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जब जॉर्ज ने कहा था, नहीं नहीं मैं जॉर्ज फर्नांडिस नहीं हूं...

Tue, 29 Jan 2019 02:05 PM IST
Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  Published by: Jitendra Bhardwaj Updated Tue, 29 Jan 2019 02:05 PM IST
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When George said, I am not George Fernandes
jorge fernandez, vijay narayan singh

बड़ोदा डायनामाइट केस में खुफिया एजेंसियां जॉर्ज फर्नांडिस को ढूंढ रही थीं। कई शहरों की खाक छानते-छानते आईबी की टीम कोलकाता पहुंच गई। जॉर्ज और उनके साथियों ने सेंट पॉल चर्च में पनाह ली हुई थी। 10 जून 1976 को शाम चार बजे आईबी के 16 आदमी चर्च में पहुंच गए। इसाईयों की सामाजिक संस्था डी सेमेरिटन के इंचार्ज विजयन पावामुनि के सामने जॉर्ज को बुलाया गया। आईबी वाले उन्हें देखते ही जोश में आ गए। वे बोले, यही जॉर्ज फर्नांडिस है। इतना कहते ही जॉर्ज विचलित हो गए। अगले ही पल उन्होंने खुद को संभाला और बोले, नहीं नहीं, मैं जॉर्ज फर्नांडिस नहीं हूं। उनका चेहरा फीका पड़ा हुआ था। लंबे बाल चेहरे पर बिखरे पड़े थे और चश्मा उतार रखा था। एक बार फिर बोले, नो नो आई एम नॉट जॉर्ज फर्नांडिस, आईएम प्रो. राजशेखर।

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जॉर्ज असमंजस में कि कहां जाएं कहां नहीं, इसी देरी में हो गए गिरफ्तार

जॉर्ज फर्नांडिस के साथ 25 साल तक काम करने वाले विजय नारायण सिंह ने जॉर्ज से जुड़ी कुछ यादें अमर उजाला डॉट कॉम के साथ सांझा की हैं। बतौर सिंह, इमरजेंसी के दौरान हम सब कोलकाता में थे। जॉर्ज को उनके साथी रुडोल्फ ने चर्च में रहने के लिए जगह दिलवा दी। यहां वे प्रो. राजशेखर के नाम से रह रहे थे। मैं भी उनके साथ था। लिखने का उन्हें शौक था। अपने कमरे से थोड़ी दूरी पर एक अलग कमरे में उनका टाइपराईटर रखा था। वहां से वे हर दूसरे सप्ताह पत्र लिखते रहते थे। मैं उन्हें पोस्ट कर आता था। एक दिन मैंने देखा कि चर्च के आसपास कुछ संदिग्ध लोग घूम रहे हैं। मुझे कुछ संदेह हुआ और मैं तुरंत जॉर्ज के कमरे में गया और उन्हें सारी बात बताई। मैंने कहा, अभी निकल लेते हैं। जॉर्ज बोले, कहां जाएंगे। हमें कोलकाता में कौन जगह देगा, कोई जानकार भी नहीं है। जॉर्ज को मैंने यह आश्वासन भी दिलाया कि तुम चिंता मत करो।मेरे कई परिचित हैं। चलो, चलते हैं। जॉर्ज असमंजस में कि कहां जाएं कहां नहीं, वे इसी माथापच्ची में लगे थे कि आईबी वाले वहां पहुंच गए।

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रेलवे के पास ने सारी पोल खोल दी

आईबी वालों ने डी सेमेरिटन के इंचार्ज विजयन पावामुनि के सामने जॉर्ज को बुलाया। साथ में मैं यानी विजय नारायण सिंह भी था। मेरा कोड नेम राजेंद्र था और जॉर्ज पहले से ही प्रो. राजशेखर के नाम से रह रहे थे। आईबी वालों ने पूछा, इनका कोई सामान है। हमें जांच करनी है। विजयन ने बताया कि इनका एक टाइपराईटर है। खास बात है कि जॉर्ज के पास एक ब्रिफकेस भी था। इसकी जानकारी विजयन पावामुनि को थी, लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि उसमें क्या है। साफ मन से पावामुनि ने वह ब्रिफकेस आईबी वालों को दे दिया। चूंकि उससे पहले जॉर्ज ने खुद का परिचय प्रो. राजशेखर के तौर पर दिया था। आईबी की टीम ब्रिफकेस को खंगालने लगी। उसमें जॉर्ज का रेल पास रखा था और उस पर फोटो भी लगी थी। आईबी टीम के हेड देशपांडे ने कहा, आप ही जॉर्ज हैं। इतना सुनते ही जॉर्ज कहने लगे कि नहीं नहीं मैं जॉर्ज फर्नांडिस नहीं हूं। मैंने पहली बार जॉर्ज के चेहरे पर घबराहट देखी थी। इस बार आईबी वाले नहीं मानें। जॉर्ज और मुझे गिरफ्तार कर लिया गया।

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आईबी टीम के हेड बोले, सर अब आपको नहीं छोड़ेंगे

जब जॉर्ज को ले जाने की बात हो रही थी तो वे बोले, मेरा सामान भी है। मौके पर मौजूद चश्मदीद विजय नारायण सिंह के मुताबिक, आईबी वाले बहुत सम्मान के साथ बात कर रहे थे। उन्होंने जॉर्ज को सर कह कर संबोधित किया। जब सामान लाने की बात हो रही थी तो जॉर्ज एक बार मराठी में कुछ कह गए। मुंबई के रहने वाले देशपांडे को अब जो थोड़ा बहुत शक था, वह भी दूर हो गया। गिरफ्तारी के बाद आईबी अधिकारी ने कहा, सर जब आप मराठी में बोले तो मैं समझ गया था कि आप ही जॉर्ज हैं। हमें पार्क स्टीट थाने में ले जाया गया। वहां से इंडियन एयरफोर्स के विमान में वे जॉर्ज को दिल्ली ले गए। मुझे कोलकाता के लॉकअप रुम में ही डाल दिया गया।

जॉर्ज के दिल्ली पहुंचने से पहले दुनिया को खबर लग गई, जानिये कैसे

 जॉर्ज की मदद करने में पावामुनि ने अहम भूमिका निभाई। चूंकि कोलकाता में अधिकांश देशों के काउंस्लेट दफ्तर थे, उन्होंने सभी के पास सूचना पहुंचा दी। यहां से वह सूचना विदेशों में चली गई। उस वक्त जर्मनी में विलि ब्रेंड चांसलर के पद से हटे ही थे। वे सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी से थे। जॉर्ज के अच्छे मित्र थे। उन्होंने तुरंत इंदिरा गांधी जो कि उस दौरान मॉस्को में थी, को फोन कर दिया। विली ने कहा, जॉर्ज को कुछ नहीं होना चाहिए। बाद में उन्हें दिल्ली से हिसार जेल भेज दिया गया। बड़ोदा डायनामाइट केस के सभी 21 आरोपियों को नवंबर 1976 में दिल्ली लाया गया, जहां तीस हजारी कोर्ट में मामले की सुनवाई हुई। जॉर्ज के दोनों हाथों में हथकड़ी लगाई गई थी। जमानत पर छूटने के बाद 1977 में जब जॉर्ज भारी अंतर से मुज्जफरपुर लोकसभा सीट से जीत गए और केंद्र में मंत्री बने तो सरकार ने सभी केस वापस ले लिए।

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