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जब भारत और चीन के सैनिकों ने एक साथ मिलकर लड़ी लड़ाई और हासिल की शहादत

Wed, 02 Sep 2020 12:47 PM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनवर अंसारी Updated Wed, 02 Sep 2020 12:47 PM IST
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When Indian and Chinese troops fought and died together in World War 2 against Japan
फाइल फोटो - फोटो : PTI

पूर्वी लद्दाख में तनाव की स्थिति गंभीर हो गई है, क्योंकि हाल ही में चीन द्वारा इस इलाके में घुसपैठ की घटना को अंजाम दिया गया था। हालांकि, भारतीय सेना की मुस्तैदी ने इसे नाकाम कर दिया। वहीं, इस घटना के बाद चीन की सरकारी मीडिया ने कहा कि बीजिंग पाकिस्तान सहित अन्य देशों को भारत के खिलाफ खड़ा कर सकता है। 

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इन घटनाक्रमों के बीच हम आपको एक ऐसी घटना के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां भारतीय और चीनी सैनिकों ने एक साथ मिलकर लड़ाई लड़ी और शहादत हासिल की। दरअसल, आज द्वितीय विश्व युद्ध के अंत की 75 वीं वर्षगांठ है। तो आइए एक बीते हुए युग के घटनाक्रम को याद किया जाए। 
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अरुणाचल प्रदेश में चांगलांग जिले में ऐतिहासिक स्टिलवेल रोड पर द्वितीय विश्व युद्ध के नायकों को समर्पित एक कब्रिस्तान है। धातु से बने एक संदेश बोर्ड पर मंदारिन भाषा में समाधि-लेख लिखा हुआ है, जो हमें भारत में स्वतंत्र चीनी सेना की दूसरी बटालियन की दूसरी कंपनी के 10वीं रेजीमेंट के कमांडर मेजर ह्सियाओ चु चिनो की याद दिलाता है। 
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उनकी क्रब उन 1000 कब्रों में से एक है, जिसमें चीनी, काचिन, अमेरिकी, भारतीय और ब्रिटिश जवानों की कब्र शामिल है। ये कब्रें हमें उस दौर की याद दिलाती हैं, जब युद्ध की रेखाओं को आज के युग से अलग तौर पर खींचा जाता था। ये सभी सैनिक द्वितीय विश्वयुद्ध में एक ही दुश्मन के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए थे।


स्टिलवेड रोड 769 किलोमीटर लंबा इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना है, जो घने जंगलों, बीहड़ पहाड़ियों और दलदलों से गुजरता है। इस सड़क का प्रयोग द्वितीय विश्व युद्ध में जापानी सैनिकों पर आक्रमण के लिए किया गया। 

इस सड़क की रूपरेखा जनरल स्टिल द्वारा रखी गई थी, जिसे अब लेडो रोड के नाम से जाना जाता है। इस सड़क की आधारशिला 17,000 अमेरिकियों द्वारा रखी गई थी, जिसमें कई इंजीनियर और लगभग 50,000 भारतीय मजदूर और बड़ी संख्या में चीनी सैनिक शामिल थे।

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