक नए आत्मविश्वास के साथ इसे आगे ले जाने की तैयारी कर रही है।
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पार्टी की नई लाइन ये है कि हिंदुओं का पलायन कई मुस्लिम बहुल गांवों और शहरों से हुआ है। इसकी एक लिस्ट भी तैयार की जा रही है।

लेकिन कैराना से उठे इस विवाद पर खुद शहर के अंदर भाजपा के दावों पर न तो हिंदू पूरी तरह से यकीन करते हैं और न ही मुसलमान।

Who imposed tolet posters on Kairana hindu homes
कैराना में मुसलमानों की आबादी हिंदुओं के मुकाबले कहीं ज्यादा है इसी वजह से भाजपा के कुछ नेता इसे 'मिनी पाकिस्तान' भी कहते हैं।

कैराना शहर के खास बाजार में मुसलमानो की दुकानें अधिक हैं, हिंदुओं की बहुत कम। इनमें से एक राजेश कुमार का परिवार पिछले 50 सालों से सब्जी का थोक विक्रेता है।

वो कहते हैं, "हम यहां आराम से हैं। हमें कोई दिक्कत नहीं। हम मुसलमानों के बीच 50 साल से व्यापार कर रहे हैं। कोई परेशानी नहीं है।" 

वो तो यहां तक कह बैठे कि इस बाजार में वो खुद को अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। उनके निकट के दुकानदार अरविंद गर्ग के परिवार वाले भी 50 साल से दुकान चला रहे हैं।

वो कहते हैं मुसलमानों से नहीं गुंडागर्दी से परेशानी है। "अगर हिंदू यहां से गए भी हैं तो वो गुंडागर्दी से तंग आकर गए हैं।"

Who imposed tolet posters on Kairana hindu homes
ये दोनों हिंदू दुकानदार कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह के समर्थक हैं। हुकुम सिंह ने सब से पहले इस महीने के शुरू में कैराना से हिंदुओं के कथित पलायन का मुद्दा उठाया था।

उन्होंने कैराना की तुलना कश्मीर घाटी से की थी जहां से 1990 के बाद लाखों की संख्या में हिंदू पंडितों ने चरमपंथियों की धमकियों के कारण जम्मू और दिल्ली पलायन किया था।

उनकी 346 हिंदुओं के पलायन की लिस्ट में ऐसे लोग भी थे जो अब इस दुनिया में नहीं रहे और ऐसे लोग भी जो अब भी कैराना में रह रहे हैं। कई लोग शहर छोड़ कर गए लेकिन आर्थिक कारणों से।
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Who imposed tolet posters on Kairana hindu homes

हुकुम सिंह के दावों से पूरे क्षेत्र में साम्प्रदायिक दंगे का खतरा पैदा हो गया। हर गांव में तनाव का माहौल बन गया। शहर के कुछ बंद पड़े हिंदुओं के घरों की दीवारों पर अचानक से "बिकाऊ घर" के इश्तेहार लगाए गए। ये किसने किया किसी को नहीं मालूम।

लेकिन कैराना के सभी समुदायों ने इन दावों के विरोध में एक शांति जुलूस निकाला जिससे शहर में साम्प्रदायिक सद्भावना पैदा हुई और तनाव कम हुआ। इस शांति मार्च में शहर के एक सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद अली भी शामिल हुए थे।

वो कहते हैं कि पलायन शब्द गलत है। और अगर ये पलायन है तो हिंदुओं से अधिक शहर को मुसलमान छोड़ कर चले गए हैं, "हुकुम सिंह ने 346 की लिस्ट निकाली है। हम ऐसे हजार हिंदुओं को जानते हैं जो अब शहर में नहीं रहते। हम ऐसे 3000 मुसलमानों की लिस्ट निकाल सकते हैं जो अब इस शहर में आबाद नहीं हैं। लोग हर जगह से नौकरियों के लिए दूसरे शहरों में जाते हैं।"

पलायन के दावों को नकारने वालों में हाजी वाजिद भी हैं जो पड़ोस के शहर कांगला के जिला परिषद के अध्यक्ष हैं। भाजपा कांगला से हिंदुओं के पलायन के दावे भी करती हैं। लेकिन हाजी वाजिद कहते हैं कि अगर किसी का सही मानो में पलायन हुआ है तो मुसलमानों का 2013 में हुआ। "मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद मुसलमानों ने कई गांव छोड़े। वो अब तक खेमों में रह रहे हैं। पलायन इसको कहते हैं।"

Who imposed tolet posters on Kairana hindu homes

भाजपा के 7 जून तक मुजफ्फरनगर जिला अध्यक्ष रहे सतपाल सिंह कहते हैं कि हुकुम सिंह एक वरिष्ठ और जिम्मेदार नेता हैं और उन्हें अपने क्षेत्र की बात उठाने का अधिकार है। "मैं आपसे बताना चाहूंगा कि मीरपुर, बुढ़ाना, शाहपुर और दूसरी कई जगहों पर कैराना जैसी स्थिति होती जा रही है।"

सतपाल सिंह आगे कहते हैं कि जहां मुस्लिम आबादी अधिक है वहां हिंदू खुद को कमजोर महसूस कर रहा है। लेकिन उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि आर्थिक कारणों से भी पलायन हुआ है।

कई लोगों ने ये भी कहा कि भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। अगले साल उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव है। कैराना के कई किसान कहते हैं की शायद चुनाव में इस मुद्दे से किसी को लाभ नहीं होगा।

इन दावों पर यकीन करने वालों की भी कमी नहीं है। मगर भारतीय किसान यूनियन के एक कार्यकर्ता ने कहा कि शायद स्थानीय लोगों पर इसका यकीन नहीं होगा।

"पर किसको मालूम लखनऊ में, फैजाबाद में या दूर के शहरों में लोगों पर इसका असर ना हो।"

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